पिता द्वारा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के तहत विरासत में मिली संपत्ति में पोता जन्मसिद्ध अधिकार का दावा नहीं कर सकता जब तक एचयूएफ के अस्तित्व की दलील न दी गई हो: राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ के जस्टिस फरजंद अली ने कहा है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के तहत प्रथम श्रेणी (क्लास-I) के कानूनी वारिसों द्वारा विरासत में हासिल की गई कृषि भूमि उनकी व्यक्तिगत क्षमता में स्व-अर्जित संपत्ति मानी जाती है। ऐसी संपत्ति आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने आप सहदायिकी (कोपार्सनरी) संपत्ति का रूप नहीं लेती। हाईकोर्ट ने एक सिविल प्रथम अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें बटवारे और बिक्री विलेख (सेल डीड) रद्द करने की मांग वाले मुकदमे को खारिज कर दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक हिंदू अविभाजित परिवार (एचयूएफ) के अस्तित्व को विशेष रूप से याचिका में न कहा गया हो और साबित न किया गया हो, तब तक कोई पोता अपने पिता द्वारा विरासत में मिली संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार का दावा नहीं कर सकता। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने यह भी माना कि जब तक राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 के तहत सक्षम राजस्व अदालत द्वारा किसी व्यक्ति के खातेदारी अधिकारों की घोषणा नहीं की जाती, तब तक कृषि भूमि की बिक्री रद्द करने की मांग करने वाला सिविल मुकदमा पोषणीय नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद जैसलमेर जिले की पोकरण तहसील के जैमला गांव स्थित खसरा नंबर 294/506 की 75 बीघा असिंचित कृषि भूमि से जुड़ा है। यह भूमि मूल रूप से भूमिहीन व्यक्ति होने के कारण दिवंगत चुतरा राम (पुत्र लाभूराम) को राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 101 के तहत खेती के उद्देश्य से आवंटित की गई थी।

24 अप्रैल 2004 को चुतरा राम के बिना वसीयत निधन (इंटेस्टेट डेथ) के बाद, यह जमीन उनके तीन बेटों—खेताराम, रामाराम और लच्छूराम के नाम 1/3 के बराबर हिस्सों में नामांकित (म्यूटेट) कर दी गई, जो उनके क्लास-1 कानूनी वारिस थे। 17 अप्रैल 2025 को तीनों बेटों ने एक पंजीकृत सेल डीड के जरिए यह जमीन चूना राम को बेच दी। इसके बाद, 26 सितंबर 2025 और 29 सितंबर 2025 की पंजीकृत सेल डीड के माध्यम से यह भूमि अमजद खान और सुरभि एस्टेट्स एलएलपी को हस्तांतरित कर दी गई।

खेताराम के बेटे देवाराम ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, पोकरण के समक्ष एक सिविल मुकदमा दायर किया। उसने जन्म से 1/9वें हिस्से पर अपना कोपार्सनरी अधिकार जताते हुए स्थायी रोक (इंजंक्शन) और 17 अप्रैल 2025 की सेल डीड को रद्द करने की मांग की। प्रतिवादी संख्या 7 (सुरभि एस्टेट्स एलएलपी) ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के ऑर्डर VII रूल 11 के तहत आवेदन दायर कर दलील दी कि सक्षम राजस्व अदालत से वादी के खातेदारी अधिकारों की घोषणा के बिना सिविल कोर्ट के पास इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है। 10 फरवरी 2026 को ट्रायल कोर्ट ने इस आवेदन को स्वीकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। देवाराम ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि यह जमीन मूल रूप से उसके दादा को परिवार के भरण-पोषण के लिए आवंटित की गई थी और उनकी मृत्यु के बाद यह पैतृक संपत्ति के रूप में हस्तांतरित हुई, जिससे अपीलकर्ता को जन्म से ही 1/9वां कोपार्सनरी हिस्सा मिला। उसने कहा कि उसके पिता और चाचा उसकी सहमति के बिना संपत्ति नहीं बेच सकते थे। उसने यह भी दलील दी कि संपत्ति के कोपार्सनरी स्वरूप से जुड़े मुद्दों पर साक्ष्यों के आधार पर सुनवाई होनी चाहिए थी, न कि ऑर्डर VII रूल 11 सीपीसी के तहत शुरुआती स्तर पर ही मुकदमे को खारिज किया जाना चाहिए था।

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इसके जवाब में प्रतिवादियों के वकील ने दलील दी कि अपीलकर्ता की याचिका में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि कोई एचयूएफ मौजूद था या चुतरा राम ने कर्ता के रूप में काम किया था। उन्होंने कहा कि चुतरा राम की मृत्यु के बाद, उत्तराधिकार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के तहत खुला, जिससे उनके बेटों को उनकी व्यक्तिगत क्षमता में 1/3 हिस्सा मिला। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि सिविल कोर्ट के पास अधिकार क्षेत्र नहीं था क्योंकि अपीलकर्ता ने राजस्थान काश्तकारी अधिनियम के तहत सक्षम राजस्व अदालत से अपने खातेदारी अधिकारों की घोषणा नहीं कराई थी।

अदालत का विश्लेषण

याचिका का अवलोकन करते हुए जस्टिस फरजंद अली ने टिप्पणी की कि प्लेन्ट (वाद पत्र) में ऐसा कोई स्पष्ट कथन नहीं है कि कोई एचयूएफ मौजूद था या जमीन किसी संयुक्त परिवार को आवंटित की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल वंशावली या पारिवारिक संबंध होने मात्र से कोई व्यक्तिगत संपत्ति कोपार्सनरी संपत्ति में नहीं बदल जाती।

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उत्तराधिकार के वैधानिक प्रभाव पर चर्चा करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि जब किसी हिंदू पुरुष का बिना वसीयत निधन होता है, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 लागू होती है। उत्तम बनाम सौभाग्य सिंह एवं अन्य (2016) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:

“…जहाँ किसी हिंदू पुरुष की संपत्ति धारा 8 के अनुसार उसके प्रथम श्रेणी के वारिसों को मिलती है, ऐसा उत्तराधिकार वैधानिक योजना के अनुसार होता है और संपत्ति केवल पूर्वज और उत्तराधिकारी के बीच के संबंध के कारण सहदायिकी (कोपार्सनरी) संपत्ति का स्वरूप बनाए नहीं रखती, जिससे अगली पीढ़ी को जन्म से कोई स्वतंत्र अधिकार प्राप्त हो सके।”

हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता के पिता द्वारा विरासत में मिला 1/3 हिस्सा उनके हाथों में स्व-अर्जित संपत्ति बन गया। इसलिए अपीलकर्ता के पास अपने पिता के जीवनकाल के दौरान बटवारे की मांग करने या कोई कोपार्सनरी अधिकार जताने का कानूनी आधार नहीं है। अदालत ने यह भी जोड़ा कि दादा की मृत्यु के समय अपीलकर्ता का नाबालिग होना या बाद में बालिग होना इस वैधानिक उत्तराधिकार के नियम को नहीं बदलता।

अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने प्यारेलाल बनाम शुभेंद्र पिलानिया एवं अन्य (2019) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले और राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धारा 88 और 207 का विश्लेषण किया। अदालत ने दोहराया कि कृषि भूमि पर खातेदारी अधिकारों की घोषणा करने का विशेष अधिकार क्षेत्र केवल राजस्व अदालतों के पास है:

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“…जहाँ कृषि भूमि पर खातेदारी अधिकारों का निर्धारण सक्षम राजस्व अदालत के समक्ष लंबित या आवश्यक हो, वहाँ ऐसी भूमि के हस्तांतरण से जुड़ी अनुषंगिक राहत सिविल कोर्ट से तब तक प्राप्त नहीं की जा सकती, जब तक कि मूलभूत अधिकार का निर्धारण सक्षम मंच द्वारा न कर दिया गया हो।”

अदालत ने आगे टिप्पणी की:

“जब तक राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 88 के अनुसार सक्षम राजस्व अदालत द्वारा कृषि भूमि में अपीलकर्ता के कथित अधिकार की घोषणा नहीं कर दी जाती, तब तक विभाजन और बिक्री विलेखों को रद्द करने की मांग करने वाला यह सिविल वाद कानूनन पोषणीय नहीं माना जा सकता।”

अदालत का निर्णय

ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई अवैधता या अधिकार क्षेत्र की त्रुटि न पाते हुए हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मुकदमा तात्विक और क्षेत्राधिकार दोनों आधारों पर विफल रहा। हाईकोर्ट ने सिविल प्रथम अपील को खारिज कर दिया और पोकरण के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश द्वारा 10 फरवरी 2026 को पारित निर्णय और डिक्री की पुष्टि की।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: देवाराम बनाम खेताराम एवं अन्य
वाद संख्या: एस.बी. सिविल प्रथम अपील संख्या 221/2026
पीठ: जस्टिस फरजंद अली
निर्णय की तिथि: 20 अगस्त 2026

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