एम.ए. (शिक्षाशास्त्र) और एम.एड. सहायक प्रोफेसर पद के लिए समतुल्य हैंः सुप्रीम कोर्ट

आज Supreme Court के नवीनतम निर्णय में माननीय श्री न्यायमूर्ति एस.के. कौल, माननीय श्री न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और माननीय श्री न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी कीएक बेंच ने एमए (शिक्षाशास्त्र) और एमएड डिग्री को सहायक प्रोफेसर के पद पर भर्ती के लिए की समकक्षता का फैसला दिया है।

Supreme Court ने माना कि न्यायालय विशेषज्ञ / समतुल्यता समिति के निर्णय के विपरीत नहीं जा सकती है।

संक्षिप्त तथ्य

उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग द्वारा एक विज्ञापन के माध्यम से विभिन्न विषयों में सहायक प्रोफेसर के पद के लिए आवेदन आमंत्रित किये गये।।

अपीलार्थी संख्या 2 की उम्मीदवारी को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि उसके पास एम.एड. की डिग्री थी, ना कि एम.एम (शिक्षाशास्त्र) की।

उक्त से क्षुब्ध होकर अपीलकर्ता संख्या 2 ने रिट संख्या 61/215 इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दाखिल की। उक्त रिट के दौरान, 2016 का एक और विज्ञापन जारी किया गया, जिसमें सरकारी सहायता प्राप्त गैर-सरकारी विश्वविद्यालयों में विभिन्न विषयों में सहायक प्रोफेसर के पद विज्ञापित किए गए थे।

दोनों विज्ञापन की पात्रता मानदंड समान थे यानी प्रासंगिक स्नातकोत्तर विषय में न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक और राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा को पास किया होना आवश्यक था।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के प्रोफेसर भूदेव सिंह के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया गया । समिति ने सर्वसम्मति से अपनी राय दी कि एम.ए. (शिक्षाशास्त्र) और एमएड दोनों समकक्ष हैं और सहायक प्रोफेसर के पद के लिए स्वीकार किया जाना चाहिए।

समिति की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए एक शुद्धिपत्र जारी किया गया था, जिसे भी रिट याचिका दाखिल कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गयी थी।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खण्डपीठ ने अपने आदेश दिनांक 14.5.2018 के माध्यम से प्रीती सिंह मामले के निर्णय के आधार पर शुद्धिपत्र को निरस्त कर दिया गया। जिसका मतलब ये हुआ कि एम.ए. (शिक्षाशास्त्र) की डिग्री रखने वाले अभ्यर्थी ही केवल सहायक प्रोफेसर के पद के लिए पात्र थे।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में, आयोग ने योग्यता को बदल दिया और केवल एम.ए. (शिक्षाशास्त्र) की डिग्री की अनिवार्यर्ता रखी गयी।

एमएड योग्यता रखने वाले अभ्यर्थियों ने क्षुब्ध होकर सुप्रीम कोर्ट में अपली दायर की।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि 1.12.1958 में यूजीसी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 की धारा 22 के प्रयोजनों के लिए डिग्री की एक सूची जारी की थी, जिसमें यह निर्दिष्ट किया गया था कि मास्टर डिग्री में एम.ए. (शिक्षाशास्त्र) और एम.एड. दोनों ही शामिल है।

यूजीसी ने कहा कि एम.ए. (शिक्षा) और एमएड दोनों डिग्री को मास्टर स्तर की डिग्री के रूप में निर्दिष्ट किया गया है। यह भी कहा गया था कि एम.ए. (शिक्षाशास्त्र) एक नियमित पाठ्यक्रम है, जबकि एमएड एक पेशेवर पाठ्यक्रम है।

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद  ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया कि एम.एड. यूजीसी और एनसीटीई जैसी शीर्ष संस्थाओं द्वारा शिक्षा में सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति के लिए मान्यता प्राप्त एक मास्टर डिग्री है और इस तरह की डिग्री वाले व्यक्ति भी नेट / एसएलईटी / जेआरएफ के लिए पात्र हैं, जबकि एमए (शिक्षाशास्त्र) भी मास्टर डिग्री है लेकिन एमएड  की तुलना में ये अलग है।

सर्वोच्च न्यायालय ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि नियोक्ता अंततः सबसे अच्छा न्यायाधीश है जिसे नियुक्त करनी है। वर्तमान मामले में, नियोक्ता ने एक समिति का गठन किया, जिसने ने रिपोर्ट दी कि दोनों डिग्रियां समान हैं।

यह आगे कहा गया है कि शिक्षा के मामलों को शिक्षाविदों पर छोड़ दिया जाना चाहिए, जो संबंधित विधियों और नियमों द्वारा शासित होने के अधीन है। विशेषज्ञों के निर्णय पर एक विशेषज्ञ निकाय के रूप में बैठना इस न्यायालय का कार्य नहीं है, विशेषकर तब जब समिति में प्रतिष्ठित लोग हों।

इसलिए, उपरोक्त के मद्देनजर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को निरस्त करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने एमए (शिक्षाशास्त्र) और एम.एड. पाठ्यक्रम को सहायक प्रोफेसर के लिए समान रूप से अर्ह माना है।

Case Details

Title: Anand Yadav vs State of UP

Case No.- Civil Appeal No. 2850 of 2020

Coram: Hon’ble Mr. Justice S.K.Kaul, Hon’ble Mr. Justice Aniruddha Bose and Hon’ble Mr. Justice Krishna Murari

Date of Judgment: 12.10.2020

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