आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी अदालत के पास आदेश पारित करने का कानूनी अधिकार मौजूद है, तो केवल गलत धारा (provision) का उल्लेख करना या किसी धारा का उल्लेख न करना याचिका को खारिज करने का वैध आधार नहीं हो सकता। जस्टिस रवि नाथ तिलहारी ने चोडावरम के IX एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज द्वारा एक निष्पादन याचिका (EP) को खारिज किए जाने के खिलाफ दायर सिविल रिवीजन पिटीशन को स्वीकार करते हुए यह निर्णय लिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, अल्लू नागेश्वर राव, एक डिक्री-धारक (decree-holder) हैं। शुरुआत में, जिला वन अधिकारी (प्रतिवादी) ने वन अधिनियम के तहत एक वाहन (पंजीकरण संख्या AP 27TT 9091) को जब्त करने का आदेश जारी किया था। याचिकाकर्ता ने इसे F.A. नंबर 05/2021 के माध्यम से चुनौती दी थी।
12 अगस्त, 2024 को चोडावरम की अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए जब्ती के आदेश को रद्द कर दिया और प्रतिवादी को वाहन वापस करने का निर्देश दिया। हालांकि इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में एक पुनरीक्षण याचिका (C.R.P. No. 1670 of 2025) लंबित थी, लेकिन उस पर कोई रोक (stay) नहीं लगाई गई थी।
जब प्रतिवादियों ने डिक्री का पालन नहीं किया, तो याचिकाकर्ता ने E.P. संख्या 21/2025 दायर की। इस याचिका में याचिकाकर्ता ने गलती से नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 21 नियम 37 और 38 का उल्लेख कर दिया और आदेश की अवज्ञा के लिए सजा की मांग की।
निचली अदालत का निर्णय
5 फरवरी, 2026 को निष्पादन न्यायालय (Execution Court) ने याचिका को दो मुख्य आधारों पर खारिज कर दिया था:
- गलत कानूनी धारा: अदालत का मानना था कि CPC के आदेश 21 नियम 37 और 38 केवल धन की वसूली (money decree) से संबंधित मामलों में लागू होते हैं, जो इस मामले में प्रासंगिक नहीं थे।
- अवज्ञा के प्रमाण का अभाव: अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि प्रतिवादियों ने जानबूझकर आदेश की अवज्ञा की थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि डिक्री जब्त की गई चल संपत्ति की वापसी के लिए थी, इसलिए यह CPC के आदेश 21 नियम 31 के तहत निष्पादन योग्य थी। उन्होंने दलील दी कि केवल गलत धारा का उल्लेख करने मात्र से अदालत का क्षेत्राधिकार (jurisdiction) खत्म नहीं हो जाता।
वहीं, प्रतिवादियों की ओर से पेश सरकारी वकील ने स्वीकार किया कि डिक्री को आदेश 21 नियम 31 के तहत लागू किया जा सकता है, लेकिन नियम 37 और 38 के तहत नहीं। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को सही प्रावधान के तहत आवेदन करना चाहिए था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
जस्टिस रवि नाथ तिलहारी ने पाया कि हालांकि निचली अदालत तकनीकी रूप से सही थी कि धाराएं गलत लिखी गई थीं, लेकिन याचिका को सुनवाई योग्य न मानकर खारिज करना गलत था। कोर्ट ने जोर दिया कि न्यायिक अधिकार कानून से मिलता है, न कि याचिका में लगाए गए लेबल से।
हाईकोर्ट ने अवलोकन किया:
“केवल कानून की गलत धारा का उल्लेख करने या किसी भी धारा का उल्लेख न करने से अदालत का क्षेत्राधिकार समाप्त नहीं हो जाता है। जब कानून अदालत को अधिकार प्रदान करता है और कार्रवाई सही प्रावधान के तहत की जा सकती है, तो अदालत केवल संदर्भित प्रावधान की अनुपलब्धता के आधार पर याचिका को खारिज नहीं कर सकती है।”
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि निष्पादन न्यायालय को स्वयं इस बात पर विचार करना चाहिए था कि क्या डिक्री किसी अन्य सही प्रावधान (जैसे आदेश 21 नियम 31 CPC) के तहत लागू की जा सकती है।
अपने निष्कर्ष के समर्थन में, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पृथ्वीराजसिंह नोधुभा जडेजा बनाम जयेशकुमार छकनदास शाह (2019) 9 SCC 533 मामले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था:
“यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि यदि अदालत के पास आदेश पारित करने की शक्ति उपलब्ध है, तो केवल गलत प्रावधान का उल्लेख करना आवेदन के लिए घातक नहीं है।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने सिविल रिवीजन पिटीशन को स्वीकार करते हुए 5 फरवरी, 2026 के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने E.P. संख्या 21/2025 को पुनर्स्थापित (restore) किया और निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह CPC के आदेश 21 नियम 31 के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए कानून के अनुसार नए सिरे से निर्णय ले।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अल्लू नागेश्वर राव बनाम जिला वन अधिकारी-सह-प्राधिकृत अधिकारी एवं अन्य
केस संख्या: सिविल रिवीजन पिटीशन नंबर 922 ऑफ 2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी
दिनांक: 01.05.2026

