कपूर फैमिली ट्रस्ट विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता प्रक्रिया को सुरक्षित रखने के लिए बोर्ड की कार्यवाही पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने दिवंगत उद्योगपति संजय कपूर की संपत्ति को लेकर चल रहे पारिवारिक कानूनी विवाद में हस्तक्षेप किया है। कोर्ट ने परिवार के सदस्यों को निर्देश दिया है कि वे ऐसी किसी भी कॉर्पोरेट गतिविधि से बचें, जिससे अदालत द्वारा नियुक्त मध्यस्थता की प्रक्रिया प्रभावित हो सके।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने संजय कपूर की 80 वर्षीय मां, रानी कपूर द्वारा दायर एक आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि मध्यस्थता के माध्यम से इस विवाद का कोई सौहार्दपूर्ण समाधान नहीं निकला, तो यह एक “लंबी कानूनी लड़ाई” का रूप ले लेगा।

यह कानूनी संघर्ष रानी कपूर और उनकी बहू प्रिया कपूर के बीच है। विवाद का मुख्य केंद्र ‘आरके फैमिली ट्रस्ट’ और उससे जुड़ी कंपनियों का नियंत्रण है। पिछले साल जून में इंग्लैंड में एक पोलो मैच के दौरान दिल का दौरा पड़ने से संजय कपूर का आकस्मिक निधन हो गया था। इसके बाद उनकी मां ने कोर्ट का रुख कर इस फैमिली ट्रस्ट को “अमान्य” घोषित करने की मांग की थी।

संपत्ति से जुड़े मुख्य मामले फिलहाल दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस समय मध्यस्थता के दौरान ट्रस्ट के कामकाज में किसी भी तरह के हस्तक्षेप को रोकने संबंधी आवेदन पर सुनवाई कर रहा है।

गुरुवार की सुनवाई का मुख्य कारण रघुवंशी इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक मंडल की 18 मई को होने वाली बैठक थी। रानी कपूर के वकील ने चिंता जताई कि यह कंपनी मुख्य होल्डिंग कंपनी में बड़ी हिस्सेदारी रखती है और बैठक के एजेंडे से सत्ता संतुलन बदल सकता है।

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पीठ ने विशेष रूप से एजेंडे के दो बिंदुओं पर ध्यान दिया:

  1. दो स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति।
  2. कंपनी के बैंक खातों के संचालन के लिए अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं में बदलाव।

प्रिया कपूर और निवेश कंपनी की ओर से तर्क दिया गया कि ये नियुक्तियां आरबीआई (RBI) के निर्देशों और वैधानिक अनुपालन के लिए आवश्यक थीं, लेकिन कोर्ट ने सावधानी बरतने का फैसला किया।

सुप्रीम कोर्ट ने 7 मई को पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ को इस विवाद में मध्यस्थ नियुक्त किया था। इस प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने पर जोर देते हुए पीठ ने कहा:

“हम इस समय और कुछ नहीं कहना चाहते। हमने पहले ही मध्यस्थ से मध्यस्थता की कार्यवाही शुरू करने का अनुरोध किया है। फिलहाल, हम विपक्षी पक्ष से अनुरोध करते हैं कि वे ऐसा कुछ भी न करें जिससे मध्यस्थता की कार्यवाही सीधे तौर पर प्रभावित हो।”

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नतीजतन, कोर्ट ने निर्देश दिया कि 18 मई की बैठक में स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति और बैंक हस्ताक्षरकर्ताओं में बदलाव पर चर्चा नहीं की जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस अंतरिम अवधि के दौरान आरबीआई या अन्य वैधानिक अधिकारियों को इन निर्देशों के पालन के लिए दबाव नहीं बनाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट पूर्व सीजेआई की अध्यक्षता में होने वाली मध्यस्थता सत्रों की प्रगति पर नजर रखेगा। इस मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त, 2026 को होगी, जिसमें कोर्ट समाधान की संभावनाओं की समीक्षा करेगा।

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