इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के सामने एक बड़ा कानूनी और नैतिक सवाल खड़ा कर दिया है। कोर्ट ने पूछा है कि क्या वे वकील, जिन्हें सरकार अपनी पैरवी के लिए मानदेय (retainership) देती है, निजी नागरिकों की ओर से सरकार या उसके अधिकारियों के खिलाफ ही मुकदमा दायर कर सकते हैं?
जस्टिस सौरभ लवानिया की पीठ ने एक अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने अब राज्य के ‘लीगल रिमेम्ब्रेन्सर’ (Legal Remembrancer) से इस पर विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट (AGA) या स्टैंडिंग काउंसिल जैसे पदों पर तैनात वकील, सरकारी हितों के विपरीत मामले अदालत में ला सकते हैं।
यह पूरा मामला अशोक कुमार सिंह और 28 अन्य लोगों द्वारा दायर की गई एक याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि सरकारी अधिकारियों ने साल 2025 में पारित एक अदालती आदेश की ‘जानबूझकर अवज्ञा’ की है।
सुनवाई के दौरान अदालत की नजर इस बात पर गई कि याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील सुधीर कुमार मिश्रा, वर्तमान में सरकार के एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट (AGA) के रूप में भी कार्यरत हैं। एक तरफ राज्य के वकील के तौर पर काम करना और दूसरी तरफ उसी राज्य के खिलाफ निजी पक्ष का केस लड़ना—इस दोहरी भूमिका ने कोर्ट को नियमों की समीक्षा करने पर मजबूर कर दिया।
अदालत इस बात की पड़ताल कर रही है कि सरकारी वकीलों की नियुक्ति की शर्तें उन्हें निजी प्रैक्टिस के दौरान सरकार के खिलाफ खड़े होने की अनुमति देती हैं या नहीं। हाईकोर्ट का मानना है कि यह सीधे तौर पर ‘हितों के टकराव’ का मामला हो सकता है।
इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए, अदालत ने राज्य के शीर्ष कानूनी सलाहकार अधिकारी (लीगल रिमेम्ब्रेन्सर) को यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि सरकारी वकीलों के लिए इस संबंध में क्या दिशा-निर्देश हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार को अब इस मामले में अपना औपचारिक जवाब दाखिल करना होगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रकरण की अगली सुनवाई 18 मई को तय की है। इस फैसले का असर भविष्य में सरकारी वकीलों की निजी प्रैक्टिस और उनके पेशेवर आचरण के नियमों पर पड़ सकता है।

