आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी अपनी स्वेच्छा से पति का घर छोड़कर अपने मायके जाती है, तो ऐसे वैवाहिक विवादों को सुलझाने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर नहीं की जा सकती। जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी की खंडपीठ ने एक ही राहत के लिए बार-बार याचिका दाखिल करने को अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना और याचिकाकर्ता पति पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता पति ने अपनी पत्नी की सुपुर्दगी और उसे अदालत के समक्ष पेश करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की थी। पति का आरोप था कि उसकी पत्नी को उसके ससुर (प्रतिवादी संख्या 4) ने अवैध हिरासत में रखा हुआ है।
यह दूसरी बार था जब पति ने एक ही राहत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इससे पहले दायर की गई याचिका में मंगलागिरि रूरल पुलिस स्टेशन और वेमूरु पुलिस स्टेशन के अधिकारियों द्वारा पत्नी को अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया गया था। अदालत द्वारा पूछताछ किए जाने पर पत्नी ने स्वीकार किया था कि वह याचिकाकर्ता से विवाहित है, लेकिन उसने स्पष्ट कहा था कि वह अपनी मर्जी से अपने माता-पिता के साथ रह रही है और उन्हीं के साथ रहना चाहती है। उस समय हाईकोर्ट ने उसके बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए याचिका खारिज कर दी थी और पति को कानून के तहत अन्य कानूनी रास्ते अपनाने की छूट दी थी।
पक्षों की दलीलें
वर्तमान याचिका में याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को सूचित किया कि यह याचिका अब निष्प्रभावी हो चुकी है। वकील ने तर्क दिया कि पिछले अदालती आदेश के बाद पत्नी वापस आकर पति के साथ रहने लगी थी, लेकिन बाद में फिर अपने मायके चली गई, जिसके कारण यह दूसरी याचिका दाखिल करनी पड़ी। हालांकि, इस याचिका के लंबित रहने के दौरान वह एक बार फिर लौट आई और पति के साथ रहने लगी।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से उपस्थित सहायक सरकारी वकील ने अदालत का ध्यान आकर्षित करते हुए बताया कि याचिकाकर्ता ने इन्हीं मांगों के साथ पहले भी याचिका दायर की थी, जिसमें पत्नी ने अदालत में पेश होकर स्पष्ट किया था कि वह अपनी इच्छा से मायके में रह रही है और उस याचिका को खारिज कर दिया गया था।
अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां
मामले के तथ्यों का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पाया कि यह मामला किसी भी तरह से अवैध हिरासत का नहीं है। पीठ ने नोट किया कि यह एक वैवाहिक विवाद है, जहां पत्नी अपनी इच्छा से पति के घर और अपने मायके आती-जाती रहती है।
मामले की सुनवायी करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“पत्नी कभी पति के साथ रहती है और फिर उसे छोड़कर अपने मायके चली जाती है और फिर अपनी मर्जी से पति के पास वापस आ जाती है। यह हमें एक वैवाहिक विवाद प्रतीत होता है। यदि पत्नी बार-बार पति को छोड़ रही है, तो इसका उपाय बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से नहीं, बल्कि अन्य मंचों और अलग कानून के तहत है, क्योंकि यहां किसी भी प्रकार की हिरासत, और विशेष रूप से अवैध हिरासत का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।”
बार-बार एक जैसी याचिकाएं दाखिल करने पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने आगे कहा:
“बार-बार रिट याचिकाएं दाखिल करना और कुछ नहीं बल्कि इस अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और अदालत के कीमती समय की बर्बादी है।”
अदालत का फैसला
हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पति पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया और यह राशि तीन सप्ताह के भीतर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी में जमा कराने का निर्देश दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर जुर्माने की राशि जमा नहीं की जाती है, तो रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) नियमानुसार वसूली के लिए आवश्यक कदम उठाएंगे और अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे। हाईकोर्ट ने मामले को केवल जुर्माना जमा करने की अनुपालन रिपोर्ट देखने के लिए 25 अगस्त 2026 को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही मामले से जुड़ी सभी लंबित विविध याचिकाओं को भी बंद कर दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: पिल्ली वेंकट चिन्नी कृष्णा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं 3 अन्य
वाद संख्या: रिट पिटीशन संख्या 20367/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी
निर्णय की तिथि: 30.07.2026

