“अदालत कोई प्रयोगशाला नहीं”: कनाडा वीजा धोखाधड़ी मामले में हाईकोर्ट ने खारिज की दूसरी अग्रिम जमानत याचिका, लगाया ₹20,000 का जुर्माना

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कनाडा वीजा धोखाधड़ी मामले की एक महिला आरोपी की लगातार दूसरी अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने आरोपी के इस कदम को “प्रक्रियात्मक दुस्साहस” (procedural adventurism) और “फोरम शॉपिंग” (मनपसंद अदालत चुनना) बताते हुए तीखी टिप्पणी की।

सुनवाई के दौरान जस्टिस सुमीत गोयल ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अदालत को काल्पनिक या सट्टा मुकदमों की प्रयोगशाला (laboratory for speculative litigation) समझ लिया है। पहली जमानत याचिका वापस लेने के बाद से परिस्थितियों में कोई बदलाव न होने के कारण हाईकोर्ट ने इस याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना। अदालत ने 15 मई को दिए अपने फैसले में याचिका को खारिज करते हुए न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने और कानून से भागने के लिए महिला पर ₹20,000 का दंडात्मक हर्जाना भी लगाया।

क्या है पूरा मामला?

यह आपराधिक मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी) और 120-B (अंतिम साजिश) के तहत दर्ज एक प्राथमिकी (FIR) से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता को याचिकाकर्ता और उसके सह-आरोपियों ने अपने जाल में फंसाया था। आरोपियों ने शिकायतकर्ता के दो बच्चों को कनाडा भेजने, वहां उनका दाखिला कराने और उन्हें वहां स्थायी रूप से बसाने का झांसा दिया था।

इस भरोसे के बदले आरोपियों ने शिकायतकर्ता से कुल ₹15,50,000 की रकम ऐंठी। शिकायतकर्ता ने अक्टूबर 2020 से अलग-अलग तारीखों पर नकदी के रूप में इस राशि का भुगतान किया था। आरोप है कि पैसे लेने के बाद आरोपियों ने बच्चों को विदेश भेजने के बजाय फर्जी मेडिकल रिपोर्ट थमा दी और बाद में न तो बच्चों को विदेश भेजा और न ही उनके पैसे वापस किए।

हाईकोर्ट ने मामले पर संज्ञान लेते हुए कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं, जो पहली नजर में एक सुनियोजित साजिश और धोखाधड़ी के कृत्य को दर्शाते हैं।

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आत्मसमर्पण का वादा कर कानून से भागती रही आरोपी

महिला की तरफ से अग्रिम जमानत पाने का यह दूसरा प्रयास था। इससे पहले, हाईकोर्ट ने ही 23 अप्रैल को उसकी पहली अग्रिम जमानत याचिका को ‘वापस ली गई’ मानकर खारिज कर दिया था। उस समय आरोपी के वकील ने अदालत को स्पष्ट आश्वासन दिया था कि उनकी मुवक्किल नियमित जमानत के लिए सात कार्यदिवसों के भीतर निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के समक्ष आत्मसमर्पण (surrender) कर देगी।

अदालत को दिए इस भरोसे का सम्मान करने के बजाय याचिकाकर्ता कानून से बचती रही और करीब 21 दिनों तक फरार रही। आत्मसमर्पण करने के बजाय उसने हाईकोर्ट में ही दोबारा अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर कर दी, जिससे अदालत उसके आचरण पर बेहद नाराज हुई।

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‘फोरम शॉपिंग’ और जमानत के सिद्धांतों पर कोर्ट की दो टूक

अग्रिम जमानत याचिकाओं की स्वीकार्यता पर कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए जस्टिस सुमीत गोयल ने कहा कि स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुसार, पहली याचिका खारिज या वापस होने के बाद दूसरी अग्रिम जमानत याचिका तभी स्वीकार की जा सकती है जब परिस्थितियों में कोई बड़ा और वास्तविक बदलाव आया हो।

मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि महिला ने जिन आधारों पर दोबारा जमानत मांगी, वे सभी तर्क पहली याचिका के समय भी मौजूद थे। अदालत ने टिप्पणी की:

“यह ‘फोरम शॉपिंग’ का एक सटीक उदाहरण है, जहां कोई पक्षकार अदालत के गलियारों को काल्पनिक मुकदमों की प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करता है।”

अदालत ने आगे कहा कि परिस्थितियों में बिना किसी बदलाव के एक ही राहत के लिए बार-बार अदालत का दरवाजा खटखटाना न्याय की गुहार नहीं, बल्कि अदालत के धैर्य की परीक्षा लेने और “पानी भांपने” (testing the waters) जैसा प्रयास है।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम न्यायिक गरिमा

माननीय उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि भले ही किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन इसका उपयोग न्याय प्रशासन को बाधित करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि हालांकि कानून में लगातार अग्रिम जमानत याचिकाएं दायर करने पर कोई सीधा प्रतिबंध नहीं है, लेकिन यह अधिकार “प्रक्रियात्मक दुस्साहस” का खुला लाइसेंस नहीं देता।

अदालत ने अपने आदेश में कहा:

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“बिना किसी ठोस कारण के लंबे समय तक फरार रहना, कानूनी प्रक्रिया से बचना और फिर अचानक बार-बार अग्रिम जमानत की गुहार लगाना ऐसा व्यवहार नहीं है जो अदालत की सहानुभूति या उदारता का हकदार हो।”

न्यायाधीश ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अदालत में आत्मसमर्पण करने की बात कहकर भी 21 दिनों तक कानून को छकाया। इस तरह की घुमावदार, अनियमित और ढुलमुल रणनीतियों का उद्देश्य केवल कानूनी कार्यवाही को भटकाना होता है, जो न्यायिक प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग है।

अदालत का अंतिम निर्णय

परिस्थितियों में किसी भी तरह के बदलाव को साबित करने में विफल रहने के कारण हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही, भविष्य में अदालती समय की बर्बादी को रोकने और कानून की अवहेलना करने वालों को कड़ा संदेश देने के लिए याचिकाकर्ता पर ₹20,000 का अनुकरणीय जुर्माना लगाया।

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