दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा की पीठ ने निजी तस्वीरों के जरिए ब्लैकमेल कर एक महिला से बार-बार बलात्कार करने, जबरन वसूली करने और जान से मारने की धमकी देने के मामले में दोषी पाए गए एक व्यक्ति की 10 साल के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी आपराधिक अपील खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब जब्त किए गए मूल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकाला गया फोरेंसिक डेटा कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) से मेल खाता हो, तो वॉयस सैंपल न लिया जाना अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर नहीं करता। पीठ ने यह भी कहा कि जब प्राथमिक इलेक्ट्रॉनिक डेटा सीधे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने की कोई बाध्यता नहीं होती।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 18 दिसंबर 2017 को दिल्ली के मियांवाली नगर थाने में पीड़िता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से शुरू हुआ था। अभियोजन के अनुसार, जून 2015 में एक वैवाहिक वेबसाइट ‘सिंपलीमैरी डॉट कॉम’ के माध्यम से दोनों का परिचय हुआ और वे लॉन्ग-डिस्टेंस रिलेशनशिप में आ गए। इस दौरान पीड़िता ने अभियुक्त के साथ कुछ निजी तस्वीरें साझा की थीं।
बाद में, जब अभियुक्त के संदिग्ध और अभद्र व्यवहार के कारण पीड़िता ने संबंध समाप्त करने की कोशिश की, तो अभियुक्त ने उसकी निजी तस्वीरों को उसके परिवार और रिश्तेदारों में वायरल करने की धमकी देकर उसे ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। इस डर का फायदा उठाकर उसने पीड़िता से लगभग 5,00,000 रुपये (नकद और बैंक ट्रांसफर के जरिए) वसूले। साथ ही, वॉट्सऐप वीडियो कॉल पर उसे गंभीर शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना दी और खुद को नुकसान पहुंचाने के लिए मजबूर किया।
अभियुक्त ने पीड़िता को मजबूर करके 23 जनवरी 2017 से 25 जनवरी 2017 के बीच दिल्ली के पश्चिम विहार स्थित होटल रेडिसन ब्लू में बुलाया, जहां उसने पीड़िता के साथ बार-बार बलात्कार किया। 18 दिसंबर 2017 को जब अभियुक्त दोबारा उसी होटल में आया और पीड़िता को वहां आने का दबाव बनाया, तो पीड़िता ने अपने परिवार के सहयोग से पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद अभियुक्त को होटल से गिरफ्तार कर लिया गया।
29 नवंबर 2024 को तीस हजारी कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (विशेष अदालत) ने अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376(2)(एन) (एक ही महिला से बार-बार बलात्कार), धारा 384 (जबरन वसूली) और धारा 506 भाग-II (आपराधिक धमकी) के तहत दोषी ठहराया। 24 मार्च 2025 को उसे बलात्कार के लिए 10 साल के कठोर कारावास व 3,13,595 रुपये के जुर्माने, जबरन वसूली के लिए 2 साल और आपराधिक धमकी के लिए 5 साल के कारावास की सजा सुनाई गई, जो साथ-साथ चलनी थीं। इस फैसले के खिलाफ अभियुक्त ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 415 के तहत हाईकोर्ट में अपील दायर की।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि बलात्कार के आरोप पूरी तरह से बाद में गढ़े गए हैं, क्योंकि घटना के दिन की गई पहली पीसीआर कॉल में केवल ब्लैकमेलिंग का जिक्र था, बलात्कार या जबरन वसूली का नहीं। यह भी कहा गया कि पीड़िता जिरह के दौरान होटल के कमरे या मंजिल का नंबर नहीं बता सकी और सितंबर 2017 की कथित घटना की तारीख को लेकर भी उसके बयानों में विरोधाभास था।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि अभियोजन आईपीसी की धारा 375 के तहत पेनिट्रेशन (प्रवेश) के आवश्यक तत्व को साबित करने में विफल रहा और इस संबंध में हाईकोर्ट के राहुल उर्फ भूपिंदर वर्मा बनाम राज्य (रा.रा.क्षे. दिल्ली) के निर्णय का हवाला दिया। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के नितिन बी. निखारे बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा गया कि शादी के वादे के बाद बने सहमति से संबंधों को बलात्कार नहीं माना जा सकता।
इसके अतिरिक्त, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के अनिल मरकंडे एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य के निर्णय पर भरोसा करते हुए अपीलकर्ता ने कॉल रिकॉर्डिंग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया कि न तो वॉयस सैंपल लिए गए और न ही धारा 65-बी का प्रमाणपत्र दिया गया। बचाव पक्ष का दावा था कि पैसों के लेन-देन के विवाद के कारण पीड़िता और उसके परिवार ने जांच अधिकारी के साथ मिलकर उसे झूठे मामले में फंसाया है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक ने दलील दी कि पीड़िता अपनी प्रारंभिक शिकायत, धारा 164 सीआरपीसी के बयान और अदालत में दी गई गवाही में पूरी तरह सुसंगत रही है। यह भी तर्क दिया गया कि होटल सामान्यतः मेहमानों से मिलने आने वाले आगंतुकों का अलग रजिस्टर नहीं रखते, और जब्त मोबाइल फोन से बरामद वैज्ञानिक व फोरेंसिक साक्ष्य पीड़िता के बयानों की पूरी तरह पुष्टि करते हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए बचाव पक्ष के सभी तर्कों को खारिज कर दिया:
- पीसीआर कॉल में बलात्कार के उल्लेख का न होना: हाईकोर्ट ने माना कि आपात स्थिति में की गई कॉल कोई विस्तृत प्राथमिकी नहीं होती। कोर्ट ने टिप्पणी की: “आपातकालीन स्थिति में की गई पीसीआर कॉल में पूरी घटना या उन सभी विवरणों के विस्तृत विवरण की उम्मीद नहीं की जा सकती जो एफआईआर, धारा 164 के बयान या गवाही में दर्ज होते हैं। इसलिए, पीसीआर कॉल में बलात्कार या जबरन वसूली का उल्लेख न होना बलात्कार के आरोप को बाद में गढ़ा गया विचार नहीं बनाता, विशेष रूप से तब जब पीड़िता शुरुआत से अंत तक अपने बयान पर पूरी तरह अडिग रही है।”
- मेडिकल साक्ष्य और नजीरों का अंतर: कोर्ट ने राहुल उर्फ भूपिंदर वर्मा मामले की नजीर को खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता ने अदालत में स्पष्ट गवाही दी है कि उसके साथ बलात्कार हुआ था। इसके अलावा, मेडिकल जांच रिपोर्ट (एमएलसी) में पीड़िता की जांघों पर ब्लेड के कट के निशान पाए गए, जो अभियुक्त द्वारा वीडियो कॉल पर दी गई शारीरिक यातनाओं की पुष्टि करते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नितिन बी. निखारे का मामला यहां लागू नहीं होता, क्योंकि यह शादी के वादे पर बने सहमति के संबंध का साधारण मामला नहीं है।
- धारा 65-बी प्रमाणपत्र की आवश्यकता: जब्त फोन से सीधे निकाले गए डेटा और सीडीआर के मिलान पर कोर्ट ने निर्णय दिया: “जब प्राथमिक साक्ष्य स्वयं न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर दिया गया हो, तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत प्रमाणपत्र की कोई आवश्यकता नहीं होती।”
- अनिल मरकंडे मामले से भिन्नता: कोर्ट ने रेखांकित किया कि अनिल मरकंडे मामले में रिकॉर्डिंग उपकरण कई दिनों तक शिकायतकर्ता के निजी कब्जे में रहा था, जबकि वर्तमान मामले में मोबाइल फोन पुलिस द्वारा विधिवत जब्त किए गए, एफएसएल द्वारा डेटा निकाला गया, और फोन के आईएमईआई (IMEI) नंबर व सीडीआर टाइमस्टैम्प ऑडियो-वीडियो फाइलों से हूबहू मेल खाते हैं। कोर्ट ने कहा: “इस तरह की किसी भी चुनौती के अभाव में, केवल इसलिए ट्रायल कोर्ट के तथ्यात्मक निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है क्योंकि आवाज का नमूना नहीं लिया गया था।”
- झूठे आरोप की दलील साबित करने में विफलता: अभियुक्त द्वारा यह दावा किए जाने पर कि पीड़िता के परिवार ने पैसे मांगने से संबंधित एक सीडी भेजी थी, कोर्ट ने पाया कि उसने वह सीडी कभी अदालत में पेश ही नहीं की। मोइदु के. बनाम केरल राज्य का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने माना कि जब कोई अभियुक्त स्वयं गवाह (DW1) के रूप में गवाही देता है, तो “यह साबित करने का भार उसी पर होता है, हालांकि यह भार ‘उचित संदेह से परे’ साबित करने का नहीं, बल्कि ‘संभावनाओं की प्रबलता’ (प्रीपॉन्डरेंस ऑफ प्रोबेबिलिटी) पर आधारित होता है। यहां अभियुक्त ऐसी संभावनाओं की प्रबलता भी स्थापित नहीं कर सका है।”
- अपराध के तत्वों की पुष्टि: हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मौखिक गवाही, मेडिकल रिपोर्ट और फोरेंसिक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से आईपीसी की धारा 376(2)(एन) के तहत बार-बार बलात्कार, धारा 384 के तहत जबरन वसूली और धारा 506 भाग-II के तहत आपराधिक धमकी के सभी आवश्यक तत्व पूरी तरह साबित होते हैं।
हाईकोर्ट का निर्णय
ट्रायल कोर्ट के फैसले में किसी भी प्रकार की त्रुटि या अवैधता न पाते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ने अभियुक्त के खिलाफ सभी आरोपों को उचित संदेह से परे साबित किया है और अपील को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सतबीर सिंह रत्ती बनाम राज्य (रा.रा.क्षे. दिल्ली)
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील 1099/2025
पीठ: जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा
निर्णय की तिथि: 25 अगस्त 2026

