बीएनएसएस में वैकल्पिक वैधानिक उपाय मौजूद, आरोप सिर्फ असंज्ञेय अपराध के: दिल्ली हाईकोर्ट ने बीसीआई परिसर विवाद में सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका खारिज की

दिल्ली हाईकोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के परिसर में प्रदर्शनकारी वकीलों पर हुए कथित हमले के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग वाली आपराधिक रिट याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस गिरीश कठपालिया की एकल पीठ ने याचिका को विचारणीय न मानते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) के तहत शिकायतकर्ताओं के पास प्रभावी वैकल्पिक कानूनी उपाय पहले से उपलब्ध हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोपों से केवल असंज्ञेय अपराध बनता है, जिसकी जांच पुलिस बिना मैजिस्ट्रेट के आदेश के नहीं कर सकती। इसके साथ ही कोर्ट ने टिप्पणी की कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल वैधानिक आपराधिक प्रक्रिया को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद अगस्त 2026 की शुरुआत में तब शुरू हुआ जब हैदराबाद स्थित नालसार (NALSAR) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के स्नातक बैच ने विश्वविद्यालय को पत्र लिखकर उस दीक्षांत समारोह पर आपत्ति जताई, जिसमें उन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा डिग्रियां प्रदान की जानी थीं। इसके बाद 13 अगस्त 2026 को बीसीआई अध्यक्ष, वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद मनन कुमार मिश्रा (प्रतिवादी संख्या 1) ने सभी राज्य बार काउंसिलों को निर्देश जारी किया कि वर्ष 2026 में नालसार से कानून की डिग्री प्राप्त करने वाले किसी भी छात्र का नामांकन अगले आदेश तक न किया जाए। चौतरफा आलोचना के बाद बीसीआई ने इस निर्देश में संशोधन किया और कहा कि अधिकांश छात्र निर्दोष हैं तथा उन्हें कुछ शिक्षकों व बाहरी लोगों द्वारा उकसाया गया था।

14 अगस्त 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश ने खुली अदालत में यह स्पष्ट किया कि यह मामला उनके और छात्रों के बीच का संवाद है, जिसमें बीसीआई की कोई भूमिका नहीं है। प्रतिवादी संख्या 1 द्वारा सार्वजनिक माफी मांगे जाने के बावजूद, 18 अगस्त 2026 को बॉम्बे बार एसोसिएशन ने उस माफी को खारिज करते हुए उनके इस्तीफे की मांग की।

इसके विरोध में ऑल इंडिया यंग एडवोकेट्स एसोसिएशन ने 20 अगस्त 2026 को बीसीआई कार्यालय के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आह्वान किया। प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रतिनिधि ज्ञापन सौंपने अंदर गए और दोपहर करीब 2:00 बजे याचिकाकर्ताओं सहित 10 से 14 वकीलों ने बीसीआई परिसर के भीतर शांतिपूर्ण धरना शुरू कर दिया। दोपहर बाद एक अन्य व्यक्ति ने कथित तौर पर गेट का ताला तोड़ दिया, जिसका प्रदर्शनकारियों से कोई संबंध नहीं था।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 20 और 21 अगस्त 2026 की दरमियानी रात करीब 1:15 से 1:20 बजे के बीच 25 से 30 लोग (जिनमें से कई वकीलों की पोशाक में थे) परिसर में घुसे और ग्राउंड फ्लोर पर बैठे वकीलों को घेरकर उनके साथ मारपीट, थप्पड़बाजी और घसीटना शुरू कर दिया। पहली मंजिल से बीच-बचाव करने नीचे आए वकीलों को भी कथित तौर पर पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में पीटा गया। इस घटना को लेकर याचिकाकर्ताओं ने 22 अगस्त 2026 को आईपी एस्टेट थाने के एसएचओ को लिखित शिकायत दी, बीसीआई को ईमेल भेजा और 24 अगस्त 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष को भी प्रतिवेदन दिया, लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर उन्होंने अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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याचिकाकर्ताओं की प्रार्थनाएं और दलीलें

याचिकाकर्ताओं ने अदालत से परमादेश (रिट ऑफ मैंडमस) जारी करने की मांग की थी, ताकि सीबीआई या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी को एफआईआर दर्ज करने तथा बीसीआई अध्यक्ष, कर्मचारियों, अज्ञात हमलावरों और मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों की भूमिका की अदालत की निगरानी में निष्पक्ष जांच का निर्देश दिया जाए। इसके अलावा बीसीआई परिसर के 20 और 21 अगस्त के सीसीटीवी फुटेज को संरक्षित और जब्त करने तथा 20 अगस्त के उनके प्रतिवेदन पर बीसीआई को तर्कसंगत आदेश पारित करने का निर्देश देने की मांग भी की गई थी।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि चूंकि दिल्ली पुलिस सरकार के अधीन आती है और प्रतिवादी संख्या 1 सत्तारूढ़ दल के सांसद हैं, इसलिए निष्पक्ष जांच न होने की आशंका है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की है और मैजिस्ट्रेट की अदालत के पास न तो सीबीआई जांच का निर्देश देने का अधिकार है और न ही वह सीसीटीवी फुटेज जब्त करने का निर्देश दे सकती है।

हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण और पूर्व निर्णय

अनुच्छेद 226 के तहत याचिका की विचारणीयता पर विचार करते हुए जस्टिस गिरीश कठपालिया ने रेखांकित किया कि हाईकोर्ट का रिट क्षेत्राधिकार स्वैच्छिक और सुस्थापित सीमाओं के अधीन है:

“रिट याचिका पर विचार करने या उससे इनकार करने की हाईकोर्ट की शक्ति पर लगाए गए प्रतिबंधों में से एक वैकल्पिक प्रभावी उपाय की उपलब्धता है। जहां पीड़ित व्यक्ति के पास एक वैकल्पिक प्रभावी उपाय उपलब्ध है, उसे रिट की मांग करने के बजाय उसी उपाय को अपनाना होगा।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस नियम के केवल चार अपवाद हैं—मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन, क्षेत्राधिकार का पूर्ण अभाव या किसी कानून को असंवैधानिक चुनौती—और वर्तमान मामले में इनमें से कोई भी अपवाद लागू नहीं होता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के वर्ष 1964 के फैसले थानसिंह नाथमल बनाम सुपरिंटेंडेंट ऑफ टैक्सेज का उल्लेख करते हुए दोहराया कि केवल इसलिए रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं किया जा सकता क्योंकि ऐसा करना वैध है, विशेषकर तब जब वैधानिक उपाय उपलब्ध हों।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ व अन्य (2026) तथा सुजल विश्वास अट्टावर व अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य (2026) का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इन निर्णयों में स्पष्ट किया था कि सीआरपीसी और अब बीएनएसएस के तहत एफआईआर दर्ज न होने की स्थिति में एक विस्तृत और बहुस्तरीय कानूनी ढांचा मौजूद है। इसके तहत कोई भी पीड़ित व्यक्ति बीएनएसएस की धारा 173(4) (पूर्ववर्ती सीआरपीसी 154(3)) के तहत पुलिस अधीक्षक/डीसीपी के समक्ष जा सकता है, धारा 175 (पूर्ववर्ती 156(3)) के तहत मैजिस्ट्रेट का दरवाजा खटखटा सकता है या धारा 223 (पूर्ववर्ती 200) के तहत निजी शिकायत दर्ज कर सकता है।

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने केवल 22 अगस्त को स्थानीय एसएचओ को शिकायत दी थी, लेकिन उन्होंने संबंधित डीसीपी या मैजिस्ट्रेट के समक्ष जाने का वैधानिक रास्ता नहीं अपनाया।

असंज्ञेय अपराध और दावों की अस्वीकृति

कोर्ट ने प्राथमिक स्तर पर यह भी परखा कि क्या दी गई शिकायतों से कोई संज्ञेय अपराध बनता भी है या नहीं:

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“याचिकाकर्ताओं द्वारा दर्ज कराई गई इन शिकायतों से ऐसा प्रतीत होता है कि कोई संज्ञेय अपराध बनता ही नहीं है। क्योंकि एकमात्र आरोप यह है कि कथित हमलावरों (जिनमें से कोई भी कथित तौर पर किसी हथियार से लैस नहीं था) ने याचिकाकर्ताओं को पीटा, थप्पड़ मारे, धुनाई की और घसीटा। यह अधिक से अधिक बीएनएस की धारा 114 के तहत चोट पहुंचाने का अपराध बनता है, जो कि एक असंज्ञेय अपराध है। परिणामस्वरूप, बीएनएसएस की धारा 174 के मद्देनजर केवल संबंधित मैजिस्ट्रेट ही कार्रवाई कर सकते हैं; बल्कि बीएनएसएस की धारा 174 की उप-धारा (2) के तहत कोई भी पुलिस अधिकारी ऐसे अपराध की जांच नहीं करेगा।”

मैजिस्ट्रेट द्वारा सीसीटीवी फुटेज जब्त न कराए जा सकने की दलील को कोर्ट ने “बीएनएसएस के अध्याय XVI के प्रावधानों के दायरे को देखते हुए भ्रामक” करार दिया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ताओं ने खुद स्वीकार किया है कि संबंधित वीडियो पहले से ही पब्लिक डोमेन में उपलब्ध हैं। इसके अलावा 20 अगस्त के प्रतिवेदन (जिसमें बीसीआई अध्यक्ष के इस्तीफे और सुधारों की मांग थी) पर कोई आदेश देने से इनकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि इन प्रशासनिक मांगों का कथित मारपीट की घटना की जांच से कोई संबंध नहीं है।

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दिल्ली पुलिस पर बेबुनियाद आरोपों पर कोर्ट की नाराजगी

याचिका खारिज करने से पहले हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वाली दलीलों पर कड़ी असहमति व्यक्त की:

“किसी विशिष्ट आधार के अभाव में, पूरी दिल्ली पुलिस बल को इस तरह से कलंकित करना उचित नहीं है, विशेषकर तब जब याचिकाकर्ताओं का अपना ही मामला कोई संज्ञेय अपराध दर्शाने में विफल रहता है। इसके अलावा, आशंका का यह तर्क भी टिक नहीं सकता क्योंकि सीबीआई, जिसके खिलाफ मामला दर्ज करने और जांच करने का परमादेश मांगा गया है, वह भी एक सरकारी संस्था है। किसी भी सरकारी संगठन को ऐसे सामान्य, व्यापक और निराधार आरोपों द्वारा बदनाम करने के प्रलोभन से बचना चाहिए। क्योंकि यह आम आदमी के मन में पूरे तंत्र के प्रति नुकसानदेह संशयवाद और अविश्वास पैदा करता है।”

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ताओं के पास बीएनएसएस की धारा 223 के तहत संबंधित मैजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज कराने का प्रभावी वैधानिक विकल्प मौजूद है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने रिट याचिका को विचारणीय न मानते हुए खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: कुणाल यादव व अन्य बनाम मनन कुमार मिश्रा व अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपी (सीआरएल) 2850/2026, सीआरएल.एम.ए. 28622/2026 एवं सीआरएल.एम.ए. 28623/2026
पीठ: जस्टिस गिरीश कठपालिया
निर्णय की तिथि: 21 सितंबर 2026

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