कागजी दस्तावेज और जमीनी हकीकत का अंतर पाटने के लिए सर्वे जरूरी, कलकत्ता हाईकोर्ट ने 6 महीने में ट्रायल पूरा करने का दिया निर्देश

कलकत्ता हाईकोर्ट ने संपत्ति पर अतिक्रमण से जुड़े एक पुराने विवाद में कड़ा रुख अपनाते हुए निचली अदालत को दो सप्ताह के भीतर योग्य सर्वे कमिश्नर नियुक्त करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस लंबे समय से लंबित मुकदमे का निपटारा अधिकतम छह महीने के भीतर पूरा किया जाए।

जस्टिस उदय कुमार ने 28 अगस्त के अपने आदेश में निचली अदालत के 1 फरवरी 2025 के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें वादी महिला की स्थानीय सर्वे जांच की मांग को यह कहते हुए ठुकरा दिया गया था कि मामले के निपटारे के लिए केवल कागजी दस्तावेज ही पर्याप्त हैं। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि एक वैज्ञानिक सर्वे कमीशन ‘कागजी मालिकाना हक’ और ‘जमीनी हकीकत’ के बीच की खाई को पाटने का काम करता है।

सीमा विवादों में केवल दस्तावेजों की सीमाएं

हाईकोर्ट ने कहा कि जब विवाद जमीन पर अतिक्रमण और सीमाओं के ओवरलैप होने का हो, तो मौखिक गवाही व्यक्तिपरक हो जाती है। गवाह अपनी याददाश्त या पक्षपातपूर्ण नजरिए से बयान देते हैं, जबकि भौतिक वस्तुएं, दीवारें, नालियां, पानी के जलाशय और रास्ते एक निश्चित भौगोलिक स्थान पर स्थित होते हैं। अदालत ने कहा कि केवल दस्तावेजों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई दीवार या पानी का टैंक किसी साझा रास्ते को अवरुद्ध कर रहा है या नहीं।

जस्टिस कुमार ने निचली अदालत के तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल 1982 के किसी सेल डीड को पढ़कर कोई अदालत तीन फीट के रास्ते की वास्तविक स्थिति या इंच-दर-इंच हुए अतिक्रमण का सटीक आकलन कैसे कर सकती है।

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साझा रास्ते पर अतिक्रमण से जुड़ा विवाद

यह पूरा मामला एक महिला की याचिका से जुड़ा है, जिसका दावा है कि उसने अपने माता-पिता से विरासत में मिली आवासीय संपत्ति पर पूर्ण मालिकाना हक हासिल किया है। महिला के अनुसार, प्लॉट के उत्तर-पूर्वी कोने पर स्थित एक साझा रास्ता उसके घर में प्रवेश और निकास का एकमात्र जरिया है। प्रतिवादियों की संपत्ति इस साझा रास्ते के पश्चिमी हिस्से में स्थित है।

महिला का आरोप है कि 14 अगस्त 2012 को प्रतिवादियों ने इस साझा रास्ते को अपनी संपत्ति में मिलाने की नीयत से अवरोध पैदा करना और कब्जा करना शुरू कर दिया। इसके तहत रास्ते के एक हिस्से पर अवैध रूप से पानी का टैंक और अन्य निर्माण किए गए। पुलिस शिकायत के बाद महिला ने दीवानी मुकदमा दायर किया और अदालत से मौके के निरीक्षण, सटीक माप और जलाशय की वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट तैयार करने के लिए सर्वे कमिश्नर नियुक्त करने का अनुरोध किया था।

अदालत में दोनों पक्षों की कानूनी दलीलें

निचली अदालत द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। महिला की ओर से पेश वकील जयंत कुमार मोंडल और सायनतन रक्षित ने दलील दी कि एक सर्वे-जानकार कमिश्नर अदालत की ‘आंख और कान’ की तरह काम करता है। उन्होंने कहा कि अतिक्रमण से जुड़े विवाद में वैज्ञानिक जांच को रोकना निष्पक्ष सुनवाई की मूल भावना को चोट पहुंचाता है, क्योंकि कागजी मालिकाना हक होने से मौके पर जाकर सीमाओं की पुष्टि करने की आवश्यकता खत्म नहीं हो जाती।

दूसरी तरफ, प्रतिवादियों की ओर से पेश वकील सौनक भट्टाचार्य और सौनक मंडल ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि कमिश्नर की नियुक्ति का उपयोग वादी द्वारा अपने मामले की कमजोरियों को दूर करने और अतिरिक्त सबूत जुटाने के अनुचित साधन के रूप में किया जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि संपत्ति के अस्तित्व और मालिकाना हक को प्राथमिक दस्तावेजों के जरिए ही साबित किया जाना चाहिए।

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समय पर न्याय और मुकदमे के शीघ्र निपटारे पर जोर

मामले की लंबी प्रक्रिया पर चिंता जताते हुए जस्टिस कुमार ने कहा कि दीवानी न्याय प्रणाली की संरचना वादियों के अधिकारों को त्वरित और संरचित तरीके से सुरक्षित करने के लिए बनाई गई है। जब एक दशक से अधिक पुराना साधारण मुकदमा प्री-ट्रायल चरण में ही अटका रहे, तो इससे वादकारियों का धैर्य जवाब देने लगता है और त्वरित न्याय का मूल उद्देश्य प्रभावित होता है।

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हाईकोर्ट ने माना कि यद्यपि वादी पक्ष की वजह से प्रक्रियागत देरी को स्वीकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसका समाधान यह कतई नहीं है कि उस महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य को ही सिरे से नकार दिया जाए जो विवाद की मूल जड़ से जुड़ा है।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि दो सप्ताह के भीतर एक सक्षम सर्वे-जानकार एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया जाए और व्यापक स्थानीय जांच कराकर आगामी छह महीने में ट्रायल पूरा किया जाए।

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