नए आपराधिक कानूनों के तहत एक अहम कानूनी विवाद का निपटारा करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुडेजा शामिल हैं, ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 223(1) के तहत मैजिस्ट्रेट को प्रस्तावित आरोपी को नोटिस जारी करने से पहले शिकायतकर्ता और गवाहों का शपथ पर परीक्षण करना होगा, तथा किसी अपराध का औपचारिक संज्ञान आरोपी को सुनवाई का अवसर देने के बाद ही लिया जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 18 मार्च 2026 को एकल पीठ द्वारा दिए गए एक रेफरेंस के बाद खंडपीठ के समक्ष विचारार्थ आया। एकल पीठ ने डॉ रीता बख्शी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह रेखांकित किया था कि निजी शिकायत पर मैजिस्ट्रेट द्वारा किस चरण में “संज्ञान” लिया जाता है और बीएनएसएस की धारा 223(1) के पहले परंतुक के तहत आरोपी को नोटिस किस समय दिया जाना चाहिए, इसे लेकर विभिन्न न्यायालयों की व्याख्याओं में भिन्नता है।
इस संदर्भ में दो याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की गई:
- सीआरएल.एम.सी. 2551/2025, जो प्रस्तावित आरोपी डॉ रीता बख्शी द्वारा दायर की गई थी। इसमें उन्होंने साकेत कोर्ट के न्यायिक मैजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी-03 के 21 जनवरी 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत शिकायतकर्ता के समन-पूर्व साक्ष्य दर्ज करने से पहले ही उन्हें नोटिस जारी कर दिया गया था।
- सीआरएल.एम.सी. 3169/2026, जो अनिता रानी मेहरा और अन्य द्वारा दायर की गई थी। इसमें साकेत कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-05 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसने निजी शिकायत प्राप्त होते ही आरोपी को नोटिस जारी करने के मैजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा था।
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) के तहत स्थापित स्थिति यह थी कि मैजिस्ट्रेट पहले धारा 190 के तहत संज्ञान लेता था और उसके बाद धारा 200 के तहत शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज करता था, जिसमें आरोपी को सुनवाई का कोई अधिकार नहीं था। लेकिन बीएनएसएस की धारा 223(1) में “क्षेत्राधिकार रखते हुए संज्ञान लेते समय” शब्द जोड़े गए और साथ ही एक अनिवार्य पहला परंतुक शामिल किया गया, जो आरोपी को सुनवाई का अवसर दिए बिना संज्ञान लेने पर रोक लगाता है।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता अनिता रानी मेहरा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पवन नारंग ने दलील दी कि बीएनएसएस की धारा 223(1) का पहला परंतुक झूठे आरोपों और अवांछित उत्पीड़न के खिलाफ एक वैधानिक सुरक्षा कवच है। बीएनएसएस की धारा 210, 223, 225, 226 और 227 का संयुक्त संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता और गवाहों का परीक्षण अनिवार्य रूप से आरोपी को नोटिस जारी करने से पहले होना चाहिए। यदि शिकायत दर्ज होते ही असत्यापित आरोपों पर नोटिस जारी किया जाएगा, तो आधारहीन शिकायतों के कारण निर्दोष लोगों को अदालतों के चक्कर काटने पड़ेंगे और मैजिस्ट्रेट का धारा 226 के तहत प्रारंभिक स्तर पर ही शिकायत खारिज करने का अधिकार निष्प्रभावी हो जाएगा।
डॉ रीता बख्शी की ओर से पेश अधिवक्ता राकेश मल्होत्रा ने इन दलीलों का समर्थन करते हुए कहा कि धारा 223(1) में “समय” शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि गवाहों और शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करना संज्ञान लेने के बाद की प्रक्रिया नहीं, बल्कि संज्ञान की प्रक्रिया का ही अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने कहा कि आरोपी को दी जाने वाली सुनवाई तभी सार्थक हो सकती है जब उसे शिकायत के साथ-साथ दर्ज बयानों की प्रति भी उपलब्ध कराई जाए।
केंद्र सरकार की ओर से पेश स्टैंडिंग काउंसिल अमित तिवारी ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता का परीक्षण संज्ञान की प्रक्रिया का हिस्सा है और आरोपी को सुनना अनिवार्य है। हालांकि, उन्होंने कहा कि कानून में इसका कोई कठोर क्रम तय नहीं किया गया है। मैजिस्ट्रेट के पास यह अधिकार होना चाहिए कि वह मामले की प्रकृति को देखते हुए—जैसे लोक सेवकों द्वारा दायर शिकायतों या केवल दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित मामलों में—बयान दर्ज करने से पहले या बाद में नोटिस जारी कर सके।
राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक अमन उस्मान ने तर्क दिया कि समन-पूर्व साक्ष्य दर्ज करने से पहले ही शुरुआती स्तर पर नोटिस दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह परंतुक इसलिए लाया गया है ताकि आरोपी क्षेत्राधिकार या कानूनी बाधाओं से जुड़े शुरुआती मुद्दे उठा सके, जिससे गैर-रखरखाव योग्य शिकायतों में अदालत का कीमती समय बर्बाद न हो।
शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजन चावला ने दलील दी कि धारा 223 काफी हद तक पुरानी धारा 200 के समान है और संज्ञान लेने की वास्तविक शक्ति धारा 210 में निहित है। उन्होंने कहा कि आरोपी को शिकायतकर्ता के समन-पूर्व साक्ष्य में दखल देने या भाग लेने का कोई अधिकार नहीं है, और नोटिस के बाद दी जाने वाली सुनवाई केवल इस बिंदु तक सीमित होनी चाहिए कि क्या शिकायत से प्रथम दृष्टया कोई मामला बनता है या नहीं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
खंडपीठ ने पाया कि जहां बीएनएसएस की धारा 210 बिना किसी बड़े बदलाव के सीआरपीसी की धारा 190 के अनुरूप है, वहीं धारा 223 में दो महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं: पहला, “क्षेत्राधिकार रखते हुए संज्ञान लेते समय” शब्दों का जोड़ा जाना और दूसरा, आरोपी को संज्ञान से पहले सुनवाई का अधिकार देने वाला पहला परंतुक।
धारा में प्रयुक्त “समय” (while) शब्द के अर्थ का विश्लेषण करते हुए पीठ ने कहा:
“इसलिए, सीआरपीसी की पुरानी स्थिति के विपरीत, जहां शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों का परीक्षण मैजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने के बाद होता था, विधायिका ने ‘समय’ शब्द का प्रयोग करके शिकायतकर्ता और गवाहों के परीक्षण की प्रक्रिया को शिकायत पर मैजिस्ट्रेट द्वारा अपराध का संज्ञान लेने की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा बना दिया है।”
पीठ ने माना कि एकल पीठ के मन में यह संशय इसलिए उत्पन्न हुआ क्योंकि पुरानी सीआरपीसी के न्यायिक उदाहरणों को नए बीएनएसएस के बदले हुए विधायी ढांचे पर उसी रूप में लागू करने का प्रयास किया गया था।
धारा 223(1) के पहले परंतुक के उद्देश्य को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति को आपराधिक मामले में तलब करना अत्यंत गंभीर विषय है, जिससे उसकी सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा प्रभावित होती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा डॉ लोकेश बी.एच. बनाम कर्नाटक राज्य (2026) में दोहराए गए ‘मिस्चीफ रूल’ (कमी दूर करने का नियम) का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा:
“बीएनएसएस की धारा 223(1) में जोड़ा गया परंतुक उस समस्या को दूर करने के लिए है जहां आरोपी के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया शुरू हो जाती थी और उसे सुने बिना गंभीर नुकसान पहुंचता था। यह आरोपी के हित में बनाया गया एक उपचारात्मक प्रावधान है, ताकि वह मैजिस्ट्रेट के समक्ष वे सीमित आधार प्रस्तुत कर सके जिन्हें अदालतों ने पहले से मान्यता दी है कि किन परिस्थितियों में संज्ञान नहीं लिया जाना चाहिए—जैसा कि दिल्ली रेस क्लब और अन्य फैसलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किया गया है। ऐसे प्रावधान को पूर्ण प्रभावी बनाया जाना चाहिए। इसे प्रभावी बनाने का एकमात्र तरीका यही है कि बीएनएसएस की धारा 223(1) के परंतुक के तहत आरोपी को नोटिस तभी जारी किया जाए, जब मैजिस्ट्रेट शिकायतकर्ता और उसके गवाहों का परीक्षण कर चुका हो।”
पीठ ने केंद्र सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि नोटिस कब देना है, इसका विवेकाधिकार मैजिस्ट्रेट पर छोड़ दिया जाए। पीठ ने कहा कि यदि बयान दर्ज होने से पहले आरोपी को नोटिस दिया गया, तो वह शिकायतकर्ता के साक्ष्य दर्ज कराने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर सकता है, जिसकी अनुमति कानून नहीं देता।
हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्ष को पुष्ट करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के कुशल कुमार अग्रवाल बनाम प्रवर्तन निदेशालय (2025) और परविंदर सिंह बनाम प्रवर्तन निदेशालय (2026) के फैसलों का हवाला दिया। इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि धारा 223(1) का पहला परंतुक अनिवार्य और मूल प्रकृति का है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का हिस्सा है। इसके अलावा, पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट (बसनगौड़ा आर. पाटिल), इलाहाबाद हाईकोर्ट (प्रतीक अग्रवाल एवं राकेश कुमार चतुर्वेदी), केरल हाईकोर्ट (सुबी एंटनी), गुवाहाटी हाईकोर्ट (भूपेंद्र चौधरी), बॉम्बे हाईकोर्ट (शशिधर जगदीशन) और दिल्ली हाईकोर्ट की एकल पीठों (नीति शर्मा एवं ब्रांड प्रोटेक्टर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड) के निर्णयों पर भी सहमति व्यक्त की।
हाईकोर्ट का निर्णय और रेफरेंस के उत्तर
खंडपीठ ने एकल पीठ द्वारा भेजे गए कानूनी प्रश्नों के निम्नलिखित उत्तर दिए:
- संज्ञान के चरण और गवाहों के परीक्षण पर: “मैजिस्ट्रेट किसी अपराध का संज्ञान तभी ले सकता है जब वह शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों का शपथ पर परीक्षण कर ले (जब तक कि कानून द्वारा छूट न दी गई हो) और आरोपी को सुनवाई का अवसर प्रदान कर दे। इसलिए, बीएनएसएस की धारा 223(1) के तहत, शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों का शपथ पर परीक्षण और आरोपी को सुनना—ये दोनों कदम मैजिस्ट्रेट द्वारा अपराध का संज्ञान लेने से पहले के चरण हैं।”
- आरोपी को नोटिस जारी करने के चरण पर: “मैजिस्ट्रेट को बीएनएसएस की धारा 223(1) के पहले परंतुक के अनुपालन में आरोपी को नोटिस तभी जारी करना आवश्यक है, जब वह शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों का शपथ पर परीक्षण कर ले (यदि छूट न हो) और इस प्रथम दृष्टया राय पर पहुंचे कि शिकायत धारा 226 के तहत खारिज किए जाने योग्य नहीं है, बल्कि अपराध का संज्ञान लिया जा सकता है। हालांकि, संज्ञान लेने का औपचारिक निर्णय मैजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी को सुनवाई का अवसर देने के बाद ही लिया जा सकता है।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी को सुनने के बाद यदि मैजिस्ट्रेट संज्ञान लेने का निर्णय करता है, तो उसके बाद के चरण—जैसे धारा 225 के तहत जांच के लिए प्रक्रिया को टालना, धारा 226 के तहत शिकायत खारिज करना, या धारा 227 के तहत समन/वारंट जारी करना—पूरी तरह स्वतंत्र और अलग बने रहेंगे।
हाईकोर्ट ने इन दोनों याचिकाओं को 28 अक्टूबर 2026 को संबंधित रोस्टर पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: डॉ रीता बख्शी बनाम सीमा बजाज व अन्य
वाद संख्या: सीआरएल.एम.सी. 2551/2025
पीठ: जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुडेजा
निर्णय की तिथि: 29 सितंबर 2026

