डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलयू), प्रयागराज में छात्रों के साथ कथित जातिगत भेदभाव और प्रताड़ना के मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने मामले की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए दो सदस्यीय न्यायिक जांच समिति गठित करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने विधि विभागाध्यक्ष और बालक छात्रावास के वार्डन को जांच पूरी होने तक सभी प्रशासनिक दायित्वों से तत्काल प्रभाव से कार्यमुक्त करने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने 16 सितंबर को दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि संबंधित प्राध्यापक (प्रतिवादी संख्या 6) याचिकाकर्ता छात्रों के शैक्षणिक मूल्यांकन, अनुशासनात्मक कार्यवाही अथवा छात्रावास से जुड़े किसी भी प्रशासनिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस चरण पर अदालत ने आरोपों के गुण-दोष अथवा उनकी सत्यता पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
जांच के लिए दो सदस्यीय न्यायिक समिति गठित
हाईकोर्ट ने आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए प्रयागराज जिला अदालत की लघु वाद न्यायालय की न्यायाधीश अर्चना सिंह-प्रथम और प्रयागराज के विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अरुण कुमार यादव को नियुक्त किया है। यह न्यायिक समिति इस बात की जांच कर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी कि क्या अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (एससी-एसटी) वर्ग के छात्रों को विभागाध्यक्ष द्वारा जातिगत अपमान या भेदभाव का शिकार होना पड़ा।
इसके साथ ही, न्यायिक समिति इस तथ्य की भी पड़ताल करेगी कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने पूर्व में प्राप्त शिकायतों के निस्तारण में वैधानिक नियमों व स्थापित प्रक्रियाओं का विधिवत पालन किया था या नहीं।
उत्तर पुस्तिकाओं के स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन का निर्देश
अदालत ने विश्वविद्यालय के कुलपति को निर्देश दिया कि वे एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति का गठन करें। यह समिति पांचवें सेमेस्टर के याचिकाकर्ता छात्र की उन सभी विषयों की उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन करेगी, जिन्हें संबंधित विभागाध्यक्ष ने पढ़ाया अथवा जिनका मूल्यांकन किया था। छात्र द्वारा इंगित किए जाने वाले अन्य विषयों की कॉपियों की भी पुनः जांच कराई जाएगी।
यूजीसी नियमों के अनुपालन पर रिपोर्ट तलब
हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय प्रशासन से पूछा है कि क्या संस्थान में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप समान अवसर प्रकोष्ठ (इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल) तथा एससी-एसटी छात्रों के लिए समर्पित शिकायत निवारण तंत्र सक्रिय है। कुलपति को इन समितियों की संरचना, सदस्यों के विवरण तथा छात्र की मूल शिकायत पर संस्थान द्वारा की गई कार्रवाई का पूरा ब्योरा अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं के आरोप और विवाद की पृष्ठभूमि
यह न्यायिक कार्यवाही एनएलयू के शोधार्थी शुभेंदु आनंद और पांचवें सेमेस्टर में अध्ययनरत बीए एलएलबी (ऑनर्स) के एक छात्र की संयुक्त याचिका पर शुरू हुई है। याचिकाकर्ता छात्र संस्थान के बालक छात्रावास में रहता है। छात्रों का आरोप है कि विभागाध्यक्ष ने अपने अकादमिक और प्रशासनिक अधिकारों का दुरुपयोग कर हाशिए के तबके से आने वाले छात्रों के खिलाफ प्रतिशोध और जातिगत उत्पीड़न का माहौल बनाया।
रिकॉर्ड के अनुसार, स्नातक छात्र ने 20 अगस्त 2026 को कुलपति को औपचारिक शिकायत भेजी थी। छात्र ने कहा कि कई स्मरण पत्रों के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने उसकी शिकायत पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
छात्र ने अपनी शिकायत में उल्लेख किया था कि उसने ‘कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ-1’ में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए थे, जबकि ‘कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ-2’ गोल्ड मेडल वाला विषय था। छात्र का आरोप है कि चौथे सेमेस्टर की शुरुआत में संबंधित विभागाध्यक्ष ने टिप्पणी की थी कि जो छात्र कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ में सर्वाधिक अंक लाया है, वह अब उनके विषय में सर्वोच्च अंक लाकर दिखाए। छात्र का दावा है कि इसके बाद जातिगत पूर्वाग्रह के कारण उसकी उत्तर पुस्तिकाओं की अत्यधिक कठोरता से जांच की गई। छात्र ने यह आरोप भी लगाया कि उक्त संकाय सदस्य ने जाति और आरक्षण नीतियों पर सार्वजनिक रूप से अपमानजनक टिप्पणियां की थीं।

