आईपीसी की धारा 304बी के तहत जुर्माना लगाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ‘हैरान’, ट्रायल जज के ‘भविष्य के मार्गदर्शन’ के लिए भेजा आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस जफीर अहमद ने दहेज मृत्यु के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की अपील लंबित रहने के दौरान उसकी जमानत अर्जी स्वीकार कर ली है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304बी के तहत विधायिका ने जुर्माना लगाने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं किया है। अपीलकर्ता को राहत देते हुए अदालत ने कहा कि अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने बिना किसी वैधानिक प्रावधान के धारा 304बी के तहत 20,000 रुपये का जुर्माना लगाकर “गंभीर भूल” की है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने इस जुर्माने की वसूली पर रोक लगा दी।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता ने सत्र विचारण संख्या 1384/2001 में अपनी दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में आपराधिक अपील और जमानत अर्जी दाखिल की थी। यह मामला लखनऊ जिले के मोहनलालगंज थाने में दर्ज मुकदमा अपराध संख्या 304/2000 से जुड़ा हुआ था।

ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 498ए, धारा 304बी और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत दोषी करार दिया था। विचारण अदालत ने अपीलकर्ता को धारा 304बी के तहत 10 वर्ष के कठोर कारावास के साथ 20,000 रुपये का जुर्माना, धारा 498ए के तहत 3 वर्ष के कठोर कारावास के साथ 6,000 रुपये का जुर्माना और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत 1 वर्ष के कठोर कारावास के साथ 2,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसी फैसले के विरुद्ध अपील के निस्तारण तक रिहाई की मांग करते हुए हाईकोर्ट में जमानत याचिका लगाई गई थी।

अदालत में वकीलों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता नदीम मुर्तजा, पल्लव शुक्ला, राकेश कुमार नायक, शैलेंद्र सिंह राजावत, शशांक तिल्हारी और सूर्य प्रकाश ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों के मूल्यांकन में भूल की है और अपीलकर्ता को गलत तरीके से दोषी ठहराया है। वकीलों ने विशेष रूप से यह दलील दी कि विचारण अदालत ने धारा 304बी के तहत 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया है, जबकि कानून में इस धारा के तहत कोई भी जुर्माना लगाने का प्रावधान ही नहीं है।

बचाव पक्ष के वकीलों ने यह भी दलील दी कि अपीलकर्ता विचारण के दौरान जमानत पर था और उसने कभी भी जमानत की स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं किया। मामले के तथ्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया गया कि मृतका का एक मृत्युकालिक कथन (डाइंग डिक्लेरेशन) मौजूद है, जिसमें उसने साफ तौर पर कहा था कि उसने खुद को आग इसलिए लगाई क्योंकि उसकी बुआ ने उसे डांट दिया था। इसके अलावा अपीलकर्ता का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं है और वह 28 मार्च 2025 से जेल में बंद है। वकीलों ने आश्वासन दिया कि रिहा होने पर वह जमानत की शर्तों का उल्लंघन नहीं करेगा और अपील के जल्द निस्तारण में पूरा सहयोग करेगा।

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राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) ने जमानत प्रार्थना का कड़ा विरोध किया, हालांकि वे बचाव पक्ष द्वारा पेश किए गए तथ्यात्मक पहलुओं का खंडन नहीं कर सके।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद जस्टिस जफीर अहमद ने पाया कि अपीलकर्ता ट्रायल के दौरान जमानत पर था और उसने इस छूट का दुरुपयोग नहीं किया था, इसलिए यह उसे जमानत पर रिहा करने के लिए उपयुक्त मामला है।

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आईपीसी की धारा 304बी के तहत जुर्माना लगाए जाने पर कड़ा रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि विद्वान विचारण न्यायाधीश ने अभियुक्तों पर आईपीसी की धारा 304बी के तहत भी जुर्माना लगाया है। विधायिका ने आईपीसी की धारा 304-बी के तहत दंडनीय अपराध के लिए कोई जुर्माना निर्धारित नहीं किया है। अदालत केवल वही सजा दे सकती है जो कानून द्वारा निर्धारित है और जहां कानून किसी विशेष अपराध के लिए जुर्माना लगाने का प्रावधान नहीं करता है, वहां अदालत उसमें निर्धारित सजा के अतिरिक्त जुर्माना नहीं लगा सकती।”

निचली अदालत के आदेश पर निराशा व्यक्त करते हुए हाईकोर्ट ने आगे टिप्पणी की:

“यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश स्तर के न्यायिक अधिकारी द्वारा इतनी गंभीर भूल की गई है और संबंधित विद्वान विचारण न्यायाधीश द्वारा आईपीसी की धारा 304-बी के प्रावधानों पर विधिवत विचार किए बिना ही उपरोक्त सत्र विचारण में सजा सुनाई गई है।”

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की जमानत अर्जी स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि उसे संबंधित अदालत की संतुष्टि के अनुसार एक व्यक्तिगत बंधपत्र और उसी राशि के दो मुचलके दाखिल करने पर जमानत पर रिहा कर दिया जाए।

हाईकोर्ट ने जमानत के लिए निम्नलिखित शर्तें तय कीं:

  1. अपीलकर्ता को रिहाई की तारीख से चार सप्ताह के भीतर धारा 498ए और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत कुल 8,000 रुपये का जुर्माना जमा करना होगा, जबकि धारा 304बी के तहत लगाया गया जुर्माना स्थगित रहेगा।
  2. अपीलकर्ता बिना किसी अनावश्यक स्थगन के अपील के शीघ्र निस्तारण में सहयोग करेगा।
  3. जमानत पर रिहा होने के बाद अपीलकर्ता किसी भी आपराधिक गतिविधि या नए अपराध में लिप्त नहीं होगा।
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अदालत ने स्पष्ट किया कि इनमें से किसी भी शर्त का उल्लंघन जमानत रद्द करने का आधार होगा। साथ ही ट्रायल कोर्ट को अपीलकर्ता द्वारा दाखिल जमानत बंधपत्र तत्काल हाईकोर्ट भेजने का निर्देश दिया गया। हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत अर्जी के निस्तारण तक सीमित हैं और इनका मामले के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

इसके अलावा, हाईकोर्ट ने अपने वरिष्ठ निबंधक (सीनियर रजिस्ट्रार) को निर्देश दिया कि वे इस आदेश की प्रति संबंधित जिला जज के माध्यम से संबंधित विचारण न्यायाधीश राहुल मिश्रा, अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कोर्ट संख्या 6 को दस दिनों के भीतर उनके ‘भविष्य के मार्गदर्शन’ के लिए प्रेषित करें। मुख्य अपील को सामान्य प्रक्रिया के तहत सूचीबद्ध करने का आदेश दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: लक्ष्मी नारायण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव गृह, लखनऊ
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1160 / 2025
पीठ: जस्टिस जफीर अहमद
निर्णय की तिथि: 21 अगस्त, 2026

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