सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने अबू धाबी, कुवैत, सिंगापुर और कैनबरा स्थित भारतीय दूतावासों में वाणिज्य दूतावास, पासपोर्ट और वीजा सेवाओं को आउटसोर्स करने की टेंडर प्रक्रिया को रद्द करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को बड़ी राहत देते हुए तीन महीने के भीतर नई टेंडर प्रक्रिया पूरी करने की समयसीमा तय की है और तब तक नागरिक सेवाओं को निर्बाध रूप से जारी रखने के लिए अंतरिम इंतजाम करने की मंजूरी दे दी है।
प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज करते हुए यह निर्णय लिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस संक्रमण काल के दौरान दूतावासों के रोजमर्रा के कामकाज और सार्वजनिक सेवाओं में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए।
अंतरिम इंतजामों के लिए कोर्ट ने दिए तीन विकल्प
शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को अंतरिम व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने के लिए तीन रास्ते दिए हैं। पहले विकल्प के तौर पर, सरकार नया रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी होने और नए सफल बोलीदाताओं को काम सौंपे जाने तक मौजूदा ऑपरेटरों को ही सेवाएं जारी रखने की अनुमति दे सकती है।
दूसरे विकल्प के रूप में, हाईकोर्ट द्वारा रद्द किए गए टेंडर के सबसे कम बोली लगाने वाले (L1) पक्षों को अस्थायी तौर पर यह काम सौंपा जा सकता है। हालांकि, यह व्यवस्था पूरी तरह से सरकार के अपने जोखिम पर होगी और नई चयन प्रक्रिया के अंतिम फैसले के अधीन होगी। इसके अलावा, कोर्ट ने सरकार को अपनी सुविधानुसार कोई भी अन्य व्यावहारिक तंत्र विकसित करने की पूरी छूट दी है।
हाईकोर्ट ने टेंडर प्रक्रिया को माना था मनमाना
यह पूरा कानूनी विवाद दिल्ली हाईकोर्ट के 15 जुलाई के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें कोर्ट ने निविदा प्रक्रिया के तकनीकी मूल्यांकन को मनमाना, अपारदर्शी और निष्पक्षता व पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने पाया था कि टेंडर प्रक्रिया शुरू होने के बाद सरकार ने नियमों और शर्तों में बदलाव किए, जिससे पूरी मूल्यांकन प्रणाली अव्यावहारिक हो गई।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुसार, एक बार खरीद प्रक्रिया शुरू होने के बाद सरकार निविदा की शर्तों में बदलाव नहीं कर सकती। वहीं, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि मूल्यांकन के स्पष्ट कारण न बताने की वजह से सरकार ने खुद ही हाईकोर्ट के इस प्रतिकूल फैसले को आमंत्रित किया है।
कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे दूतावास: सॉलिसिटर जनरल
केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि टेंडर रद्द होने के कारण विदेशों में भारतीय दूतावास गंभीर रूप से कर्मचारियों की कमी का सामना कर रहे हैं। इस वजह से राजनयिकों को गैर-मुख्य वाणिज्य दूतावास संबंधी कामों में लगाना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि जनशक्ति की भारी किल्लत के कारण दूतावास फिलहाल केवल पासपोर्ट नवीनीकरण और वीजा जारी करने जैसी आपातकालीन सेवाओं को ही संभाल पा रहे हैं।
मूल्यांकन के स्पष्ट रिकॉर्ड न दिखाने के आरोप पर मेहता ने सफाई दी कि तकनीकी मूल्यांकन समितियों ने अपने फैसले के कारण दर्ज किए थे, लेकिन सफल बोलीदाताओं की व्यावसायिक और मालिकाना जानकारी को प्रतिस्पर्धी कंपनियों से सुरक्षित रखने के लिए उन्हें अदालत में सार्वजनिक नहीं किया गया।
मुकदमेबाजी के जरिए काम टालने का आरोप
सॉलिसिटर जनरल ने यह आशंका भी जताई कि यह मुकदमा पूर्व ऑपरेटरों द्वारा अपने कार्यकाल को बढ़ाने का एक प्रायोजित प्रयास हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि साल 2011 से यह एक ढर्रा बन गया है कि जब भी किसी ऑपरेटर का कार्यकाल समाप्त होने वाला होता है, तो संक्रमण प्रक्रिया को रोकने के लिए कोई न कोई याचिका दायर कर दी जाती है। मेहता ने कहा कि सरकार ने इस बार इस ढर्रे को तोड़ने का फैसला किया है, जिसके तहत सभी को एक नई और खुली निविदा प्रक्रिया से गुजरना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के उस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया जिसमें इस मामले को वापस हाईकोर्ट भेजकर मूल्यांकन रिकॉर्ड की समीक्षा कराने की मांग की गई थी। पीठ ने कहा कि सरकार को अब केवल तय तीन महीने की अवधि के भीतर नई टेंडर प्रक्रिया को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

