सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि हाईकोर्ट या सत्र न्यायालय जमानत क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए राज्य कार्यपालिका को व्यापक प्रशासनिक या विभागीय निर्देश जारी नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत के प्रावधानों के तहत किसी भी अदालत का क्षेत्राधिकार केवल इस बात का निर्णय करने तक सीमित है कि किसी आरोपी व्यक्ति को मुकदमे के लंबित रहने तक हिरासत में रखा जाना चाहिए या समाज में रिहा किया जाना चाहिए। अदालत की वैधानिक शक्तियां कानून के दायरे से बाहर जाकर कार्य नहीं कर सकती हैं।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आक्षेपित आदेश के निर्देशों को खारिज कर दिया, जिसमें उत्तर प्रदेश राज्य के भीतर एक सख्त विभागीय जवाबदेही प्रणाली लागू करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकहित को ध्यान में रखते हुए, राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में स्वतंत्र रूप से उठाए गए प्रशासनिक कदम इस फैसले से अप्रभावी रहेंगे और कार्य करते रहेंगे।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता रामबालक ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपनी दूसरी जमानत याचिका (CRMBA No. 9700 of 2025) दायर की थी। यह मामला हमीरपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज केस क्राइम नंबर 175/2002 से संबंधित था, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 की धारा 419, 420, 467, 468 और 471 के तहत आरोप लगाए गए थे।
1 अप्रैल 2025 के अपने आदेश में हाईकोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। याचिका खारिज करने के साथ ही हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को यह निर्देश भी जारी किया कि वह आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 62 और 69 के तहत समन जारी करे और अदालती कार्यवाही में देरी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई करे।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी अनिवार्य किया कि ट्रायल कोर्ट पूर्व के मामलों, जैसे भंवर सिंह उर्फ करमवीर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (CRMBA No. 16871 of 2023) और जितेंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (CRMBA No. 9126 of 2023) में दिए गए निर्देशों तथा पुलिस महानिदेशक (DGP) व गृह सचिव द्वारा जारी सर्कुलर का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करे।
रामबालक ने हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने 26 नवंबर 2025 को एक अंतरिम आदेश के माध्यम से अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा कर दिया और इस कानूनी सवाल पर विचार करने के लिए मामले को सुरक्षित रख लिया कि क्या जमानत क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए अदालतें इस प्रकार के प्रशासनिक निर्देश दे सकती हैं।
हाईकोर्ट के विभागीय जवाबदेही संबंधी निर्देश
अपील के केंद्र में रहे ये प्रशासनिक निर्देश मूल रूप से इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक एकल न्यायाधीश द्वारा जितेंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में 14 सितंबर 2023 को दिए गए आदेश से उपजे थे। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि राज्य में आपराधिक न्याय प्रणाली समन तामील करने और गवाहों की समय पर उपस्थिति दर्ज कराने में गंभीर देरी का सामना कर रही है।
इस स्थिति से निपटने के लिए हाईकोर्ट ने अपर मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक (DGP), उत्तर प्रदेश से व्यक्तिगत हलफनामे मांगे थे। इसके जवाब में गृह विभाग और DGP द्वारा अदालती प्रक्रियाओं में सुधार के लिए कई कदम उठाए गए, जिन्हें हाईकोर्ट ने अपने आदेश के रूप में लागू कर दिया। इन निर्देशों में शामिल थे:
- नोडल अधिकारियों की नियुक्ति: समन, वारंट और नोटिस की समय पर तामीली के लिए प्रत्येक जिले और कमिश्नरेट में पुलिस अधीक्षक (SP) स्तर के अधिकारी को नोडल अधिकारी नियुक्त करना।
- गवाह रजिस्टर: कोर्ट मुहर्रिर के स्तर पर एक अनिवार्य गवाह रजिस्टर का रख-रखाव करना, जिसमें अभियोजन पक्ष के प्रत्येक गवाह का नाम, पता, मोबाइल नंबर और आधार नंबर दर्ज हो।
- समन डेस्क की स्थापना: नोडल अधिकारी के कार्यालय में एक केंद्रीय रजिस्टर और विशेष “समन/वारंट डेस्क” बनाना ताकि दैनिक अदालती प्रक्रियाओं पर नजर रखी जा सके।
- जवाबदेही और जुर्माना: समन तामीली की साप्ताहिक समीक्षा करना और लगातार तीन महीनों की लापरवाही पाए जाने पर संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी करना।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि इन प्रशासनिक और सरकारी सर्कुलरों को क्रियान्वयन के उद्देश्य से “इस न्यायालय का आदेश माना जाएगा”, जिसे रामबालक की जमानत याचिका खारिज करते समय भी दोहराया गया था।
पक्षों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता के वकील, उत्तर प्रदेश राज्य के प्रतिनिधि और एमिकस क्यूरी सुश्री आकृति चौबे की दलीलों को विस्तार से सुना। इस मामले में विचारणीय मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 483 के तहत हाईकोर्ट को जमानत याचिका सुनते समय ऐसे व्यापक और नीतिगत निर्देश जारी करने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने अपने विश्लेषण की शुरुआत BNSS, 2023 की धारा 483 की भाषा और उसके प्रावधानों की समीक्षा से की, जो हाईकोर्ट या सत्र न्यायालय को जमानत के संबंध में “विशेष शक्तियां” प्रदान करती है। धारा 483 (1) के अनुसार, अदालत किसी आरोपी को जमानत पर रिहा करने या मजिस्ट्रेट द्वारा लगाई गई शर्तों में संशोधन करने का निर्देश दे सकती है।
अदालत ने हाल ही में दिए गए अपने फैसले उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनिरुद्ध (2026 SCC OnLine SC 40) का विशेष उल्लेख किया। इस मामले में भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के मामलों में पीड़ितों के वैज्ञानिक आयु निर्धारण के लिए व्यापक निर्देश जारी किए थे, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने क्षेत्राधिकार से बाहर का कदम ठहराया था।
अनिरुद्ध मामले का हवाला देते हुए खंडपीठ ने जमानत क्षेत्राधिकार की सीमाओं को रेखांकित किया:
“उपरोक्त चर्चा का निष्कर्ष यह है कि धारा 439 CrPC [अब BNSS की धारा 483] के तहत सत्र न्यायालय या हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार केवल इस बात का फैसला करने तक सीमित है कि संबंधित व्यक्ति को मुकदमे के लंबित रहने के दौरान समाज में रिहा किया जाए या उन्हें हिरासत में रखा जाना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट ने संविधानिक न्यायालय के रूप में हाईकोर्ट की शक्तियों और किसी विशेष वैधानिक कानून के तहत मिली शक्तियों के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा:
“इसमें कोई संदेह नहीं है कि हाईकोर्ट एक संवैधानिक न्यायालय है। हालांकि, वर्तमान मामले में हाईकोर्ट द्वारा क्षेत्राधिकार की त्रुटि एक वैधानिक शक्ति के प्रयोग में की गई थी न कि संविधान के तहत। संविधान से उत्पन्न होने वाली शक्तियां और किसी कानून (वैधानिक) से मिलने वाली शक्तियां अलग और स्वतंत्र हैं…
संवैधानिक शक्ति वैधानिक शक्ति पर इस तरह हावी नहीं हो सकती कि उसका दायरा उस सीमा से अधिक बढ़ जाए जिसकी परिकल्पना कानून द्वारा की गई है। दूसरे शब्दों में, हालांकि दोनों शक्तियां हाईकोर्ट के पास हैं, लेकिन एक शक्ति दूसरी के दायरे को नहीं हड़प सकती, जब तक कि कानून द्वारा अन्यथा अनुमति न दी गई हो।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट ने जमानत याचिका पर विचार करते समय प्रशासनिक सुधारों को अनिवार्य करके अपने वैधानिक क्षेत्राधिकार का उल्लंघन किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा:
“केवल इस संक्षिप्त चर्चा के आलोक में, हमारा यह विचार है कि आक्षेपित निर्णय जहां तक पूर्व के जमानत आदेशों में दिए गए निर्देशों का पालन करने का निर्देश देता है, उसे बरकरार नहीं रखा जा सकता और इसे खारिज किया जाना आवश्यक है। तदनुसार आदेश दिया जाता है।”
प्रशासनिक दक्षता और सुधारों की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए अदालत ने राहत देते हुए स्पष्ट किया:
“हालांकि, न्याय के हित में हम यह निर्देश देते हैं कि राज्य प्राधिकारियों द्वारा स्वतंत्र रूप से जो भी सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं, वे इस निर्णय से अप्रभावित रहेंगे और स्वतंत्र रूप से कार्य करते रहेंगे। यदि आवश्यकता हो, तो राज्य सरकार प्रचलित कानूनों के अनुरूप इनमें आवश्यक संशोधन करने के लिए स्वतंत्र होगी।”
अदालत ने यह भी साफ किया कि क्षेत्राधिकार के इस कानूनी प्रश्न पर दिए गए निर्णय का पूर्व के मामलों में जमानत मिलने या न मिलने के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने 26 नवंबर 2025 के अपने अंतरिम आदेश की पुष्टि करते हुए अपीलकर्ता रामबालक की जमानत को बहाल रखा और अपील को स्वीकार कर लिया।
केस डिटेल्स
- केस का शीर्षक: रामबालक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 2647, वर्ष 2026
- पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
- दिनांक: 19 मई, 2026

