पुडुचेरी में जन्मे और पले-बढ़े बच्चे अपनी स्थानीय मूल निवासी मां के आधार पर अनुसूचित जाति (एससी), अत्यंत पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) या अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण के हकदार हैं। मद्रास हाईकोर्ट ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था से जुड़ी दलीलों को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि यदि माता-पिता दोनों एक ही समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, तो बच्चे को मां के मूल निवास के आधार पर आरक्षण लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती की पीठ ने 27 अगस्त को 28 याचिकाओं के एक समूह पर फैसला सुनाते हुए पुडुचेरी प्रशासन के उस रुख को नामंजूर कर दिया, जिसमें जाति और आरक्षण की पहचान केवल पिता के आधार पर तय करने की बात कही गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि आरक्षण का मूल आधार सामाजिक विषमता, पीड़ा और उससे जुड़ा सामाजिक दंश है, न कि यह कि वंश परंपरा पितृसत्तात्मक है या मातृसत्तात्मक।
संवैधानिक समानता के समक्ष पितृसत्तात्मक दलीलें अमान्य
यह पूरा विवाद तब खड़ा हुआ जब पुडुचेरी प्रशासन ने उन आवेदकों को मूल निवासी श्रेणी के जाति प्रमाण पत्र जारी करने से मना कर दिया, जिनकी माताएं तो पुडुचेरी की मूल निवासी थीं, लेकिन पिता पड़ोसी राज्य तमिलनाडु के जिलों से आकर बसे थे। कुछ मामलों में पिता ने पुडुचेरी का मूल निवासी होने का दावा किया, लेकिन उनके पास दादा के समय के आवश्यक दस्तावेजी प्रमाण नहीं थे।
प्रशासन इन आवेदकों को ‘प्रवासी’ (माइग्रेंट) श्रेणी का प्रमाण पत्र देने को तैयार था, जिससे वे पुडुचेरी में शिक्षा और सरकारी नौकरियों में स्थानीय आरक्षण का लाभ पाने से वंचित हो जाते। प्रशासन का तर्क था कि समाज पितृसत्तात्मक है और किसी विशेष वैधानिक प्रावधान के अभाव में मां के जरिए जाति का निर्धारण नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने प्रशासन के इस तर्क को सिरे से नकारते हुए कहा कि ऐतिहासिक रूप से समाज भले ही पुरुष-प्रधान रहा हो, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), अनुच्छेद 15 (भेदभाव से सुरक्षा) और अनुच्छेद 16 (रोजगार में समान अवसर) के होते हुए इस पूर्वाग्रह को जारी नहीं रखा जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि वंश केवल पिता से चलने और महिला द्वारा पुरुष का निवास स्थान अपनाने जैसी पारंपरिक धारणाएं महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रही समाज की देन हैं।
सामाजिक भेदभाव और परिवेश ही आरक्षण की मुख्य कसौटी
अदालत ने नीतिगत विसंगति को रेखांकित करते हुए कहा कि जब कोई स्थानीय पुरुष दूसरे राज्य की महिला से विवाह करता है और बच्चा पुडुचेरी में जन्म लेकर रहता है, तो उसे आरक्षण का पूरा लाभ मिलता है। इसके विपरीत, जब स्थानीय महिला किसी बाहरी व्यक्ति से शादी करती है और बच्चा उसी परिवेश व समुदाय में पलता-बढ़ता है, तब उसे लाभ से वंचित कर दिया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के ‘रमेशभाई दाभाई नायक बनाम गुजरात राज्य’ मामले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरजातीय या अन्य विवाहों में पिता की जाति मिलने का अनुमान अंतिम या अकाट्य नहीं है। यदि बच्चा यह साबित करता है कि उसका पालन-पोषण मां के समुदाय में हुआ है और उसने उसी सामाजिक पिछड़ेपन, अपमान और कठिनाइयों को झेला है, तो वह आरक्षण का पात्र है। इसके लिए किसी अलग वैधानिक प्रावधान की आवश्यकता नहीं है।
अस्वीकृति आदेश रद्द, प्रमाण पत्र जारी करने के निर्देश
हाईकोर्ट ने पुडुचेरी के 10 नवंबर 2000 के उस पुराने ज्ञापन का भी संदर्भ दिया, जिसमें पिता के निवास को अनिवार्य किया गया था। इस नियम को पहले ही ‘पी. जया बनाम भारत संघ’ मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिससे 1995 का वह नियम बहाल हुआ था जिसमें माता या पिता किसी के भी मूल निवास को आधार मानने की छूट थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले के खिलाफ अपील खारिज कर दी थी।
अदालत ने अधिकारियों द्वारा जारी अस्वीकृति आदेशों को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि पात्र उम्मीदवारों को मां के मूल निवास के आधार पर एससी, एमबीसी या ओबीसी मूल श्रेणी के प्रमाण पत्र जारी किए जाएं, ताकि वे स्थानीय शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण का लाभ ले सकें। साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि जाति का दावा फर्जी पाया जाता है या मां की स्थानीय नागरिकता साबित नहीं होती है, तो प्रशासन आवेदन खारिज करने के लिए स्वतंत्र रहेगा।

