दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन को दिए गए अपने पिछले राहत संबंधी आदेशों को वापस ले लिया है। हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2020 के एक महत्वपूर्ण आदेश से जुड़े तथ्यों को प्रथम दृष्टया छिपाया है। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने रिट याचिका को बहाल करते हुए वरदराजन को नोटिस जारी किया है और सात कार्य दिवसों के भीतर एक हलफनामा दायर कर अपने आचरण पर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है।
इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या याचिकाकर्ता ने अपनी ‘पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन’ (PIO) स्थिति को ‘ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया’ (OCI) में बदलने और अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए ‘रिटर्न वीजा’ की मांग करते समय अदालत के समक्ष “पूर्ण प्रकटीकरण” (full disclosure) के सिद्धांत का पालन किया था। हाईकोर्ट ने इस बात की समीक्षा की कि क्या किसी बाइंडिंग आदेश को छिपाना—जिसमें पासपोर्ट जमा करने और विदेश यात्रा पर रोक जैसी शर्तें शामिल थीं—अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
अमेरिकी नागरिक सिद्धार्थ वरदराजन ने केंद्र सरकार के 2 अप्रैल के उस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनके PIO कार्ड को OCI में बदलने के आवेदन को खारिज कर दिया गया था। 12 मई को हाईकोर्ट ने केंद्र के इस फैसले को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि यह बिना किसी ठोस कारण के लिया गया था। इसके बाद, 13 मई को हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे वरदराजन के “रिटर्न वीजा” आवेदन पर विचार करें ताकि वे 14 से 19 मई के बीच एस्टोनिया की यात्रा कर सकें।
हालांकि, बाद में यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का 2020 का एक आदेश लागू था। वह आदेश उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ कथित आपत्तिजनक ट्वीट से जुड़े एक आपराधिक मामले में अग्रिम जमानत देते समय जारी किया गया था। उस आदेश के तहत वरदराजन को अपना पासपोर्ट सरेंडर करना था और ट्रायल कोर्ट की अनुमति के बिना विदेश यात्रा करने पर रोक लगाई गई थी।
केंद्र की तरफ से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ मिली जानकारी “परेशान करने वाली” है। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों को “सुविधाजनक ढंग से छिपाया”। ASG ने कोर्ट को यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश की एक ट्रायल कोर्ट में इस मामले में चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है और पूर्व में याचिकाकर्ता को पुलिस समन भी जारी किए गए थे।
वरदराजन की वरिष्ठ वकील ने हाईकोर्ट से माफी मांगते हुए कहा कि पिछली सुनवाई के दौरान 2020 के उस आदेश का जिक्र करना उनके दिमाग से “निकल गया” था।
जस्टिस कौरव ने इस बात पर जोर दिया कि यह एक बुनियादी सिद्धांत है कि किसी भी याचिकाकर्ता को “पूर्ण प्रकटीकरण” के साथ अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए। हाईकोर्ट ने नोट किया कि याचिका की दलीलों और प्रस्तुतियों में कहीं भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के बाइंडिंग निर्देशों का उल्लेख नहीं किया गया था।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“पूरी निष्पक्षता के साथ याचिकाकर्ता को उक्त पहलू का सच के साथ खुलासा करना चाहिए था। कोर्ट की प्रथम दृष्टया राय है कि याचिकाकर्ता भौतिक तथ्यों को छिपाने का दोषी है।”
जस्टिस कौरव ने आगे कहा कि सामान्य नियम के तौर पर, जो वादी अदालत को धोखा देता है, वह राहत पाने का हकदार नहीं रह जाता। उन्होंने कहा कि अदालत को धोखा देकर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जरूरत है। अदालत ने इसे “अत्यंत अप्रिय स्थिति” बताते हुए चेतावनी दी कि इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 12 मई और 13 मई को पारित अपने सभी आदेशों को वापस ले लिया है। रिट याचिका को अब उसकी मूल स्थिति में बहाल कर दिया गया है। कोर्ट ने वरदराजन को अपने आचरण पर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है और मामले की अगली सुनवाई 25 मई के लिए तय की है। उस दिन कोर्ट यह तय करेगा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए या नहीं।

