सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के बोरीवली में बस स्टेशन परियोजना के लिए निर्धारित जमीन से अतिक्रमण हटाने के आदेश का पालन नहीं करने पर बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने BMC कमिश्नर अश्विनी भिड़े का नवंबर 2026 का वेतन रोकने का भी आदेश दिया है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने अश्विनी भिड़े को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों का पालन नहीं करने पर उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।
पीठ ने अतिक्रमण हटाने के लिए BMC को 30 दिन का अतिरिक्त समय देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने पाया कि उसके पिछले निर्देशों के बावजूद जमीन से अतिक्रमण नहीं हटाया गया है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नगर निगम के अधिकारियों और अतिक्रमणकारियों के बीच मिलीभगत की आशंका भी जताई।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने आदेश का पालन नहीं होने पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का जानबूझकर उल्लंघन है, जिसमें अतिक्रमणकारियों की सीधी मिलीभगत और सहायता दिखाई देती है। उन्होंने चेतावनी दी कि अधिकारियों ने अपना रवैया नहीं बदला तो कोर्ट इन बातों को अपने आदेश में दर्ज कर सकता है।
न्यायमूर्ति बागची ने BMC के वकील से कहा कि कमिश्नर को 1 दिसंबर 2026 तक वेतन नहीं मिलेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इससे पहले कोर्ट के आदेश का पालन किया जाना चाहिए।
अतिरिक्त समय देने की मांग खारिज करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अधिकारियों को जरूरत पड़ने पर आधी रात तक बैठकर आदेश पारित करने चाहिए।
अतिक्रमण नहीं हटाने पर दाखिल हुई थी अवमानना याचिका
यह मामला बस स्टेशन परियोजना के प्रस्तावक की ओर से दाखिल अवमानना याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि नगर निगम के अधिकारी परियोजना की जमीन से अवैध कब्जे हटाने में विफल रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 13 नवंबर 2025 को मामले की सुनवाई के दौरान नगर निगम के रवैये पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने कहा था कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि नगर निगम के अधिकारी अतिक्रमण हटाने को लेकर अपने पहले के रुख और जिम्मेदारी से पीछे हटने का प्रयास कर रहे हैं।
हालांकि, अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से पहले कोर्ट ने BMC कमिश्नर को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का अवसर दिया था।
कोर्ट ने हलफनामे में जमीन पर कब्जा करने वाले लोगों के नाम और विवरण, उन्हें जारी नोटिस की प्रतियां तथा उन नोटिसों पर प्राप्त जवाब मांगे थे।
इसके अलावा, कब्जाधारियों द्वारा किरायेदारी या मालिकाना हक के समर्थन में पेश दस्तावेजों और उनकी प्रामाणिकता की जांच के लिए नगर निगम द्वारा की गई कार्रवाई का विवरण भी देने को कहा गया था।
तीन महीने में अतिक्रमण हटाने का दिया था निर्देश
28 जुलाई 2026 को हुई सुनवाई में BMC ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि अतिक्रमणकारियों के खिलाफ महाराष्ट्र क्षेत्रीय एवं नगर नियोजन अधिनियम, 1966 के तहत नोटिस जारी किए गए थे।
हालांकि, नगर निगम ने कहा कि अधिकांश कब्जाधारियों ने उसके खिलाफ सिविल कोर्ट में मुकदमे दाखिल कर दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि सिविल कोर्ट में मुकदमे लंबित होने के कारण अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं की जा सकती।
पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक सिविल कोर्ट ने कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है, तब तक नगर निगम को अवैध कब्जा हटाने के लिए जारी नोटिसों पर आगे कार्रवाई करने से नहीं रोका जा सकता।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने BMC को तीन महीने के भीतर आवश्यक कार्रवाई पूरी करने और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया था।
इन निर्देशों का पालन नहीं होने पर सुप्रीम कोर्ट ने अब BMC पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है और कमिश्नर का नवंबर का वेतन रोकने का आदेश देते हुए उनसे अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं करने का कारण पूछा है।
