दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जिन कंपनी शेयरों के ट्रांसफर को पहले ही नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के समक्ष चुनौती दी जा चुकी है और मामला वहां विचाराधीन है, उन्हें दीवानी विभाजन वाद (पार्टीशन सूट) में शामिल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए जस्टिस अजय दिगपॉल ने निर्णय दिया कि जब तक ट्रांसफर की वैधता पर कंपनी कानून के विशेष ट्रिब्यूनल द्वारा याचिकाकर्ता के पक्ष में अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक सिविल कोर्ट ऐसे शेयरों को पैतृक संपत्तियों के बंटवारे के दायरे में नहीं ला सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद एक परिवार के सदस्यों के बीच पैतृक संपत्ति के विभाजन से जुड़ा है। भाइयों के पिता, जो एक निजी कंपनी (धवन इलेक्ट्रिकल्स प्राइवेट लिमिटेड) के संस्थापक और निदेशक थे, उनका 17 जून 2010 को बिना कोई वसीयत किए निधन हो गया था। इस कंपनी में कुल 1,000 शेयरों में से 85 प्रतिशत (850 शेयर) दिवंगत पिता के नाम थे, जबकि 10 शेयर याचिकाकर्ता बेटे के पास थे और बाकी शेयर परिवार के अन्य सदस्यों में बंटे थे। याचिकाकर्ता भी कंपनी में निदेशक के रूप में कार्यरत था और 2011 तक 50,000 रुपये मासिक वेतन प्राप्त कर रहा था।
प्रतिवादी पक्ष का कहना था कि पिता ने अपने निधन से ठीक पहले सभी वारिसों की मौजूदगी में अपने पूरे 85 प्रतिशत शेयर प्रतिवादी संख्या 1 के नाम ट्रांसफर कर दिए थे। इसके बाद, अप्रैल 2012 में याचिकाकर्ता ने केवल अचल संपत्तियों के बंटवारे और कब्जे के लिए सिविल कोर्ट में विभाजन वाद दायर किया। उसी दौरान, अगस्त 2012 में याचिकाकर्ता ने कंपनी लॉ बोर्ड (अब एनसीएलटी) के समक्ष कंपनी अधिनियम की धारा 397, 398, 402 और 403 के तहत याचिका दायर कर आरोप लगाया कि फर्जी बोर्ड बैठक के जरिए शेयर अवैध रूप से ट्रांसफर किए गए हैं, जिसे निरस्त घोषित किया जाए।
दीवानी मुकदमे में कोर्ट द्वारा विवाद तय (इशू फ्रेम) किए जाने के बाद, याचिकाकर्ता ने 20 मार्च 2014 को सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 6 नियम 17 के तहत अर्जी दाखिल की। इसके जरिए वह वादपत्र में संशोधन कर बैंक खातों, फिक्स्ड डिपॉजिट, गहनों के साथ-साथ उक्त कंपनी के शेयरों को भी विभाजन की सूची में शामिल करना चाहता था। निचली अदालत ने 26 अगस्त 2020 को यह अर्जी खारिज कर दी। निचली अदालत ने माना कि निदेशक होने के नाते याचिकाकर्ता को शेयर ट्रांसफर की जानकारी थी, मामला पहले से एनसीएलटी में लंबित है और इससे मुकदमे की मूल प्रकृति बदल जाएगी। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि निचली अदालत ने यह मानकर भूल की कि याचिकाकर्ता को शेयर ट्रांसफर की जानकारी पहले से थी। उन्होंने कहा कि अस्पताल में ट्रांसफर के समय याचिकाकर्ता मौजूद नहीं था और उसे बाद में 16 अगस्त 2010 की बोर्ड मीटिंग का एक विवरण दिया गया था, जिसमें सभी कानूनी वारिसों के बीच शेयरों को बराबर बांटने की बात कही गई थी। याचिकाकर्ता ने राजेश शर्मा बनाम कृष्ण पाल व अन्य, बी.के. नारायण पिल्लई बनाम परमेश्वरन पिल्लई व अन्य और बलदेव सिंह व अन्य बनाम मनोहर सिंह व अन्य फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वास्तविक विवाद के निपटारे के लिए संशोधनों पर उदार दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। यह भी तर्क दिया गया कि चूंकि गवाही शुरू नहीं हुई है, इसलिए ट्रायल शुरू नहीं माना जा सकता। वहीं अरुणा ओसवाल बनाम पंकज ओसवाल व अन्य और अमोनिया सप्लाइज कॉर्पोरेशन प्राइवेट लिमिटेड बनाम मॉडर्न प्लास्टिक कंटेनर्स प्राइवेट लिमिटेड का उल्लेख कर कहा गया कि एनसीएलटी वसीयत, उत्तराधिकार और जालसाजी जैसे जटिल विवादों को तय नहीं कर सकता।
इसके विपरीत, प्रतिवादियों के वकील ने कंपनी अधिनियम की धारा 430 का हवाला देते हुए मैसर्स कार्याण ग्लोबल एलएलपी बनाम विवेक कुमार मिश्रा व अन्य का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब शेयर ट्रांसफर की वैधता का प्रश्न पहले ही एनसीएलटी में विचाराधीन है, तो सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार पर पूर्ण रोक है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ‘फोरम शॉपिंग’ कर रहा है और उसने जरूरी सतर्कता (ड्यू डिलिजेंस) नहीं बरती। 2011 तक वेतन पाने वाला निदेशक यह दावा नहीं कर सकता कि उसे 2014 तक ट्रांसफर की भनक नहीं थी, जबकि उसने खुद अगस्त 2012 में एनसीएलटी में याचिका दायर कर दी थी। प्रतिवादियों ने यह भी कहा कि चूंकि शेयर पिता के जीवनकाल में ही ट्रांसफर हो चुके थे, इसलिए उनकी मृत्यु के समय वे उनकी संपत्ति का हिस्सा नहीं थे। साथ ही कैलाश बनाम नानखू का हवाला देकर कहा गया कि वाद तय होने के बाद ट्रायल शुरू हो चुका माना जाता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने कानूनी प्रावधानों और पूर्व उदाहरणों पर विचार करते हुए कहा कि एनसीएलटी के पास अदालतों जैसी व्यापक अर्ध-न्यायिक शक्तियां हैं। कोर्ट ने राधारमणन बनाम चंद्रशेखर राजा, कमल कुमार गुप्ता बनाम रूबी जनरल हॉस्पिटल लिमिटेड और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज लिमिटेड बनाम साइरस इन्वेस्टमेंट्स (पी) लिमिटेड का उल्लेख किया।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के मिसेज शैलजा कृष्णा बनाम सातोरी ग्लोबल लिमिटेड व अन्य मामले के फैसले पर विशेष भरोसा जताते हुए कहा:
“उपर्युक्त निर्णय इस दृष्टिकोण की पुष्टि करते हैं कि एनसीएलटी/सीएलबी के पास उत्पीड़न और कुप्रबंधन का आरोप लगाने वाली शिकायत से जुड़े या उसके अभिन्न सभी मामलों का निर्णय करने का व्यापक अधिकार क्षेत्र है। हालांकि, यह शक्ति किसी अन्य विधायी प्रावधान के अधीन है जो एनसीएलटी/सीएलबी को इस संबंध में अपनी शक्तियों का प्रयोग करने से विशेष रूप से रोकता हो।”
“वर्तमान मामले में, यह एक स्वीकृत तथ्य है कि गिफ्ट डीड वैध है या नहीं, इसका निर्धारण इस निर्णय का मुख्य आधार है। इसलिए, एनसीएलटी के पास यह तय करने का पूर्ण क्षेत्राधिकार था कि गिफ्ट डीड वैध है या नहीं, या क्या यह 1956 अधिनियम के प्रावधानों और/या कंपनी के आंतरिक नियमों (जिसमें एओए और मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन शामिल हैं लेकिन इन्हीं तक सीमित नहीं हैं) के विरुद्ध है।”
जस्टिस दिगपॉल ने स्पष्ट किया कि अरुणा ओसवाल मामले का सिद्धांत यहां लागू नहीं होता, क्योंकि उत्तराधिकार या स्वामित्व का सवाल तभी पैदा होता है जब संपत्ति दिवंगत व्यक्ति की संपदा का हिस्सा हो। चूंकि शेयर पिता के जीवनकाल में ही ट्रांसफर हो चुके थे और कंपनी रजिस्ट्रार के रिकॉर्ड में दर्ज थे, इसलिए विभाजन वाद दायर करते समय वे पिता की संपदा का हिस्सा नहीं थे। जब तक एनसीएलटी ट्रांसफर को अवैध ठहराकर रद्द नहीं कर देता, तब तक वे शेयर पैतृक संपत्ति नहीं बन सकते। कोर्ट ने यह भी माना कि अमोनिया सप्लाइज मामला केवल धारा 155 के तहत संक्षिप्त रजिस्टर सुधार तक सीमित था, जबकि उत्पीड़न और कुप्रबंधन के मामलों में एनसीएलटी का दायरा कहीं अधिक व्यापक है।
सीपीसी के आदेश 6 नियम 17 पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एलआईसी बनाम संजीव बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड व अन्य के दिशा-निर्देशों को उद्धृत किया:
“वे सभी संशोधन स्वीकृत किए जाने चाहिए जो विवाद के वास्तविक प्रश्न को निर्धारित करने के लिए आवश्यक हैं, बशर्ते इससे दूसरे पक्ष के साथ अन्याय या पूर्वाग्रह न हो। यह अनिवार्य है, जैसा कि सीपीसी के आदेश 6 नियम 17 के उत्तरार्ध में ‘शैल’ (shall) शब्द के उपयोग से स्पष्ट होता है।”
हाईकोर्ट ने माना कि विवादित शेयरों को पार्टीशन सूट में जोड़ने से प्रतिवादियों पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता उचित सतर्कता साबित करने में विफल रहा। पारिवारिक कंपनी में सक्रिय रहने वाले और वेतनभोगी निदेशक का यह कहना पूरी तरह अस्वाभाविक है कि उसे 2014 तक ट्रांसफर की जानकारी नहीं थी, जबकि वह खुद 2012 में एनसीएलटी जा चुका था। इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता 16 अगस्त 2010 की कथित बैठक का कोई दस्तावेज भी रिकॉर्ड पर पेश नहीं कर सका। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संशोधन याचिकाओं पर उदार दृष्टिकोण अपनाने का अर्थ यह नहीं है कि अदालतें कानून के विपरीत जाकर कोई भी संशोधन स्वीकार कर लें।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालत ने पार्टीशन सूट में कंपनी के शेयरों को जोड़ने की अनुमति न देकर कोई कानूनी गलती नहीं की है। 26 अगस्त 2020 के आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका और उससे जुड़े सभी आवेदनों को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: लोकेश धवन बनाम अरुण धवन व अन्य
वाद संख्या: सीएम(एम) 673/2021 एवं सीएम आवेदन 34697/2021
पीठ: जस्टिस अजय दिगपॉल
निर्णय की तिथि: 21 सितंबर 2026

