सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: BCI के नीतिगत फैसलों में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल की भागीदारी जरूरी, पुनर्गठन पर फिलहाल फैसला टला

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को निर्देश दिया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के हर नीतिगत फैसले में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को सक्रिय रूप से शामिल किया जाए। साथ ही कोर्ट ने BCI के पुनर्गठन के मुद्दे पर विचार फिलहाल टाल दिया है। इस पर सभी स्टेट बार काउंसिल की चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद विचार किया जाएगा।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन जजों की बेंच ने नवगठित स्टेट बार काउंसिल को निर्देश दिया कि वे अपने गठन की अधिसूचना जारी होने के दो सप्ताह के भीतर वैधानिक पदाधिकारियों और BCI में अपने प्रतिनिधियों का चुनाव पूरा करें।

इस बीच BCI के मौजूदा पदाधिकारी रोजमर्रा के प्रशासनिक कामकाज को संभालते रहेंगे, लेकिन कोई भी नीतिगत फैसला अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल की सक्रिय भागीदारी के बिना नहीं लिया जाएगा।

ये निर्देश कई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिए गए। इनमें अधिवक्ता योगमाया एमजी की याचिका भी शामिल है, जिसमें सीनियर एडवोकेट मनन कुमार मिश्रा के BCI चेयरपर्सन पद पर लंबे समय से बने रहने को चुनौती दी गई है। इसके अलावा BCI से जुड़े एक ट्रस्ट के गठन और कामकाज को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

स्टेट बार काउंसिल की रिपोर्ट के बाद BCI के पुनर्गठन पर विचार

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ कोई प्रतिकूल आदेश पारित नहीं किया। बेंच ने स्पष्ट किया कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 4 के तहत BCI के पुनर्गठन के सवाल पर तब विचार किया जाएगा, जब स्टेट बार काउंसिल अपनी प्रक्रिया पूरी कर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल कर देंगी।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि कोर्ट किसी व्यक्ति विशेष के बजाय संस्था को संचालित करने वाले वैधानिक ढांचे की जांच कर रहा है।

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स्टेट बार काउंसिल को को-ऑप्शन की प्रक्रिया पूरी करने के साथ अपने पदाधिकारियों और BCI प्रतिनिधियों का चुनाव कर अनुपालन रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करनी होगी। मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी।

BCI और उसके पदाधिकारियों की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट गुरु कृष्ण कुमार और मनिंदर सिंह ने कोर्ट को बताया कि निर्धारित समयसीमा में चुनावी प्रक्रिया पूरी करने पर परिषद को कोई आपत्ति नहीं है। BCI की ओर से नीतिगत मामलों में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को सक्रिय रूप से शामिल करने पर भी सहमति जताई गई।

BCI पदाधिकारियों का कार्यकाल बढ़ाने पर उठे सवाल

याचिकाकर्ताओं की प्रमुख आपत्तियों में BCI नेतृत्व का कार्यकाल बढ़ाने की वैधता भी शामिल है।

सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान, सीयू सिंह, संजय हेगड़े और शोभा गुप्ता ने कोर्ट के सामने कहा कि BCI नियम 12(2) के तहत चेयरपर्सन और वाइस-चेयरपर्सन का कार्यकाल दो वर्ष निर्धारित है।

याचिकाकर्ताओं ने 21 अप्रैल 2025 की गजट अधिसूचना का मुद्दा उठाया, जिसके जरिए मनन कुमार मिश्रा का कार्यकाल 16 अप्रैल 2030 तक बताया गया था। यह अधिसूचना मार्च 2025 में पारित परिषद के उस प्रस्ताव के बाद आई थी, जिसमें कार्यकाल को तीन वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष करने की बात कही गई थी।

कोर्ट के सामने यह भी बताया गया कि वर्ष 2020 में भी इसी तरह पांच वर्ष के कार्यकाल वाली अधिसूचना जारी की गई थी।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि इन प्रस्तावों का वैधानिक आधार नहीं है और प्रशासनिक प्रस्ताव के जरिए नियमों में निर्धारित कार्यकाल को नहीं बदला जा सकता। यह मुद्दा भी उठाया गया कि 2025 की अधिसूचना BCI की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं थी और इसमें तत्कालीन वाइस-चेयरपर्सन एस. प्रभाकरण का कार्यकाल भी 2030 तक दिखाया गया, जबकि वह बाद में चुनाव हार गए और निर्वाचित सदस्य नहीं रहे।

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सुनवाई के दौरान बेंच ने भी सवाल किया कि जब नियमों में पदाधिकारियों का कार्यकाल निर्धारित है तो किसी निर्वाचित संस्था को प्रशासनिक प्रस्ताव के जरिए उसे बढ़ाने का अधिकार किस वैधानिक प्रावधान से मिलता है।

PEARL ट्रस्ट के गठन और स्थायी ट्रस्टी पर भी सवाल

सुप्रीम कोर्ट के सामने वर्ष 2020 में बनाए गए PEARL ट्रस्ट यानी Bar Council of India Trust for Promotion of Education, Legal and Professional Reforms and Improvement in Research को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए।

सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कोर्ट को बताया कि PEARL ट्रस्ट ने वर्ष 1974 में बनाए गए पुराने BCI ट्रस्ट की जगह ली और पुराने ट्रस्ट की संपत्तियां नए ट्रस्ट को हस्तांतरित कर दी गईं।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार नए ट्रस्ट में 11 लोगों को मैनेजिंग ट्रस्टी बनाया गया, जिनमें मनन कुमार मिश्रा भी शामिल हैं। आपत्ति इस बात को लेकर उठाई गई कि इन लोगों को BCI की सदस्यता समाप्त होने के बावजूद स्थायी ट्रस्टी के रूप में बने रहने की व्यवस्था की गई।

सुनवाई के दौरान गोवा में 56 एकड़ भूमि पर विश्वविद्यालय परियोजना, अमरावती में परियोजना से संबंधित टेंडर, एक वर्ष में दर्ज ₹4.41 करोड़ की आय और पुराने ट्रस्ट के कर्मचारियों को हटाए जाने जैसे मुद्दे भी कोर्ट के सामने रखे गए।

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याचिकाकर्ताओं ने PEARL ट्रस्ट के साथ-साथ ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन से जुड़े वित्तीय मामलों की कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग भी की।

बेंच ने इस बात पर सवाल उठाया कि चुनाव के जरिए गठित कोई संस्था अपनी संपत्तियों से ऐसा ट्रस्ट बनाकर कुछ व्यक्तियों को उनके निर्वाचित कार्यकाल के बाद भी स्थायी रूप से ट्रस्टी कैसे बनाए रख सकती है।

कोर्ट ने इस दौरान यह अंतर भी रेखांकित किया कि स्थायी प्रकृति की ट्रस्टीशिप किसी पद से पदेन रूप में जुड़ी हो सकती है, लेकिन किसी खास व्यक्ति को उसके पद या संस्था की सदस्यता समाप्त होने के बाद भी स्थायी ट्रस्टी बनाए रखने का सवाल अलग है।

BCI की ओर से इन आरोपों का विरोध करते हुए कहा गया कि अलग-अलग शिकायतों और आशंकाओं के आधार पर मौजूदा कार्यवाही का दायरा नहीं बढ़ाया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन मुद्दों पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है। बेंच ने कहा कि BCI के पुनर्गठन, पदाधिकारियों के कार्यकाल से जुड़ी अधिसूचनाओं और PEARL ट्रस्ट से संबंधित सवालों पर स्टेट बार काउंसिल की प्रक्रिया पूरी होने और अनुपालन रिपोर्ट रिकॉर्ड पर आने के बाद विचार किया जाएगा।

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