मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भाजपा विधायक और माइनिंग कारोबारी संजय पाठक को आपराधिक अवमानना के एक मामले में कड़ी राहत देने से इनकार कर दिया है। गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने विधायक की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने व्यस्त कार्यक्रम का हवाला देते हुए अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से छूट मांगी थी।
अदालती कार्यवाही के दौरान विधायक संजय पाठक स्वयं मौजूद थे और अपनी बारी के लिए लगभग दो घंटे तक प्रतीक्षा करते रहे। उनके कानूनी सलाहकार ने दलील दी कि एक विधायक के रूप में उनकी व्यस्तताएं अधिक हैं, इसलिए 15 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में उन्हें व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी जानी चाहिए। हालांकि, बेंच ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और उनकी उपस्थिति को अनिवार्य रखा।
यह कानूनी विवाद पिछले साल सितंबर में शुरू हुआ था, जब कटनी निवासी आशुतोष दीक्षित ने एक याचिका दायर की थी। मामला संजय पाठक से जुड़ी एक माइनिंग कंपनी और अवैध खनन के आरोपों से संबंधित था।
उस समय मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा ने खुद को केस से अलग करते हुए एक चौंकाने वाला खुलासा किया था। न्यायमूर्ति मिश्रा ने अपने आदेश में दर्ज किया था कि विधायक ने इस मामले के संबंध में उनसे फोन पर संपर्क करने की कोशिश की थी। इसे न्यायिक प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप मानते हुए, उन्होंने मामले से हटने का निर्णय लिया और इसे मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
हाई कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए 2 अप्रैल को विधायक के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के निर्देश दिए थे। याचिका में तर्क दिया गया है कि पाठक का आचरण न केवल न्यायपालिका की गरिमा को धूमिल करने वाला है, बल्कि यह न्यायिक कार्यों में बाधा डालने के समान है।
हालांकि, संजय पाठक ने इससे पहले एक हलफनामा दायर कर अपनी गलती स्वीकार की थी और अदालत से बिना शर्त माफी भी मांगी थी। उनकी इस माफी के बावजूद, अदालत का सख्त रुख यह संकेत देता है कि न्यायपालिका की निष्पक्षता और सम्मान सर्वोपरि है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई को होगी, जिसमें पाठक को दोबारा जबलपुर बेंच के समक्ष पेश होना होगा।

