सरकारी नौकरी की जगह पर पत्नी का रहना ‘परित्याग’ नहीं, यदि उसकी मंशा शादी को बचाने की थी: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द करते हुए, जिसने पति को तलाक की डिग्री दी थी, बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि सरकारी नौकरी की जिम्मेदारियों के कारण पत्नी का अलग निवास स्थान पर रहना हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत परित्याग (डेजर्शन) या क्रूरता नहीं माना जा सकता, बशर्ते उसके आचरण से वैवाहिक संबंधों को बनाए रखने की स्पष्ट मंशा दिखाई देती हो। जस्टिस पार्थ प्रतीक साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की पीठ ने यह निर्णय सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

दोनों पक्षों का विवाह 21 फरवरी 2019 को बिलासपुर में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। विवाह के कुछ ही महीनों बाद दोनों के बीच विवाद शुरू हो गए।

पति ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर विवाह विच्छेद की मांग करते हुए प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, बिलासपुर के समक्ष तलाक की याचिका (सिविल सूट नंबर 7-A/2022) दायर की। पति का आरोप था कि पत्नी उसके और उसके परिवार के साथ अक्सर झगड़ा करती थी, सहवास से मना करती थी, उसके सांवले रंग और निजी नौकरी को लेकर ताने देती थी और 7 जनवरी 2020 को ससुराल छोड़ कर चली गई। पति ने यह भी दावा किया कि सामाजिक मध्यस्थता और सुलह के प्रयासों के बावजूद वह वापस नहीं लौटी और परिवार को दहेज के झूठे मामलों में फंसाने की धमकी दी।

पत्नी ने तलाक की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि उसने कभी वैवाहिक दायित्वों से इनकार नहीं किया और वह हमेशा पति के साथ रहने को तैयार थी। उसने आरोप लगाया कि पति और उसके घरवाले 5 लाख रुपये, उसकी सैलरी और एटीएम कार्ड की मांग को लेकर उसका शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न करते थे। उसने स्पष्ट किया कि धमधा में सरकारी नर्स के रूप में तैनात होने के कारण उसे अपनी ड्यूटी के स्थान पर रहना पड़ता था, जिसकी जानकारी विवाह से पहले ही पति को थी। उसने यह भी बताया कि शादी बचाने के उद्देश्य से वह 29 अगस्त 2021 से 29 सितंबर 2021 तक ससुराल में रही थी, लेकिन पति ने सहवास नहीं किया।

फैमिली कोर्ट में पति ने खुद (PW-1), समारू लाल (PW-2) और जयंत वस्त्रकार (PW-3) का परीक्षण कराया, जबकि पत्नी ने खुद (DW-1) गवाही दी। 12 दिसंबर 2023 को फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका स्वीकार करते हुए तलाक की डिग्री मंजूर कर दी। इस निर्णय से व्यथित होकर पत्नी ने फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 19(1) के तहत हाईकोर्ट में अपील दायर की।

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हाईकोर्ट में दलीलें

पत्नी के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की अनदेखी की। यह दलील दी गई कि पत्नी ने कभी स्वेच्छा से पति का परित्याग नहीं किया, क्योंकि धमधा में उसका रहना उसकी सरकारी सेवा की बाध्यता थी। वकील ने जोर दिया कि कानूनी नोटिस मिलने के बाद पत्नी पति के घर गई थी और उसने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (रेस्टीट्यूशन ऑफ कंजूगल राइट्स) की डिग्री भी प्राप्त की थी, जिसका पति ने पालन नहीं किया।

पति के अधिवक्ता ने फैमिली कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के लंबे समय तक अलग रही और प्रयासों के बावजूद सहवास से इनकार किया।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

मामले का फैसला सुनाते हुए जस्टिस सचिन सिंह राजपूत ने टिप्पणी की कि दोनों पक्ष शादी से पहले से एक-दूसरे को जानते थे और एक-दूसरे की स्थिति से भली-भांति परिचित थे। पति के सांवले रंग और नौकरी को लेकर लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी के मन में ऐसी कोई बात होती, “तो वे शुरुआत में ही शादी के प्रस्ताव को खारिज कर देतीं और विवाह के बंधन में न बंधतीं।”

पीठ ने नोट किया कि विवाद सुलझाने के लिए बुलाई गई सामाजिक बैठक में दोनों को 15-15 दिनों के लिए एक-दूसरे के स्थान पर रहने की सलाह दी गई थी। हालांकि, ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि पति ने इस दिशा में कोई प्रयास किया। इसके विपरीत, जब पत्नी कानूनी नोटिस मिलने के बाद उसके घर पहुंची, तो पति झगड़ा करके घर से चला गया और लगभग एक महीने तक अपना मोबाइल बंद रखा। पीठ ने पाया कि पति ने “स्पष्ट रूप से तब पत्नी का साथ छोड़ने या उनसे दूरी बनाने का प्रयास किया, जब पत्नी उनके साथ रहने के उद्देश्य से उनके घर आई थीं।”

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता के आधार का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसले ‘समर घोष बनाम जया घोष’ [(2007) 4 SCC 511] का हवाला दिया और उसकी प्रमुख टिप्पणी को रेखांकित किया:

“रोजमर्रा के वैवाहिक जीवन में होने वाले मामूली विवाद, चिड़चिड़ाहट और सामान्य मनमुटाव मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं।”

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि “पति-पत्नी के बीच छोटी-मोटी झड़पें या मामूली घटनाएं मानसिक क्रूरता के दायरे में नहीं आती हैं। किसी एक पक्ष की महज अप्रसन्नता या असंतोष अपने आप में ऐसी क्रूरता नहीं माना जा सकता जिसके आधार पर विवाह विच्छेद किया जाए।”

धारा 13(1)(ib) के तहत परित्याग के संबंध में हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि पति को न केवल शारीरिक अलगाव, बल्कि वैवाहिक संबंध को स्थायी रूप से समाप्त करने के इरादे (एनिमस डेजर्बेंडी) को भी साबित करना होगा। कोर्ट ने पाया कि पत्नी का ससुराल जाना और धारा 9 के तहत दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए याचिका दायर करना यह दर्शाता है कि उसकी मंशा विवाह को खत्म करने की नहीं, बल्कि उसे बचाने की थी।

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हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट का फैसला साक्ष्यों के गलत मूल्यांकन पर आधारित था और पति क्रूरता व परित्याग के वैधानिक तत्वों को साबित करने में विफल रहा। तदनुसार, हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 12 दिसंबर 2023 के फैमिली कोर्ट के आदेश और तलाक की डिग्री को रद्द कर दिया।

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