‘मिर्जापुर: द मूवी’ की रिलीज से पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में फिल्म की थिएटर रिलीज पर तब तक रोक लगाने की मांग की गई है, जब तक मिर्जापुर को लेकर कथित आपत्तिजनक संदर्भ, अश्लील कंटेंट और हिंसक दृश्य हटा नहीं दिए जाते।
यह याचिका अधिवक्ता शालू पांडे ने केंद्र सरकार, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC), एक्सेल एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड और अमेजन सेलर सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड (प्राइम वीडियो) के खिलाफ दाखिल की है। याचिका के मुताबिक, फिल्म 4 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होनी है।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से CBFC को निर्देश देने की मांग की है कि विवादित सामग्री हटाए जाने तक फिल्म को प्रदर्शन प्रमाणपत्र न दिया जाए या उसे रोक दिया जाए। इसके अलावा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को ऐसे मामलों के लिए नियामक दिशा-निर्देश बनाने का निर्देश देने की भी मांग की गई है।
मिर्जापुर की छवि खराब करने का आरोप
याचिका में आरोप लगाया गया है कि फिल्म निर्माताओं ने वास्तविक मिर्जापुर जिले के नाम और पहचान का इस्तेमाल करते हुए उसे हिंसा, अश्लीलता और आपत्तिजनक सामग्री से जोड़कर दिखाया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे जिले और उत्तर प्रदेश की छवि प्रभावित होती है।
याचिका में कहा गया है कि मिर्जापुर विंध्यवासिनी धाम और GI टैग वाले कालीन तथा पीतल के हस्तशिल्प के लिए जाना जाता है। इसके बावजूद मिर्जापुर की पहचान को अपराध और हिंसा से जोड़ने से स्थानीय निवासियों को मानसिक रूप से अपमानित महसूस करना पड़ता है।
याचिकाकर्ता ने ‘मिर्जापुर’ वेब सीरीज के पिछले सीजन के कंटेंट पर भी सवाल उठाए हैं। याचिका में अत्यधिक गाली-गलौज, यौन सामग्री और हिंसा का आरोप लगाते हुए भारतीय न्याय संहिता, 2023 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के प्रावधानों का हवाला दिया गया है। ये याचिका में लगाए गए आरोप हैं, जिन पर अभी हाईकोर्ट ने कोई फैसला नहीं दिया है।
महिलाओं और बच्चों से जुड़े कंटेंट पर भी आपत्ति
PIL में महिलाओं के चित्रण को लेकर भी आपत्ति जताई गई है। आरोप है कि महिला पात्रों को गाली-गलौज, अपमानजनक व्यवहार और यौन वस्तु की तरह पेश किया गया है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का हवाला देने के साथ बच्चों पर अत्यधिक हिंसक सामग्री के प्रभाव का मुद्दा भी उठाया गया है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि किसी सीरीज या फिल्म को काल्पनिक बताने वाला डिस्क्लेमर अपने आप में पर्याप्त नहीं हो सकता, खासकर तब जब वास्तविक भौगोलिक स्थानों और प्रशासनिक नामों का इस्तेमाल किया गया हो।
याचिका में अमेजन प्राइम वीडियो पर प्रसारित वेब सीरीज ‘तांडव’ से संबंधित सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का भी उल्लेख किया गया है।
PIL से पहले भेजा गया था लीगल नोटिस
याचिकाकर्ता के मुताबिक, हाईकोर्ट जाने से पहले 25 जुलाई 2026 को लीगल नोटिस भेजकर अपनी आपत्तियां उठाई गई थीं।
PIL के साथ सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की 10 अगस्त की एक चिट्ठी भी लगाई गई है, जो ‘मिर्जापुर’ वेब सीरीज के खिलाफ शिकायत के संबंध में अमेजन प्राइम वीडियो को भेजी गई थी। मंत्रालय ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 का उल्लेख करते हुए प्लेटफॉर्म से शिकायत की जांच कर उचित कार्रवाई करने को कहा था।
याचिका के साथ प्राइम वीडियो का जवाब भी लगाया गया है। इसमें कहा गया कि ‘मिर्जापुर’ एक काल्पनिक सीरीज है और दर्शकों को डिस्क्लेमर तथा कंटेंट से जुड़ी जानकारी दी जाती है। प्लेटफॉर्म ने यह भी कहा कि सीरीज वयस्क दर्शकों के लिए रेटेड है और पैरेंटल कंट्रोल की सुविधा उपलब्ध है। प्राइम वीडियो ने शिकायत में बताए गए कानूनी प्रावधानों के उल्लंघन के आरोप से असहमति जताई।
4 सितंबर की रिलीज से पहले अंतरिम रोक की मांग
याचिकाकर्ता ने मामले के लंबित रहने के दौरान भी अंतरिम राहत मांगी है। इसके तहत 4 सितंबर 2026 को प्रस्तावित ‘मिर्जापुर: द मूवी’ की थिएटर रिलीज के साथ उसके ट्रेलर और प्रमोशन पर तब तक रोक लगाने की मांग की गई है, जब तक कथित आपत्तिजनक संदर्भ, अश्लीलता और हिंसक सामग्री हटा नहीं दी जाती।
यह जनहित याचिका संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दाखिल की गई है। उपलब्ध दस्तावेज में हाईकोर्ट का ऐसा कोई आदेश नहीं है, जिसमें इन आरोपों पर फैसला दिया गया हो या याचिकाकर्ता की मांगी गई अंतरिम राहत मंजूर की गई हो।

