नशे की हालत में खुद दुर्घटना करने वाले को थर्ड-पार्टी क्लेम नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट ने घटाया मुआवजे का पैसा

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक नशे की स्थिति में स्वयं की लापरवाही से दुर्घटना का शिकार होता है, तो उसके परिजन बीमा कंपनी से सामान्य थर्ड-पार्टी (तीसरे पक्ष) मुआवजे की मांग नहीं कर सकते। अदालत ने एक सड़क हादसे में जान गंवाने वाले मोटरसाइकिल चालक के परिवार को मिलने वाले मुआवजे को करीब 3.44 लाख रुपये से घटाकर सिर्फ 1 लाख रुपये कर दिया है। अदालत का कहना है कि जब कोई चालक दुर्घटना के लिए खुद पूरी तरह जिम्मेदार हो, तो बीमा कंपनी की देनदारी केवल वाहन के अनिवार्य व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा (CPA) तक ही सीमित रहती है।

जस्टिस गीता के. बी. की एकल पीठ ने 16 जुलाई को दिए अपने फैसले में ‘द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड’ की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया। बीमा कंपनी ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के 28 अगस्त 2017 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें हादसे में मारे गए श्रीनिवास के परिजनों (शिवानंद डी. हरिकंत्ला और अन्य) को 3,44,364 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के इस फैसले को बदलते हुए भुगतान की अधिकतम सीमा 1 लाख रुपये निर्धारित की है।

हादसे के समय तय सीमा से तीन गुना अधिक थी अल्कोहल की मात्रा

बीमा कंपनी के रिकॉर्ड के अनुसार, यह घटना 5 फरवरी 2015 की है। बेंगलुरु के बनशंकरी सेकेंड स्टेज में कादिरेनाहल्ली स्थित देवेगौड़ा पेट्रोल पंप के पास श्रीनिवास अपने साथी सुनील को पीछे बैठाकर मोटरसाइकिल चला रहे थे। इसी दौरान उन्होंने वाहन से नियंत्रण खो दिया और गाड़ी सीधे फुटपाथ पर लगे बिजली के खंभे से टकरा गई। इस हादसे में गंभीर चोटें आने के कारण श्रीनिवास की मौके पर ही मौत हो गई थी।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी की वकील प्रीति शशांक ने फोरेंसिक रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि हादसे के वक्त श्रीनिवास के शरीर में अल्कोहल की मात्रा 102.64 मिलीग्राम प्रति 100 मिलीलीटर खून थी। मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 185 के तहत गाड़ी चलाने के लिए कानूनी सीमा केवल 30 मिलीग्राम प्रति 100 मिलीलीटर निर्धारित है, जिससे अधिक होने पर यह एक दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।

READ ALSO  आजम खान को हाईकोर्ट से जमानत मिली, लेकिन अभी जेल में ही रहना पड़ेगा

गलती करने वाला व्यक्ति नहीं उठा सकता थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस का लाभ

जस्टिस गीता ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भले ही बिना किसी की गलती वाली देनदारी (नो-फॉल्ट लायबिलिटी) के मामलों में लापरवाही साबित करना जरूरी नहीं होता, लेकिन यदि पीड़ित खुद ही हादसे का कारण यानी ‘टोर्टफिज़र’ (गलती करने वाला) है, तो वह तब तक सामान्य मुआवजे का हकदार नहीं हो सकता जब तक कि बीमा अनुबंध में इसका स्पष्ट उल्लेख न हो।

READ ALSO  "घोर लापरवाही" और 972 दिनों की देरी: मद्रास हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज की, मुआवजे के भुगतान का दिया आदेश

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘रामखिलाड़ी व अन्य बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी व अन्य (2020)’ का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया था कि खुद गलती करने वाला व्यक्ति थर्ड-पार्टी लायबिलिटी दावों का लाभ नहीं ले सकता और वह केवल व्यक्तिगत बीमा अनुबंध की शर्तों और सीमाओं से ही बंधा होता है।

अदालत ने यह भी गौर किया कि भले ही श्रीनिवास उस मोटरसाइकिल का मालिक नहीं था, लेकिन उसने मालिक की अनुमति से वाहन उधार लिया था। कानूनी नजरिए से, वाहन उधार लेने वाला व्यक्ति सीधे तौर पर ‘मालिक की जगह’ (स्टेप्स इनटू द शूज ऑफ द ओनर) ले लेता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता बीमा कंपनी से केवल 1 लाख रुपये का मुआवजा पाने के हकदार हैं और इससे अधिक एक रुपया भी उन्हें नहीं दिया जा सकता।

READ ALSO  बॉम्बे हाई कोर्ट ने दल-बदल विरोधी कानून के तहत विलय को संरक्षण देने के खिलाफ जनहित याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles