सार्वजनिक महत्व के एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न का निपटारा करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने स्पष्ट किया है कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 के तहत गठित भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन प्राधिकरण (लर्रा – LARRA) के पास अपने स्वयं के अवार्ड (पंचाट) को निष्पादित कराने या लागू करने की शक्ति, अधिकार या क्षेत्राधिकार नहीं है। जस्टिस जसप्रीत सिंह की पीठ ने 45 याचिकाओं के समूह पर निर्णय देते हुए कहा कि लर्रा द्वारा पारित अवार्ड को अधिनियम की धारा 70(2) के तहत एक “डीम्ड डिक्री” (मानी गई डिक्री) का कानूनी दर्जा प्राप्त होता है और इसे केवल आरंभिक सिविल क्षेत्राधिकार वाले प्रधान न्यायालय यानी जिला अदालत (डिस्ट्रिक्ट कोर्ट) के समक्ष ही निष्पादित कराया जा सकता है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि निष्पादन करने वाली जिला अदालत केवल एक निष्पादक शाखा (एक्ज़ीक्यूटरी आर्म) के रूप में कार्य करेगी। जिला अदालत अवार्ड के गुण-दोष (मेरिट्स) पर आपत्तियों पर विचार नहीं कर सकती, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) की धारा 47 लागू नहीं कर सकती और न ही अवार्ड के पीछे जा सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कानूनी विवाद 45 याचिकाओं के एक समूह से उत्पन्न हुआ था। इसमें अधिग्रहित करने वाली संस्थाओं—सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) की 4थीं बटालियन द्वारा 33 याचिकाएं, उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीडा) द्वारा 8 याचिकाएं और लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) द्वारा 1 याचिका—ने अपने संदर्भ अवार्डों को निष्पादित कराने के लर्रा के क्षेत्राधिकार को चुनौती दी थी। इसके साथ ही, भूस्वामियों द्वारा लर्रा के समक्ष लंबित अपने निष्पादन मामलों के शीघ्र निस्तारण के निर्देश की मांग को लेकर 3 याचिकाएं दाखिल की गई थीं।
एसएसबी से जुड़े मामलों में, लखनऊ की मोहनलालगंज तहसील स्थित ग्राम बेंडोवा और जगरोली में एसएसबी के फ्रंटियर मुख्यालय की स्थापना के लिए 14.988 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया था। अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 2015 में पारित अवार्ड के बाद, भूस्वामियों ने 2013 के अधिनियम की धारा 64 के तहत मुआवजे में वृद्धि की मांग की। ऐसे ही एक संदर्भ (मिस. केस संख्या 9/2022, विशंभर बनाम स्टेट) में, लर्रा ने ब्याज और 100 प्रतिशत सोलेशियम (तुष्टि) के साथ मुआवजे की राशि बढ़ा दी। हाईकोर्ट द्वारा एसएसबी की विलंबित अपील खारिज किए जाने के बाद, भूस्वामी ने सीधे लर्रा के समक्ष ही निष्पादन वाद संख्या 16/2024 दायर कर दिया। इन निष्पादन कार्यवाहियों में, लर्रा ने भू-राजस्व के बकाए की भांति राशि वसूलने के कड़े आदेश पारित किए, एसएसबी अधिकारियों को दीवानी कारावास के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किए और कुर्की के लिए बैंक खातों के विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
यूपीडा से जुड़े मामलों में, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के लिए लखनऊ के ग्राम शिवलर में अधिग्रहित भूमि के संबंध में लर्रा ने अप्रैल 2024 में बढ़े हुए मुआवजे के अवार्ड पारित किए। इसके बाद शुरू हुई निष्पादन कार्यवाहियों में लर्रा ने धनराशि जमा करने और कुर्की के लिए बैंक खातों का विवरण देने का निर्देश दिया। उधर एलडीए की याचिका (एलडीए बनाम रामरती) में, लखनऊ के ग्राम बरगवां में भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामले में लर्रा ने मुआवजे की दर बढ़ाकर 10,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर कर दी। एलडीए ने लर्रा द्वारा निष्पादन कार्यवाही (एक्ज़ीक्यूशन केस संख्या 13/2024) चलाने के क्षेत्राधिकार पर आपत्ति दर्ज कराई, जिसे लर्रा ने 19 दिसंबर 2025 को खारिज कर दिया था।
पक्षकारों की दलीलें और प्रतिनिधित्व
इस मामले में विभिन्न पक्षकारों की ओर से कई अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा:
- अधिग्रहण करने वाली संस्थाओं की ओर से:
- सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) की 4थीं बटालियन की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री पवन अवस्थी ने भारत के अपर सॉलिसिटर जनरल (एएसजीआई) के साथ मुख्य बहस की।
- उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीडा) की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री अभिनीत जायसवाल ने दलीलें पेश कीं।
- लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मुकुंद तिवारी ने अधिवक्ता श्री भानु बाजपेयी के साथ पक्ष रखा।
- शीघ्र निस्तारण की मांग करने वाले भूस्वामियों की तीन याचिकाओं (रिट याचिका संख्या 2354, 2381 और 2399/2026) में अधिवक्ता श्री विजय कुमार श्रीवास्तव पेश हुए।
- भूस्वामियों और निजी प्रतिवादियों की ओर से:
- भूस्वामियों और निजी प्रतिवादियों की ओर से बहस की अगुवाई श्री विजय कुमार श्रीवास्तव और श्री मुस्तफा अहमद खान ने की। उनके साथ श्री अमित जायसवाल, सुश्री रानी सिंह, श्री हर्षवर्धन सिंह, सुश्री अमृता यादव, श्री क्षेमेंद्र शुक्ला, श्री अंकित वर्मा, श्री प्रभात कुमार और श्री राम धीरज उपस्थित रहे।
- उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से:
- राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व विद्वान अपर महाधिवक्ता ने मुख्य स्थायी अधिवक्ता (सीएससी) के सहयोग से किया।
अधिग्रहण करने वाली संस्थाओं (एसएसबी, यूपीडा और एलडीए) के तर्क
अधिग्रहण करने वाली संस्थाओं के वकीलों ने तर्क दिया कि लर्रा अधिनियम की धारा 51 के तहत स्थापित एक “प्राधिकरण” (अथॉरिटी) है, कोई अदालत नहीं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि धारा 53 के तहत सात वर्ष के अनुभव वाले किसी अधिवक्ता को भी पीठासीन अधिकारी नियुक्त किया जा सकता है।
वकीलों ने दलील दी कि 2013 के अधिनियम की धारा 60(1) सीपीसी के केवल विशिष्ट और सीमित प्रावधानों (जैसे गवाहों को बुलाना, दस्तावेजों की खोज और समीक्षा) को ही अपनाती है, जबकि अंतर्निहित शक्तियों और निष्पादन से जुड़े प्रावधानों (सीपीसी की धारा 36 से 74 और आदेश 21) को इसमें जानबूझकर शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने इसकी तुलना निरसित भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 53 से की, जिसने संदर्भ अदालत पर पूरी सीपीसी लागू की थी। उमेश गोयल बनाम एच.पी. कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड और भाग्योदय को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम रवींद्र बालकृष्ण पटेल के फैसलों पर भरोसा जताते हुए उन्होंने कहा कि धारा 70(2) के तहत डीमिंग फिक्शन (विधिक परिकल्पना) केवल अवार्ड को अंतिम रूप देने और सिविल अदालत से निष्पादन कराने के लिए डिक्री का दर्जा देती है, न कि प्राधिकरण को स्वयं इसे निष्पादित करने की शक्ति प्रदान करती है। इसके अलावा, धारा 63 के तहत सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार पर रोक केवल भूमि अधिग्रहण विवादों के निपटारे तक सीमित है और यह डिक्री निष्पादित करने से सिविल कोर्ट को नहीं रोकती।
भूस्वामियों के तर्क
इसके विपरीत, भूस्वामियों के विद्वान वकीलों ने तर्क दिया कि 2013 का अधिनियम त्वरित निस्तारण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाया गया एक संपूर्ण और लाभकारी कानून है। उन्होंने कहा कि धारा 60(3) लर्रा को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के आधार पर अपनी प्रक्रिया स्वयं तय करने का अधिकार देती है, और किसी विवाद का अधिनिर्णय (फैसला) करने की शक्ति में स्वाभाविक रूप से अपने आदेशों को लागू कराने की शक्ति भी शामिल होती है। उन्होंने कहा कि अनिवार्य अधिग्रहण झेलने वाले भूस्वामियों को सिविल अदालतों में धकेलना अत्यधिक कठिनाई पैदा करेगा और यह कानून के उद्देश्यों के विपरीत होगा। उन्होंने 4 अगस्त 2022 की राज्य अधिसूचना, 21 फरवरी 2024 के सरकारी पत्र और 17 मई 2024 के हाईकोर्ट के परिपत्र का भी हवाला दिया, जिनका उल्लेख खंडपीठ ने चंद्रभान यादव बनाम यूपी राज्य में किया था, और तर्क दिया कि लर्रा के पीठासीन अधिकारियों को निष्पादन क्षेत्राधिकार पहले ही सौंपा जा चुका है।
उत्तर प्रदेश राज्य का रुख
उत्तर प्रदेश के अपर महाधिवक्ता ने 4 अगस्त 2022 की अधिसूचना और चंद्रभान यादव मामले के निर्णय के आधार पर लर्रा के निष्पादन क्षेत्राधिकार का समर्थन करते हुए लिखित निर्देश प्रस्तुत किए।
हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण
विधायी ढांचे का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—यूपी आवास एवं विकास परिषद बनाम जैनुल इस्लाम और गिरनार ट्रेडर्स बनाम महाराष्ट्र राज्य—का उल्लेख करते हुए “संदर्भ द्वारा विधान” (लेजिस्लेशन बाई रेफरेंस) और “समावेशन द्वारा विधान” (लेजिस्लेशन बाई इनकार्पोरेशन) के बीच अंतर स्पष्ट किया। अदालत ने माना कि जहां 1894 के पुराने कानून ने संदर्भ के माध्यम से पूरी सीपीसी को लागू किया था, वहीं 2013 के कानून की धारा 60(1) ने सीपीसी के केवल कुछ चुनिंदा प्रावधानों को ही समाहित किया है। विधायिका ने सीपीसी के आदेश 21 के तहत निष्पादन के संपूर्ण प्रावधानों को पूरी तरह बाहर रखा है।
अदालत ने कहा कि यद्यपि धारा 109(2)(क्यू) के साथ पठित धारा 60(1)(जी) उपयुक्त सरकार को नियम बनाकर लर्रा को अतिरिक्त शक्तियां प्रदान करने का अवसर देती है, लेकिन उत्तर प्रदेश नियम, 2016 के तहत निष्पादन की शक्ति देने वाला ऐसा कोई नियम नहीं बनाया गया है।
अंतर्निहित शक्तियों के दावे और धारा 60(3) पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कौशल किशोर बनाम डीडीसी के पूर्ण पीठ के फैसले का हवाला दिया और रेखांकित किया कि अंतर्निहित शक्तियां पारंपरिक अदालतों में निहित होती हैं, सांविधिक प्राधिकरणों में नहीं—जब तक कि कानून द्वारा वे स्पष्ट रूप से न दी गई हों। अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि धारा 60(3) के तहत प्रक्रियात्मक विनियमन की शक्ति का इस्तेमाल “लर्रा के लिए निष्पादन की शक्ति को गुप्त रूप से जुटाने हेतु ट्रोजन हॉर्स के रूप में” नहीं किया जा सकता।
धारा 70(2) के तहत कानूनी कल्पना के प्रभाव का विश्लेषण करते हुए अदालत ने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह का हवाला दिया और कहा कि किसी अवार्ड को डीम्ड डिक्री का दर्जा देना उसे अंतिम रूप और प्राङ्न्याय (रेस जुडिकाटा) का प्रभाव देता है, लेकिन यह अपने आप उस प्राधिकरण को निष्पादन की शक्तियां प्रदान नहीं करता जिसके पास ऐसी शक्ति मौजूद ही नहीं है। रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल एक्ट 1987, यूपी पब्लिक सर्विसेज (ट्रिब्यूनल) एक्ट 1976, रेरा (RERA) एक्ट 2016 और मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम 1996 जैसे कानूनों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि जब भी विधायिका किसी न्यायाधिकरण या प्राधिकरण को अपने आदेश लागू करने या सिविल अदालत के जरिए उन्हें निष्पादित कराने की शक्ति देना चाहती है, तो वह कानून में इसका स्पष्ट प्रावधान करती है।
4 अगस्त 2022 की सरकारी अधिसूचना पर अदालत ने स्पष्ट किया कि वह पुराने 1894 के अधिनियम की धारा 3(डी) के तहत जारी की गई थी, ताकि पुराने कानून के लंबित मामलों के लिए लर्रा पीठासीन अधिकारियों को विशेष न्यायिक अधिकारी नियुक्त किया जा सके। वह अधिसूचना 2013 के अधिनियम के तहत निष्पादन की शक्तियां प्रदान नहीं करती।
निष्पादन के सही माध्यम को तय करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“सांविधिक प्रावधानों के विस्तृत विश्लेषण और व्यापक चर्चा के बाद यह स्पष्ट होता है कि निष्पादन की शक्ति न तो कानून में प्रदान की गई है और न ही नियम बनाने की शक्ति के तहत इसके लिए कोई नियम बनाए गए हैं। इसलिए, निष्पादन की शक्ति को कानून में या लर्रा के लिए अपने आप नहीं जोड़ा जा सकता। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई व्यक्ति बिना किसी उपचार के रह जाता है। कानून में यह स्पष्ट रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि लर्रा द्वारा पारित अवार्ड एक डीम्ड डिक्री का दर्जा प्राप्त करता है और यह डीम्ड डिक्री निष्पादनीय हो जाती है। इस उद्देश्य के लिए निष्पादन सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत यानी जिला अदालत द्वारा किया जाएगा, जिसके पास डिक्री को निष्पादित कराने के लिए सभी न्यायिक और कानूनी संसाधन तथा दंडात्मक शक्तियों सहित आवश्यक साधन मौजूद हैं।”
हालांकि, हाईकोर्ट ने निष्पादन के दौरान जिला अदालत की भूमिका को कड़ाई से सीमित करते हुए कहा:
“केवल इसलिए कि अवार्ड एक डिक्री का दर्जा प्राप्त कर लेता है जिसे जरूरत पड़ने पर निष्पादन के लिए जिला अदालत के समक्ष पेश किया जा सकता है, निष्पादन करने वाली अदालत केवल एक निष्पादक शाखा (एक्ज़ीक्यूटरी आर्म) के रूप में कार्य करेगी। वह खुद को केवल निष्पादन तक ही सीमित रखेगी और सीपीसी के तहत परिकल्पित निष्पादन अदालत की न्यायिक शक्तियों और भूमिका को नहीं अपनाएगी।”
अदालत ने आगे स्पष्ट किया:
“2013 के अधिनियम के तहत, एक बार जब अवार्ड डीम्ड डिक्री का दर्जा प्राप्त कर लेता है और इसे लागू करने के लिए जिला अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो जिला अदालत को केवल इसे लागू कराने का कार्य करना होगा और इसमें मेरिट्स पर फैसला करने की शक्ति शामिल नहीं है।”
अदालत ने स्पष्ट रूप से सीपीसी की धारा 47 की प्रयोज्यता को खारिज कर दिया और समझाया कि निष्पादन के दौरान अवार्ड के गुण-दोष पर आपत्तियों को सुनना अधिनियम की धारा 63 के तहत तय क्षेत्राधिकार की रोक का उल्लंघन होगा।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि एक बार अवार्ड को अंतिम रूप मिल जाने के बाद, मुआवजा एक स्पष्ट विधिक अधिकार बन जाता है जिसे संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत संरक्षण प्राप्त है। यदि राज्य या उसके उपक्रम भुगतान में मनमाना विलंब करते हैं, तो पीड़ित भूस्वामी इसे लागू कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत हाईकोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार का सहारा ले सकते हैं, जैसा कि यूनीटेक लिमिटेड बनाम टीएसआईआईसी और सूर्या कंस्ट्रक्शन बनाम यूपी राज्य जैसे मामलों में माना गया है।
हाईकोर्ट ने सरकार को विधायी सुधार की सिफारिश करते हुए कहा:
“अवार्ड धारकों को भारी असुविधा से बचाने और नागरिकों के प्रति ‘कल्याणकारी राज्य’ की अवधारणा को ध्यान में रखते हुए, राज्य सरकार के लिए यह उचित होगा कि वह स्थिति को स्पष्ट करने, निश्चितता लाने और अवार्डों के सुगम निष्पादन के लिए एक एकीकृत और मजबूत तंत्र के तहत स्वयं अथॉरिटी को ही निष्पादन की शक्ति प्रदान करने हेतु अपनी नियम बनाने की शक्ति का उपयोग करने पर विचार करे। इससे अवार्ड धारकों को पहले निर्णय और फिर निष्पादन के लिए अलग-अलग मंचों पर भटकने और अनुचित उत्पीड़न से भी बचाया जा सकेगा।”
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
अपने निष्कर्षों को संक्षेप में प्रस्तुत करते हुए हाईकोर्ट ने निर्णय दिया:
“(क) 2013 के अधिनियम के तहत, लर्रा के पास अपने स्वयं के अवार्ड को निष्पादित करने की शक्ति नहीं है, क्योंकि लर्रा को कोई विशिष्ट शक्ति नहीं दी गई है और न ही राज्य/उपयुक्त सरकार द्वारा इस संबंध में ऐसी शक्ति देने वाले कोई नियम बनाए गए हैं।”
“(ख) राज्य की 04.08.2022 की अधिसूचना, जिस पर राज्य सरकार ने भरोसा जताया है, 2013 के अधिनियम के तहत लर्रा को अपने अवार्ड को निष्पादित करने की शक्ति प्रदान नहीं करती है।”
“(ग) लर्रा 2013 के अधिनियम की धारा 51 और 64 के तहत संदर्भित मामलों के न्यायनिर्णयन (अधिनिर्णय) के उद्देश्य से गठित एक प्राधिकरण है, और न्यायनिर्णयन की ऐसी शक्तियों में निष्पादन की शक्ति शामिल नहीं है। न ही ऐसी शक्तियों का प्रयोग प्राधिकरण द्वारा अधिनियम की धारा 60(3) के तहत या अंतर्निहित शक्तियों की आड़ में किया जा सकता है।”
“(घ) लर्रा का अवार्ड एक डिक्री का दर्जा प्राप्त करता है, इसे जिला अदालत द्वारा एक डिक्री के रूप में निष्पादित किया जा सकता है जो केवल एक निष्पादक शाखा के रूप में कार्य करेगी। लर्रा के अवार्ड का निष्पादन करते समय जिला अदालत को अवार्ड को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाले गुण-दोष के मामलों पर फैसला करने या अवार्ड के पीछे जाने का अधिकार नहीं होगा। लर्रा अवार्ड के निष्पादन के दौरान सीपीसी की धारा 47 के प्रावधान लागू नहीं होंगे, जैसा कि इस फैसले में स्पष्ट किया गया है।”
“(ङ) 2013 के अधिनियम की धारा 63 में निहित सिविल अदालत के क्षेत्राधिकार पर रोक सीमित है और यह केवल उन मामलों के संदर्भ में लागू होती है जो अधिनियम की धारा 51 और 64 के तहत विशेष रूप से लर्रा द्वारा संज्ञेय हैं। यह रोक लर्रा द्वारा पारित अवार्ड के निष्पादन के उद्देश्य से जिला अदालत पर लागू नहीं होती है।”
तदनुसार, हाईकोर्ट ने अधिग्रहण करने वाली संस्थाओं (एसएसबी, यूपीडा और एलडीए) द्वारा दायर याचिकाओं को स्वीकार कर लिया और निष्पादन शक्तियों का प्रयोग करते हुए लर्रा द्वारा पारित सभी आदेशों को क्षेत्राधिकार से बाहर मानते हुए रद्द कर दिया। इसके साथ ही, भूस्वामियों द्वारा त्वरित निस्तारण के लिए दायर तीन याचिकाओं को निष्प्रभावी होने के कारण निस्तारित कर दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: लखनऊ विकास प्राधिकरण बनाम रामरती (और संबंधित याचिकाएं)
वाद संख्या: मैटर अंडर आर्टिकल 227 नंबर 143 ऑफ 2026 (44 संबंधित याचिकाओं के साथ)
पीठ: जस्टिस जसप्रीत सिंह
निर्णय की तिथि: 28 सितंबर 2026

