गुजरात हाई कोर्ट का सख्त रुख: निलंबित जज की याचिका खारिज, अब ‘कोर्ट की गरिमा’ गिराने के आरोप में चलेगी अवमानना

गुजरात हाई कोर्ट ने निलंबित अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (ADJ) जी.आर. सोनी को कोई भी राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने न केवल उनके खिलाफ चल रही अनुशासनात्मक कार्यवाही को रोकने वाली याचिका खारिज की, बल्कि उनके द्वारा लगाए गए ‘अपमानजनक’ आरोपों पर कड़ा संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की जांच के आदेश भी दिए हैं।

जस्टिस एन.एस. संजय गौड़ा और जस्टिस जे.एल. ओदेद्रा की खंडपीठ ने 8 मई को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सोनी द्वारा लिखित में दिए गए बयान “अदालत को बदनाम करने” और “न्यायपालिका के अधिकार को कम करने” की एक स्पष्ट कोशिश थे।

जी.आर. सोनी को दिसंबर 2024 में निलंबित किया गया था। उनके खिलाफ जारी चार्जशीट में कई चौंकाने वाले आरोप लगाए गए हैं:

  • पेशेवर कदाचार: एक आउटसोर्स क्लर्क के साथ “नजदीकी संबंध” बनाना और उसे वित्तीय सहायता प्रदान करना।
  • पद का दुरुपयोग: क्लर्क के निजी व्यवसाय को स्थापित करने और उसे चलाने के लिए अदालत के कर्मचारियों का इस्तेमाल करना।
  • कार्य में बाधा: अदालत की गतिविधियों की रिकॉर्डिंग रोकने के लिए जानबूझकर सीसीटीवी कैमरों को ब्लॉक करना।
  • कर्तव्य में लापरवाही: अदालत के समय का पालन न करना, बेंच पर बैठकर मोबाइल फोन का उपयोग करना और सुनवाई के दौरान प्रार्थना में व्यस्त रहना।
  • धमकाना: चपरासियों को उनके बयान वापस लेने के लिए डराना, जो उन्होंने औद्योगिक न्यायालय में दिए थे।
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सोनी के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता पर्सी कविना ने दलील दी कि यह पूरी जांच प्रक्रिया ही अवैध है क्योंकि इसकी शुरुआत किसी औपचारिक लिखित शिकायत या शपथ पत्र (Affidavit) के जरिए नहीं हुई थी। उन्होंने भारत सरकार के कानून मंत्रालय के दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए जांच को रद्द करने की मांग की।

वहीं, हाई कोर्ट का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गौतम जोशी ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता केवल सच्चाई को सामने आने से रोकने के लिए जांच में बाधा डाल रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई किसी बाहरी शिकायतकर्ता के कारण नहीं, बल्कि हाई कोर्ट को अपने आंतरिक स्रोतों से मिली “अनुचित आचरण” की सूचना के आधार पर शुरू की गई है।

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अदालत ने प्रशासन के पक्ष को सही ठहराते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की हाई कोर्ट की शक्ति “स्वतंत्र और पूर्ण” है। गुजरात सिविल सेवा नियमों की व्याख्या करते हुए पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट को जांच शुरू करने के लिए केवल “ठोस आधार” की आवश्यकता होती है, किसी औपचारिक शिकायत की नहीं।

मामला तब और गंभीर हो गया जब फैसले के सुरक्षित रखे जाने के बाद सोनी ने स्वतंत्र रूप से कुछ लिखित दलीलें पेश कीं। इनमें उन्होंने आरोप लगाया कि हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ न्यायाधीश का अन्य शाखाओं पर “पूर्ण नियंत्रण” है और वे अपने कनिष्ठ न्यायाधीशों को “निर्देश देने में सक्षम” हैं।

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हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इन दावों पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि इस तरह के आरोप न्याय के प्रशासन में बाधा डालते हैं। अदालत ने कहा, “ये दावे स्पष्ट रूप से आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आते हैं।”

याचिका खारिज करने के साथ ही, अदालत ने मामले को संबंधित बेंच के पास भेजने का आदेश दिया है ताकि औपचारिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सके। जी.आर. सोनी को 15 जून को व्यक्तिगत रूप से अवमानना बेंच के सामने पेश होने का निर्देश दिया गया है।

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