उम्मीदवारों को राहत देने के लिए अनिवार्य योग्यताओं में छूट नहीं दे सकतीं अदालतें: कृषि शिक्षक भर्ती मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शिक्षक (कृषि) के पदों पर चल रही भर्ती प्रक्रिया में बीएड (B.Ed.) की अनिवार्य योग्यता में एकमुश्त अंतरिम छूट देने की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। मामला जस्टिस विभु दत्त गुरु की एकल पीठ के समक्ष आया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पात्रता मानदंड और योग्यता के मानक तय करना पूरी तरह से नियम बनाने वाले प्राधिकरण या राज्य सरकार का अधिकार क्षेत्र है, और अदालतें व्यक्तिगत उम्मीदवारों को समायोजित करने के लिए अपने विचार नहीं थोप सकतीं या अनिवार्य भर्ती मानदंडों को माफ नहीं कर सकतीं।

पृष्ठभूमि

यह याचिका विष्णु दित्य राज के नेतृत्व में 65 कृषि स्नातक उम्मीदवारों द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता अगस्त 2026 में विज्ञापित ई-कैडर और टी-कैडर के तहत शिक्षक (कृषि) के पदों के लिए जारी भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति मांग रहे थे। वर्ष 2019 में बनाए गए भर्ती नियमों के तहत कृषि शिक्षकों के लिए बीएड डिग्री अनिवार्य योग्यता के रूप में निर्धारित नहीं की गई थी।

हालांकि, अशोकानंद पटेल व अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य (WPS सं. 3309/2024, निर्णय 5 फरवरी 2025) के मामले में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 2019 के नियमों के तहत दी गई छूट को असंवैधानिक और अधिकारों से परे (अल्ट्रा वायर्स) घोषित कर दिया था। राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) विनियम 2014 के अनुसार भर्ती मानदंड तय करने के डिवीजन बेंच के निर्देश के बाद, राज्य सरकार ने 13 फरवरी 2026 को गजट अधिसूचना जारी कर बीएड योग्यता को अनिवार्य बना दिया था। इसके बाद 28 जुलाई 2026 को एक संक्षिप्त विज्ञापन जारी किया गया, जिसमें आवेदन की अंतिम तिथि 2 सितंबर 2026 तय की गई थी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी और अधिवक्ता ईशान सलूजा ने तर्क दिया कि उम्मीदवार बीएड डिग्री की अनिवार्यता तय करने के राज्य के अधिकार को चुनौती नहीं दे रहे हैं। उनकी मुख्य शिकायत यह है कि पूर्व में पात्र रहे उम्मीदवारों को बिना कोई उचित संक्रमण काल (ट्रॉन्जिशनल पीरियड) दिए नई शर्त लागू कर दी गई। उन्होंने कहा कि चूंकि बीएड पाठ्यक्रम को पूरा करने में दो शैक्षणिक वर्ष लगते हैं, इसलिए उम्मीदवार इतने कम समय में यह डिग्री हासिल नहीं कर सकते थे। याचिकाकर्ताओं ने अनुरोध किया कि उन्हें इस शर्त पर परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाए कि वे कोर्ट या सरकार द्वारा तय समय सीमा के भीतर यह योग्यता हासिल कर लेंगे।

याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता विवेक वर्मा और छत्तीसगढ़ कर्मचारी चयन मंडल की ओर से अधिवक्ता अविनाश सिंह ने तर्क दिया कि वैधानिक नियमों और एनसीटीई (NCTE) विनियमों के तहत निर्धारित योग्यताओं में कोई भी उम्मीदवार छूट का दावा नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि पुरानी छूट को डिवीजन बेंच पहले ही असंवैधानिक करार दे चुकी है, ऐसे में किसी भी प्रकार की अंतरिम राहत देने की गुंजाइश नहीं बचती।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

मामले का परीक्षण करते हुए जस्टिस विभु दत्त गुरु ने टिप्पणी की कि बीएड पात्रता से जुड़ा मुख्य विवाद पहले ही डिवीजन बेंच द्वारा अशोकानंद पटेल व अन्य मामले में तय किया जा चुका है। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट निर्देश दिए थे:

“उपरोक्त चर्चाओं के आलोक में, 2019 के नियमों के विवादित प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ विभिन्न हाईकोर्ट द्वारा प्रतिपादित कानून के आधार पर, 2019 के नियमों के तहत 05.03.2019 को राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के उस अंश को, जो कृषि विषय के शिक्षकों के लिए B.Ed./D.Ed./T.E.T. की आवश्यक योग्यता से छूट देता है, असंवैधानिक और अल्ट्रा वायर्स घोषित किया जाता है। साथ ही यह निर्णय दिया जाता है कि जिन उम्मीदवारों के पास B.Ed. की डिग्री है, वे ही NCTE द्वारा बनाए गए 2014 के नियमों के अनुसार शिक्षक (कृषि) के पद पर नियुक्ति के लिए पात्र हैं।”

डिवीजन बेंच ने आगे निर्देश दिया था:

“छत्तीसगढ़ राज्य सरकार को निर्देश दिया जाता है कि वह शिक्षक (कृषि) के पद पर नियुक्ति के लिए आवश्यक योग्यता B.Ed. को शामिल करे और 2014 के नियमों के प्रावधानों के अनुसार आगे बढ़े।”

याचिकाकर्ताओं की अंतरिम राहत की मांग पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि पुरानी छूट को पहले ही असंवैधानिक ठहराया जा चुका है, इसलिए न्यायिक आदेश के जरिए छूट देना अनिवार्य नियमों का उल्लंघन होगा।

अनुच्छेद 226 के तहत अदालतों के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा:

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“यह कानून का सुस्थापित सिद्धांत है कि पात्रता मानदंड, न्यूनतम योग्यताएं और सेवा नियम तय करना पूरी तरह से नियम बनाने वाले प्राधिकरण या राज्य सरकार का काम है और अदालतें व्यक्तिगत उम्मीदवारों को समायोजित करने के लिए अपने विचार नहीं रख सकतीं या अनिवार्य नौकरी मानदंडों को माफ नहीं कर सकतीं। अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र केवल यह जांचता है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया मनमानी, दुर्भावनापूर्ण या असंवैधानिक है या नहीं, न कि मानक योग्यताओं में छूट देने के लिए है।”

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि उम्मीदवार मौजूदा वैधानिक नियमों को पूरा किए बिना भर्ती में शामिल होने के अधिकार का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने याचिका को गुण-दोष से रहित मानते हुए प्रारंभिक स्तर (मोशन स्टेज) पर ही खारिज कर दिया।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: विष्णु दित्य राज एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य

वाद संख्या: WPS No. 6260 of 2026

पीठ: जस्टिस विभु दत्त गुरु

निर्णय की तिथि: 20/08/2026

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