डीरिकग्नाइज्ड मेडिकल कॉलेज से दूसरे निजी मेडिकल कॉलेजों में भेजे गए छात्रों को सरकारी फीस का ‘बोनांजा’ नहीं मिल सकता : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने कहा है कि डीरिकग्नाइज्ड निजी मेडिकल कॉलेज से न्यायालय के आदेश पर दूसरे निजी मेडिकल कॉलेजों में स्थानांतरित किए गए छात्र सरकारी मेडिकल कॉलेजों की अत्यधिक सब्सिडी वाली फीस का स्थायी लाभ “विंडफॉल या बोनांजा” के रूप में नहीं ले सकते। अदालत ने डिफॉल्ट करने वाले संस्थान और उसके ट्रस्ट से सुरक्षित लगभग ₹14 करोड़ की राशि तीन ट्रांसफरी मेडिकल कॉलेजों को जारी करने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने ओडिशा के सरदार राजास मेडिकल कॉलेज, हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर से छात्रों के स्थानांतरण से जुड़े मामलों का निस्तारण करते हुए यह फैसला सुनाया। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (अब नेशनल मेडिकल कमीशन) द्वारा कॉलेज में बुनियादी ढांचे और फैकल्टी में गंभीर कमियां पाए जाने के बाद उसकी मान्यता का नवीनीकरण नहीं किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला शैक्षणिक सत्र 2013-2014 और 2014-2015 में सरदार राजास मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस कोर्स में दाखिला लेने वाले छात्रों से संबंधित था। कॉलेज का संचालन सेल्वम एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जाता था।

निरीक्षण के दौरान मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने कॉलेज में इंफ्रास्ट्रक्चर, फैकल्टी और नियामकीय अनुपालन से जुड़ी गंभीर कमियां पाईं, जिसके चलते मान्यता नवीनीकरण से इनकार कर दिया गया। इससे छात्रों का शैक्षणिक भविष्य संकट में पड़ गया।

इसके बाद उड़ीसा हाईकोर्ट ने छात्रों को राज्य के मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेजों में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान 122 छात्रों को तीन निजी मेडिकल कॉलेजों — कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड सम हॉस्पिटल और हाई-टेक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल — में स्थानांतरित किया गया।

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सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेशों के तहत राज्य पर्यवेक्षण में काउंसलिंग प्रक्रिया के माध्यम से छात्रों का स्थानांतरण किया गया ताकि उनका एक भी शैक्षणिक वर्ष खराब न हो।

ट्रांसफरी कॉलेजों की मांग

इन तीनों ट्रांसफरी कॉलेजों ने बाद में सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दाखिल कर स्थानांतरित छात्रों को दी गई शिक्षा के एवज में फीस भुगतान और प्रतिपूर्ति की मांग की।

कॉलेजों का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेशों के कारण छात्रों ने केवल लगभग ₹30,000 वार्षिक की सरकारी दर वाली फीस जमा की, जबकि निजी मेडिकल कॉलेजों की वास्तविक फीस इससे कहीं अधिक थी।

अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद फीस चार्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि इन निजी संस्थानों की फीस संरचना एसआरएमसीएच की फीस से भी काफी अधिक थी।

कॉलेजों ने यह भी कहा कि उन्होंने छात्रों को स्टाइपेंड भी दिया और अदालत के आदेश पर अतिरिक्त छात्रों को समायोजित करने के कारण वित्तीय नुकसान उठाया।

छात्रों का पक्ष

छात्रों ने दलील दी कि उन्होंने वैध प्रक्रिया के तहत दाखिला लिया था और उनकी किसी गलती के बिना उन्हें कॉलेज बदलना पड़ा। उनका कहना था कि उन्होंने वर्षों की अनिश्चितता और कठिनाइयों के बाद अपनी मेडिकल शिक्षा पूरी की है, इसलिए अब उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं डाला जाना चाहिए।

वहीं सेल्वम एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट ने तर्क दिया कि कॉलेज में कमियों से जुड़े निष्कर्ष अब भी विवादित हैं और बिना उचित निर्णय के पूरी देनदारी ट्रस्ट पर नहीं डाली जा सकती।

सरकारी फीस पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने कहा कि सरकारी कोटा और मैनेजमेंट कोटा का विवाद यहां लागू नहीं होता क्योंकि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है कि ट्रांसफरी कॉलेजों में सरकारी कोटा की सीटें खाली थीं। इसलिए यह माना जाएगा कि सभी छात्रों को निजी या मैनेजमेंट कोटा सीटों पर समायोजित किया गया।

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पीठ ने 2014 के अंतरिम आदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय छात्रों को सरकारी दर वाली फीस पर पढ़ाई जारी रखने की अनुमति एक असाधारण स्थिति से निपटने के लिए दी गई थी।

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि जो छात्र मूल रूप से एक निजी मेडिकल कॉलेज में उच्च फीस संरचना के साथ दाखिल हुए थे, वे स्थायी रूप से सरकारी सब्सिडी वाली फीस का लाभ नहीं ले सकते।

अदालत ने कहा:

“हमारी राय में यह ट्रांसफरी छात्रों का अनुचित समृद्धिकरण (unjust enrichment) होगा…”

पीठ ने आगे कहा:

“न तो छात्रों को अनुचित लाभ या बोनांजा दिया जा सकता है और न ही डिफॉल्ट करने वाले संस्थान यानी एसआरएमसीएच/सेल्वम ट्रस्ट को अपनी गलतियों का लाभ उठाने दिया जा सकता है।”

डिफॉल्ट करने वाले ट्रस्ट पर डाली गई जिम्मेदारी

अदालत ने कहा कि एसआरएमसीएच पहले ही छात्रों से भारी फीस वसूल चुका था और उसने एमसीआई/एनएमसी के पास लगभग ₹10 करोड़ की बैंक गारंटी भी जमा कर रखी थी। इसके अलावा ₹2 करोड़ की राशि सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में जमा थी।

पीठ ने कहा कि वित्तीय जिम्मेदारी का मुख्य बोझ डिफॉल्ट करने वाले संस्थान और ट्रस्ट पर ही डाला जाना चाहिए। इसी के तहत अदालत ने ₹10 करोड़ की बैंक गारंटी और ₹2 करोड़ की जमा राशि सहित उस पर अर्जित ब्याज तीनों ट्रांसफरी कॉलेजों में बराबर बांटने का निर्देश दिया।

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अदालत ने एनएमसी को तीन महीने के भीतर बैंक गारंटी की राशि जारी करने का निर्देश दिया।

छात्रों पर अब भी बकाया देनदारी संभव

पीठ ने कहा कि लगभग ₹14 करोड़ जारी होने के बावजूद ट्रांसफरी कॉलेजों को एसआरएमसीएच की फीस दरों के हिसाब से भी पूरी राशि प्राप्त नहीं होगी।

अदालत ने यह भी नोट किया कि छात्रों ने लिखित अंडरटेकिंग दी थी कि फीस देनदारी का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और वे अंतिम निर्णय का पालन करेंगे।

इसके बाद अदालत ने ट्रांसफरी कॉलेजों को अनुमति दी कि वे बकाया फीस की वसूली के लिए एनएमसी के समक्ष प्रतिनिधित्व प्रस्तुत कर सकते हैं।

साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि छात्रों द्वारा एसआरएमसीएच को पहले से दी गई राशि का समायोजन किया जाएगा।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि निर्धारित फीस देनदारी पूरी करने वाले छात्रों को सभी शैक्षणिक रिकॉर्ड, प्रमाणपत्र और कोर्स पूर्णता दस्तावेज तुरंत जारी किए जाएं।

वाद विवरण

वाद शीर्षक: सौम्या रंजन पांडा एवं अन्य बनाम सुभालक्ष्मी दास एवं अन्य

वाद संख्या: सिविल अपील, एसएलपी (सिविल) संख्या 35075-35076 वर्ष 2015 से उत्पन्न

पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता

निर्णय दिनांक: 14 मई 2026

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