दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी रेल हादसे का सीधा चश्मदीद न होना या रेलवे कर्मचारियों के पास घटना की तत्काल सूचना दर्ज न होना इस बात का सबूत नहीं माना जा सकता कि यात्री ट्रेन से दुर्घटनावश नहीं गिरा था। जस्टिस मनोज कुमार ओहरी की पीठ ने रेलवे दावा अधिकरण द्वारा मुआवजा याचिका खारिज किए जाने के फैसले को रद्द करते हुए माना कि मृतक एक वास्तविक (बोनाफाइड) यात्री था और उसकी मृत्यु “अनहोनी घटना” (अंटोवार्ड इंसिडेंट) के कारण हुई थी। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने मामले को मुआवजे के निर्धारण और वितरण के लिए वापस अधिकरण के पास भेज दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील फूली देवी द्वारा रेलवे दावा अधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 23 के तहत दायर की गई थी। इसमें रेलवे दावा अधिकरण (प्रधान पीठ, दिल्ली) के 21 अक्टूबर 2021 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत उनके बेटे रमेश मीणा की मौत पर वैधानिक मुआवजे की मांग वाली अर्जी खारिज कर दी गई थी।
मामले के अनुसार, 13 नवंबर 2019 को रमेश मीणा अपने बहनोई बाबूलाल के साथ जाटूसाना से रेवाड़ी होते हुए कुंड की यात्रा कर रहे थे। उन्होंने दो वयस्क यात्रियों के लिए एक यात्रा टिकट (टिकट संख्या: UDA23916912) खरीदा था। रेवाड़ी पहुंचने के बाद वे दोनों कुंड जाने वाली पैसेंजर ट्रेन संख्या 59720 में सवार हुए। कुंड स्टेशन पर बाबूलाल तो उतर गए, लेकिन रमेश उसी ट्रेन में रह गए। उसी दिन बाद में रमेश का शव रेवाड़ी और खोरी रेलवे स्टेशनों के बीच रेलवे ट्रैक के पास पाया गया।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि अधिकरण ने साक्ष्यों के मूल्यांकन में अत्यधिक सख्त और संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने दलील दी कि दो यात्रियों के लिए जारी टिकट की जाटूसाना रेलवे स्टेशन से पुष्टि हो चुकी थी और मृतक के साथ मौजूद बाबूलाल की गवाही को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह मृतक के रिश्तेदार थे। अपीलकर्ता ने कहा कि जिस जगह शव मिला, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और पुलिस जांच का रिकॉर्ड, ये सभी ट्रेन से दुर्घटनावश गिरने के तथ्य का समर्थन करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रीना देवी फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि दावेदार पर प्रारंभिक जिम्मेदारी बहुत ज्यादा भारी नहीं होती और मामले का मूल्यांकन ‘संभावनाओं की प्रबलता’ (प्रीपॉन्डरेंस ऑफ प्रोबेबिलिटीज) के आधार पर किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, भारत संघ की ओर से पेश वकील ने अधिकरण के निर्णय का समर्थन करते हुए कहा कि ऐसा कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि मृतक ट्रेन संख्या 59720 से गिरा था। रेलवे का कहना था कि न तो लोको पायलट और न ही गार्ड को किसी यात्री के गिरने की सूचना मिली थी, न ही कोई अलार्म-चेन खींची गई थी और न ही खोरी स्टेशन पर ऐसी किसी घटना का समकालीन रिकॉर्ड था। इसके अतिरिक्त, मृतक के पास से कोई टिकट बरामद नहीं हुआ था और टिकट बाद में बाबूलाल द्वारा पेश किया गया था, जिनकी विश्वसनीयता पर अधिकरण ने संदेह जताया था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
रिकॉर्ड का विश्लेषण करते हुए जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने सबसे पहले यह देखा कि क्या मृतक एक वैध यात्री था। कोर्ट ने रेखांकित किया कि जाटूसाना स्टेशन से जारी टिकट संख्या UDA23916912 की सत्यता असंदिग्ध थी और रेलवे द्वारा इसकी पुष्टि की गई थी। कोर्ट ने माना कि मृतक के शरीर से प्रत्यक्ष रूप से टिकट बरामद न होना उसके वैध यात्री होने के दर्जे को समाप्त नहीं करता, विशेषकर तब जब वैध टिकट उसके सह-यात्री बाबूलाल द्वारा पेश किया गया था। इस प्रकार दावेदार ने अपनी प्रारंभिक जिम्मेदारी पूरी कर दी थी।
हाईकोर्ट ने अधिकरण के उस निष्कर्ष को भी खारिज कर दिया जिसमें बाबूलाल को गढ़ा हुआ गवाह माना गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पारिवारिक रिश्तेदारी या कुंड स्टेशन पर उतरने की परिस्थितियां उनकी गवाही को स्वतः झूठा नहीं ठहरातीं, क्योंकि उनके बयान की पुष्टि यात्रा टिकट और अन्य रिकॉर्ड से होती है।
इसके बाद कोर्ट ने रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 123(सी) सहपठित धारा 124-ए के तहत “अनहोनी घटना” के बिंदु पर विचार किया। कोर्ट ने कहा कि चलती ट्रेन से दुर्घटनावश गिरना अपने आप में ऐसी घटना है जिसे जरूरी नहीं कि साथी यात्रियों ने देखा हो या रेलकर्मियों ने तुरंत नोटिस किया हो:
“गिरने के सटीक क्षण का कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य न होना, दावेदार के खिलाफ सकारात्मक सबूत में तब्दील नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अधिनियम की धारा 124-ए बिना किसी गलती के पूर्ण दायित्व (स्ट्रिक्ट या नो-फॉल्ट लायबिलिटी) का प्रावधान करती है, जिसमें दावेदार को रेलवे प्रशासन की लापरवाही साबित करने की आवश्यकता नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम प्रभाकरण विजया कुमार मामले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि यह कानून एक कल्याणकारी वैधानिक प्रावधान है, जिसकी संकीर्ण और तकनीकी के बजाय उदार और उद्देश्यपूर्ण व्याख्या की जानी चाहिए। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने अपने पूर्व के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम अमित पराशर फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि यात्री कैसे गिरा इसका सीधा साक्ष्य न होना यह साबित नहीं करता कि वह ट्रेन से नहीं गिरा था।
साक्ष्यों के कानूनी मानक को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“हादसे को किसी द्वारा न देखा जाना, या रेलवे अधिकारियों को तुरंत सूचना न मिलना, प्रत्यक्ष या समकालीन साक्ष्य के अभाव को तो स्पष्ट कर सकता है, लेकिन इसे दुर्घटना के घटित न होने के सकारात्मक प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता।”
चूंकि प्रतिवादी रेलवे की ओर से मौत का कोई वैकल्पिक कारण या तरीका साबित करने के लिए कोई पुख्ता सामग्री पेश नहीं की गई, इसलिए हाईकोर्ट ने माना कि चश्मदीद गवाह या समकालीन प्रशासनिक रिपोर्ट के अभाव के आधार पर दावे को खारिज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए अधिकरण के 21 अक्टूबर 2021 के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने मामले को रेलवे दावा अधिकरण के पास वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि कानून के अनुसार देय मुआवजे का आकलन किया जाए और संबंधित अधिकारियों को इस आदेश की प्रति मिलने के दो महीने के भीतर राशि वितरित करने का निर्देश दिया जाए। इसके लिए दोनों पक्षों को 15 अक्टूबर 2026 को अधिकरण के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: फूली देवी बनाम भारत संघ
वाद संख्या: एफएओ 77/2022
पीठ: जस्टिस मनोज कुमार ओहरी
निर्णय की तिथि: 21 सितंबर 2026

