पंजाब के गुरदासपुर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ‘100% प्लेसमेंट गारंटी’ का वादा पूरा न करने पर एक निजी एजुकेशन कंपनी को एमबीए छात्र की पूरी फीस 84,960 रुपये लौटाने का निर्देश दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि छात्रों को लुभाने के लिए शत-प्रतिशत नौकरी की गारंटी देना और फीस लेने के बाद इसे केवल इंटरव्यू कराने या बायोडाटा साझा करने तक सीमित कर देना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत भ्रामक और अनुचित व्यापारिक आचरण है।
गुरदासपुर जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष ललित मोहन डोगरा और सदस्य बी.एस. माथुर की पीठ ने 16 सितंबर को यह निर्णय सुनाया। पीठ ने फीस वापसी के साथ-साथ छात्र को मानसिक उत्पीड़न के बदले 10,000 रुपये का हर्जाना और कानूनी खर्च के तौर पर 5,000 रुपये चुकाने का भी आदेश दिया।
दाखिले के समय स्पष्ट शर्तें बताना अनिवार्य
आयोग ने रेखांकित किया कि कोई भी शिक्षण या प्रशिक्षण संस्थान स्वतंत्र कंपनियों को किसी अभ्यर्थी को नियुक्त करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। हालांकि, यदि कोई संस्थान विज्ञापनों में बिना शर्त ‘100% गारंटीड प्लेसमेंट’ का दावा करता है, तो उसे यह जिम्मेदारी पूरी करनी होगी।
पीठ ने टिप्पणी की कि यदि संस्थान की सेवाएं केवल इंटरव्यू के अवसर दिलाने और प्रोफाइल फॉर्वर्ड करने तक ही सीमित थीं, तो इस सीमा और शर्तों की जानकारी छात्र को दाखिला लेने और फीस जमा करने से पहले ही प्रमुखता से दी जानी चाहिए थी।
कोर्स पूरा होने के बाद भी नहीं मिला रोजगार
शिकायत के अनुसार, एक एमबीए ग्रेजुएट ने ‘100% गारंटीड प्लेसमेंट’ का विज्ञापन देखकर निजी संस्थान के छह महीने के ऑनलाइन ‘एआई इन प्रोडक्ट मैनेजमेंट’ ट्रेनिंग प्रोग्राम में दाखिला लिया था। छात्र ने कोर्स के लिए 84,960 रुपये की फीस अदा की और सफलतापूर्वक पढ़ाई पूरी करने के बाद 24 नवंबर 2025 को उसे प्रमाण पत्र भी मिल गया।
प्रमाण पत्र मिलने के बाद जब छात्र ने नौकरी की मांग की, तो कंपनी लगातार समय सीमा टालती रही और रोजगार दिलाने में नाकाम रही। इसके बाद छात्र ने 15 अप्रैल को संस्थान को कानूनी नोटिस भेजा। नोटिस का कोई जवाब न मिलने पर छात्र ने सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप लगाते हुए जिला उपभोक्ता आयोग में याचिका दायर की।
इंटरव्यू कराना और नौकरी दिलाना दो अलग बातें
कंपनी ने आयोग के समक्ष आरोपों को नकारते हुए तर्क दिया कि ‘100% प्लेसमेंट गारंटी’ का मतलब केवल करियर की तैयारी, प्रोफाइल को बेहतर बनाना और नियोक्ताओं से संपर्क साधना था, क्योंकि अंतिम चयन संबंधित कंपनियों के निर्णय पर निर्भर करता है। कंपनी ने यह भी दावा किया कि छात्र के लिए मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद में अवसर उपलब्ध कराए गए थे, लेकिन उसने दिल्ली-एनसीआर और गुड़गांव क्षेत्र में काम करने को तरजीह दी।
उपभोक्ता आयोग ने कंपनी की इस दलील को खारिज कर दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि रिक्तियों की सूचना देना, स्क्रीनिंग कॉल आयोजित करना या इंटरव्यू की प्रक्रिया में शामिल कराना नौकरी दिलाने के बराबर नहीं माना जा सकता।
आयोग ने पाया कि कंपनी ऐसा कोई भी दस्तावेज, ऑफर लेटर या जॉइनिंग लेटर पेश नहीं कर सकी जिससे यह साबित हो कि छात्र को कोई पक्की नौकरी का प्रस्ताव मिला था और उसने उसे ठुकरा दिया। इसके अलावा, कंपनी ने छात्र के खराब प्रदर्शन को साबित करने के लिए न तो कोई इंटरव्यू मूल्यांकन रिपोर्ट पेश की और न ही संबंधित नियोक्ताओं के बयान दर्ज कराए। ठोस सबूतों के अभाव में आयोग ने संस्थान को अपने वादे का उल्लंघन करने का दोषी ठहराया।

