जमीन अधिग्रहण मामले में मुआवजे में समानता के लिए अत्यधिक देरी बाधा नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का किया इस्तेमाल

जमीन अधिग्रहण के मुआवजे से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने असाधारण संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए जमीन गंवाने वाले किसानों को राहत दी है। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए प्रभावित भू-स्वामियों को उसी अधिग्रहण अधिसूचना के तहत अन्य भू-स्वामियों के समान 6,50,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से बढ़ा हुआ मुआवजा देने का निर्देश दिया। हालांकि, अपील दाखिल करने में कुल 4,427 दिनों की अत्यधिक देरी को देखते हुए कोर्ट ने इस देरी की अवधि के लिए बढ़े हुए मुआवजे पर ब्याज देने से इनकार कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 11 फरवरी 1999 को शुरू हुआ था, जब कर्नाटक के बागलकोट जिले के मुधोल तालुका स्थित मुधोल गांव के सर्वे नंबर 161/2 में 7 एकड़ 12 गुंटा जमीन के अधिग्रहण के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 4(1) के तहत अधिसूचना जारी की गई थी। इस जमीन का अधिग्रहण एक परियोजना के कारण विस्थापित हुए परिवारों को बसाने के उद्देश्य से किया गया था। 4 जनवरी 2000 को भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने मुआवजे का अवार्ड पारित किया।

मुआवजे से असंतुष्ट होकर भू-स्वामियों (अपीलकर्ताओं) ने अधिनियम की धारा 18(1) के तहत अतिरिक्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन), जमखंडी (एलएसी नंबर 1802/2000) के समक्ष संदर्भ (रेफरेंस) याचिका दायर की। 27 मार्च 2001 को रेफरेंस कोर्ट ने मुआवजा बढ़ाकर 3,00,000 रुपये प्रति एकड़ कर दिया।

इसके बाद अपीलकर्ताओं ने कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ सर्किट पीठ के समक्ष अपील (एमएफए नंबर 20936/2008) दायर की, जिसने 23 जून 2011 को मुआवजा बढ़ाकर 5,00,000 रुपये प्रति एकड़ कर दिया।

अपीलकर्ताओं की मुख्य शिकायत यह थी कि 11 फरवरी 1999 की इसी अधिसूचना के तहत अधिग्रहित अन्य जमीनों के एक अन्य मामले (एमएफए नंबर 21191/2010) में हाईकोर्ट ने 12 दिसंबर 2012 के अपने फैसले के जरिए मुआवजा 6,50,000 रुपये प्रति एकड़ निर्धारित किया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी रविंद्र एवं अन्य बनाम विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी, यूकेपी, बागलकोट (2017) 11 एससीसी 495 मामले में 6,50,000 रुपये प्रति एकड़ की इस दर पर अपनी मुहर लगा दी थी।

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समान मुआवजे की मांग को लेकर अपीलकर्ताओं ने कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटीशन नंबर 100113/2014) दायर की, जिसे हाईकोर्ट ने 7 सितंबर 2015 को खारिज कर दिया। इसके बाद अपीलकर्ताओं ने रविंद्र फैसले के आधार पर समान मुआवजे की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं का कहना था कि चूंकि उनकी जमीन भी 11 फरवरी 1999 की उसी अधिसूचना के तहत अधिग्रहित की गई थी, इसलिए वे रविंद्र एवं अन्य बनाम विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी मामले में स्वीकृत दर के आधार पर समान मुआवजा पाने के हकदार हैं।

प्रतिवादियों ने मामले की तिथियों या तथ्यात्मक ब्यौरे पर कोई विवाद व्यक्त नहीं किया। हालांकि, उन्होंने इस आधार पर कड़ा विरोध किया कि अपीलकर्ता अपने मुआवजे में बढ़ोतरी के दावे को लेकर बिल्कुल भी सतर्क और गंभीर नहीं थे। प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि देरी की इस लंबी अवधि के लिए अपीलकर्ता बढ़े हुए मुआवजे पर ब्याज पाने के हकदार नहीं हैं। प्रतिवादियों ने इस देरी को दो चरणों में विभाजित किया:

  1. 2,383 दिन: 28 मार्च 2001 (रेफरेंस कोर्ट के फैसले के बाद) से लेकर वर्ष 2008 में कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष एमएफए दाखिल करने तक।
  2. 2,044 दिन: 24 जून 2011 (हाईकोर्ट के एमएफए फैसले के बाद) से लेकर 27 जनवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिकाएं (एसएलपी) पुनः दाखिल करने तक।
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कोर्ट का विश्लेषण

मामले के रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए विशेष अनुमति याचिकाएं दाखिल करने में हुई देरी को माफ कर दिया और लीव प्रदान की।

पीठ ने टिप्पणी की कि “अपीलकर्ता किसान थे और इस अधिसूचना के जरिए उनकी कृषि भूमि का अधिग्रहण किया गया था।”

देरी और कानून के समक्ष समान व्यवहार के मुद्दे पर चर्चा करते हुए कोर्ट ने कहा: “देरी असामान्य है। पुनर्विचार याचिका स्वीकार न करने के हाईकोर्ट द्वारा दर्ज किए गए कारण मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में मौजूद हैं। लेकिन मुख्य बात यह है कि इसी अधिसूचना के तहत मुआवजा वैधानिक लाभों के साथ 6,50,000 रुपये प्रति एकड़ तय किया गया है।”

देरी और न्याय के संतुलन को साधते हुए कोर्ट ने माना: “इस मामले की परिस्थितियों में, भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए, हम इस अदालत द्वारा रविंद्र (उपरोक्त) मामले में निर्धारित मुआवजे को इन अपीलकर्ताओं पर भी लागू करते हैं।”

देरी की अवधि के ब्याज दावे पर निर्णय देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया: “अपीलकर्ता संदर्भ अदालत के फैसले की तारीख यानी 28.03.2001 से 2008 में कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष संबंधित एमएफए दाखिल करने की तारीख तक, और हाईकोर्ट द्वारा 24.06.2011 को एमएफए के निपटारे की तारीख से इस अदालत के समक्ष एसएलपी के पुनः दाखिल करने यानी 27.01.2017 तक की अवधि, जो कुल मिलाकर 4,427 दिन बनती है, के लिए ब्याज के हकदार नहीं हैं।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपीलों को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ता वैधानिक लाभों के साथ 6,50,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से बढ़ा हुआ मुआवजा पाने के हकदार हैं। हालांकि, उन्हें 4,427 दिनों की देरी की अवधि के लिए कोई ब्याज नहीं दिया जाएगा। मामले से जुड़े सभी लंबित आवेदनों को भी तदनुसार निपटा दिया गया।

मामले का विवरण

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मामले का शीर्षक: लछप्पा और अन्य बनाम विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी, यूकेपी, बागलकोट और अन्य

वाद संख्या: 2026 की सिविल अपील संख्या (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 5481-5482/2017 से उत्पन्न)

पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी, जस्टिस एन.वी. अंजारिया

निर्णय की तिथि: 7 अगस्त, 2026

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