स्कूलों में जंक फूड बैन, पेपर लीक रोकने और डिजिटल लत पर राजस्थान हाईकोर्ट का सख्त आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश के सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों के कैंटीन तथा परिसर के 50 मीटर के दायरे में जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक्स और अधिक वसा, शर्करा व नमक (HFSS) वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकल पीठ ने जनरेशन जेड, जनरेशन अल्फा और जनरेशन बीटा से जुड़ी चुनौतियों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए यह निर्णय सुनाया। अदालत ने बच्चों के पोषण, बढ़ती स्क्रीन टाइम, प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी ढांचे की कमी जैसे मुद्दों पर व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

कैंटीन में न्यूट्रिशन बोर्ड अनिवार्य, बनेगी निगरानी समिति

हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत राज्य के सभी स्कूलों को आगामी चार सप्ताह के भीतर एक ‘स्कूल खाद्य सुरक्षा एवं पोषण समिति’ का गठन करना होगा। इस समिति में शिक्षक, अभिभावक और छात्र प्रतिनिधि शामिल होंगे, और इसकी विस्तृत जानकारी शिक्षा विभाग के आधिकारिक पोर्टल पर अपलोड करनी होगी।

इसके अतिरिक्त, स्कूलों को आठ सप्ताह के भीतर अपनी कैंटीन में ‘ट्रैफिक-लाइट लेबलिंग सिस्टम’ पर आधारित मेनू बोर्ड लगाना अनिवार्य होगा। इस बोर्ड पर भोजन की कैलोरी, प्रयुक्त सामग्री और पोषण मूल्य स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किए जाएंगे। अदालत ने मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) को भी भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के दिशानिर्देशों के अनुरूप तैयार करने तथा खाद्य सुरक्षा उल्लंघनों की शिकायत के लिए एक समर्पित हेल्पलाइन और ऑनलाइन पोर्टल शुरू करने के निर्देश दिए हैं।

तकनीक और पारंपरिक शिक्षा के बीच संतुलन पर जोर

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बच्चों में मोबाइल स्क्रीन टाइम और तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता पर चिंता जताते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल शिक्षा आवश्यक है, लेकिन यह मूलभूत शिक्षण कौशल का स्थान नहीं ले सकती। पीठ ने डिजिटल माध्यमों के साथ-साथ हस्तलेखन (हैंडराइटिंग), पुस्तकें पढ़ने, नोट्स बनाने, स्वतंत्र सोच विकसित करने और लिखित परीक्षाओं जैसी पारंपरिक पद्धतियों को बनाए रखने का आह्वान किया।

पेपर लीक रोकने के लिए पुख्ता तंत्र और ग्रामीण स्कूलों का निरीक्षण

परीक्षा प्रणाली में बार-बार होने वाले पेपर लीक पर कड़ा रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों से अभ्यर्थियों में मानसिक तनाव बढ़ता है और चयन प्रक्रिया की साख को नुकसान पहुंचता है। अदालत ने राज्य सरकार को भविष्य में पेपर लीक रोकने के लिए एक पूरी तरह से सुरक्षित और अभेद्य तंत्र विकसित करने का निर्देश दिया।

ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों के स्कूलों में शैक्षणिक सुविधाओं का जायजा लेने के लिए सभी जिला कलेक्टरों को औचक निरीक्षण करने के आदेश दिए गए हैं। कलेक्टरों को आठ सप्ताह के भीतर रिक्त शिक्षक पदों, स्वच्छ पेयजल, कार्यशील शौचालयों, स्वास्थ्य जांच सुविधाओं, इंटरनेट कनेक्टिविटी, स्मार्ट क्लासरूम, कंप्यूटर और खेल सामग्री की उपलब्धता पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।

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प्रशासनिक जवाबदेही और दूरगामी नीतियां

अदालत की हिदायतों के सुचारू क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक त्रैमासिक निगरानी सेल का गठन किया गया है। राज्य सरकार को वर्ष 2020 के सुरक्षित और संतुलित भोजन नियमों के कार्यान्वयन की स्थिति पर छह सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करना होगा। साथ ही, मुख्य सचिव सहित स्वास्थ्य, शिक्षा, सार्वजनिक वितरण और उपभोक्ता मामलों के विभागों को नोटिस जारी कर आठ सप्ताह में जवाब मांगा गया है।

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हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से युवाओं से जुड़े व्यापक मुद्दों जैसे शिक्षा-रोजगार के बीच का अंतर, गिग वर्करों के लिए सामाजिक सुरक्षा, किफायती आवास व हॉस्टल, डेटा गोपनीयता, साइबर सुरक्षा और डिजिटल डिटॉक्स पर भी योजनाएं बनाने को कहा है। मामले में न्यायालय की सहायता के लिए न्याय मित्र (अमीकी क्यूरी) नियुक्त किए गए हैं और अग्रिम सुनवाई के लिए पत्रावली को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के समक्ष सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए गए हैं।

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