इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के एक पूर्व कांस्टेबल को सेवा से हटाए जाने के फैसले को सही ठहराया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहली पत्नी के जीवित रहते और बिना कानूनी तलाक के दूसरी शादी करना सेवा नियमों के तहत गंभीर कदाचार है। ऐसे मामले में बल से बर्खास्तगी की सजा पूरी तरह कानूनी और न्यायसंगत है।
जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता की पीठ ने 13 अगस्त को दिए अपने फैसले में पूर्व कांस्टेबल द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि उसे दी गई बर्खास्तगी की सजा उसकी गलती की तुलना में बहुत अधिक सख्त और असमानुपातिक है। हालांकि, हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता ऐसी कोई परिस्थिति साबित नहीं कर सका, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि अनुशासनात्मक प्राधिकरण द्वारा दी गई सजा अत्यधिक या नियमों के विपरीत थी।
विभागीय नियमों और हिंदू विवाह कानून का उल्लंघन
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि सीआरपीएफ नियमावली का नियम 15 किसी भी बल सदस्य को पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह करने से स्पष्ट रूप से रोकता है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता और दोनों महिलाएं हिंदू धर्म से संबंध रखते हैं, इसलिए उन पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू होता है। इस कानून के तहत पहली शादी के प्रभावी रहते और बिना तलाक की डिक्री के की गई दूसरी शादी अमान्य और गैर-कानूनी मानी जाती है।
विभाग से सच छिपाने का आरोप
मामले के विवरण के मुताबिक, याचिकाकर्ता वर्ष 1988 में सीआरपीएफ में बतौर कांस्टेबल भर्ती हुआ था। कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार, उसकी पहली पत्नी बच्चों के साथ ससुराल छोड़कर चली गई थी और याचिकाकर्ता का दावा था कि काफी तलाश के बाद भी उसका कोई पता नहीं चला। इसके कुछ वर्षों बाद, पहली शादी के कानूनी रूप से कायम रहने के बावजूद उसने विभागीय अनुमति या सूचना दिए बिना दूसरी शादी कर ली।
पूर्व जवान की ओर से तर्क दिया गया था कि उसने अपनी सेवा पंजिका (सर्विस रिकॉर्ड) में दूसरी पत्नी को नामांकित (नॉमिनी) बनाकर विभाग को इसकी जानकारी दे दी थी। उसने यह भी कहा कि इस नामांकन के बावजूद लंबे समय तक उसके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया गया और 2011 में अचानक विभागीय जांच शुरू कर उसे बर्खास्त कर दिया गया, जो कि अनुचित है।
इस तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता ने सर्विस रिकॉर्ड में केवल महिला को अपनी पत्नी दर्ज कराया था, यह उजागर नहीं किया था कि वह उसकी दूसरी पत्नी है। कोर्ट ने इसे विभाग से जानबूझकर तथ्य छिपाने की हरकत माना। अदालत ने कहा कि यदि नामांकन के समय ही उसने पूरी बात बताई होती, तो अनुशासनात्मक कार्रवाई उसी वक्त शुरू हो जाती। विभाग को इस तथ्य का पता 2010-11 में जाकर चला।
न्यायिक समीक्षा की तय सीमाएं
हाईकोर्ट ने कई पूर्व फैसलों का संदर्भ देते हुए दोहराया कि बल के किसी भी सदस्य द्वारा पहली शादी के रहते दूसरा विवाह करना नियम विरुद्ध है और यह गंभीर अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक कार्रवाई में दी गई सजा की न्यायिक समीक्षा केवल उन्हीं मामलों में की जाती है, जहां सजा “अदालत की अंतरात्मा को झकझोर दे” या नियमों के पूरी तरह खिलाफ हो।
याचिकाकर्ता ऐसी कोई आधारभूत वजह प्रस्तुत नहीं कर सका, जिसके कारण कोर्ट दखल दे। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने अनुशासनात्मक अधिकारी के बर्खास्तगी के आदेश को पूरी तरह वैध मानते हुए याचिका को खारिज कर दिया।

