डॉ. बी.आर. अंबेडकर के ऐतिहासिक प्रिंटिंग प्रेस को आधी रात के बाद गिराए जाने पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने जताई ‘शॉक’; पुलिस को लगाई फटकार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने दादर स्थित ऐतिहासिक ‘बुद्ध भूषण’ प्रिंटिंग प्रेस को 2016 में गिराए जाने के तरीके पर गहरा “शॉक” (आश्चर्य) और “परेशान” करने वाली चिंता व्यक्त की है। यह प्रेस डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा स्थापित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल था। हाईकोर्ट ने विशेष रूप से मुंबई पुलिस को फटकार लगाई है कि शिकायतों के बावजूद उन्होंने इस कार्रवाई को नहीं रोका। साथ ही, कोर्ट ने बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) से आधी रात को तोड़फोड़ करने की असामान्य प्रथा पर जवाब मांगा है।

जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता की बेंच ने 30 अप्रैल को यह आदेश पारित किया। यह आदेश प्रकाश अंबेडकर (वंचित बहुजन अघाड़ी के नेता और डॉ. अंबेडकर के पोते) सहित अन्य द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया। इन याचिकाओं में जून 2016 में मध्य मुंबई स्थित इस ऐतिहासिक ढांचे को “अवैध” तरीके से गिराए जाने को चुनौती दी गई है।

बुद्ध भूषण प्रिंटिंग प्रेस का गहरा ऐतिहासिक महत्व है। याचिकाओं के अनुसार, डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने 1930 में अपने निजी कोष से दादर में जमीन के दो प्लॉट खरीदे थे। 1945 में, उन्होंने एक प्लॉट पर ट्रस्ट बनाया और प्रिंटिंग प्रेस का निर्माण किया। दूसरे प्लॉट पर डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर भवन और यशोधरा संगणक केंद्र स्थित थे।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ट्रस्टियों के बीच कुछ विवाद थे और एक “फर्जी स्ट्रक्चरल ऑडिट रिपोर्ट” की आड़ में, छह ट्रस्टियों ने बीएमसी को यह नोटिस जारी करने के लिए उकसाया कि प्रिंटिंग प्रेस की इमारत जर्जर स्थिति में है। जून 2016 में, आरोपी ट्रस्टी 400 से अधिक लोगों की भीड़ के साथ आए और इमारत को ध्वस्त कर दिया।

प्रेस को बचाने की कोशिशों का विवरण देते हुए याचिका में कहा गया है कि प्रकाश अंबेडकर के भाई आनंद अंबेडकर मदद के लिए भोईवाड़ा पुलिस स्टेशन पहुंचे थे। आरोप है कि पुलिस ने अवैध तोड़फोड़ रोकने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप डॉ. अंबेडकर द्वारा खरीदी गई मशीनें, उनके हस्तलेखन वाले दस्तावेज और “पंचशील ध्वज” नष्ट हो गए।

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हाईकोर्ट ने सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) द्वारा दायर उस हलफनामे पर कड़ी आपत्ति जताई जिसमें आरोपों को “अस्पष्ट और निराधार” बताया गया था।

बेंच ने कहा, “ऐसा विचारहीन हलफनामा पढ़ना बेहद परेशान करने वाला है। पुलिस ने शिकायतों पर जिस तरह से प्रतिक्रिया दी, उस पर हम अपना शॉक व्यक्त करने के लिए मजबूर हैं। बीएमसी या किसी भी अथॉरिटी के लिए आधी रात से सुबह 7 बजे के बीच तोड़फोड़ करना दुर्लभ, या कहें तो अभूतपूर्व है।”

कोर्ट ने पुलिस की “स्पष्ट निष्क्रियता” की आलोचना की और कहा कि पुलिस घटनास्थल पर जाकर इस अवैध कार्रवाई को रोकने में पूरी तरह विफल रही।

हाईकोर्ट ने अब मुंबई पुलिस आयुक्त को इस मुद्दे पर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसमें उन सभी अधिकारियों के नाम बताने होंगे जो घटना की रात भोईवाड़ा पुलिस स्टेशन में ड्यूटी पर तैनात थे।

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इसके साथ ही, बीएमसी आयुक्त को भी मामले में पक्षकार बनाया गया है। उन्हें हलफनामे के जरिए निम्नलिखित स्पष्टीकरण देने होंगे:

  1. क्या इस तोड़फोड़ के लिए आधिकारिक अनुमति ली गई थी?
  2. क्या मुंबई में आधी रात के बाद तोड़फोड़ करना सामान्य प्रक्रिया है या यह एक अलग मामला था?

कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 15 जून के लिए तय की है।

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