हजारीबाग में अवैध खनन पर झारखंड हाईकोर्ट सख्त; ‘पॉल्यूटर पेज़’ सिद्धांत के तहत मुआवजा वसूलने और कड़े प्रवर्तन के निर्देश

झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग जिले में व्यापक अवैध पत्थर खनन और अनधिकृत क्रशर इकाइयों के खिलाफ एक दशक पुरानी जनहित याचिका (PIL) का निपटारा करते हुए दिशा-निर्देशों का एक विस्तृत सेट जारी किया है। चीफ जस्टिस एम. एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 के तहत प्रदूषण मुक्त वातावरण का अधिकार ‘जीवन के अधिकार’ का एक अभिन्न अंग है। हाईकोर्ट ने प्रशासनिक विफलता पर कटाक्ष करते हुए कहा कि “इस क्षेत्र की आत्मा एक गहरे और दर्दनाक बदलाव से गुजरी है।”

मामले की पृष्ठभूमि

हेमंत कुमार शिखरवार द्वारा 2013 में दायर इस याचिका में हजारीबाग, जिसे “हजार बागों के शहर” के रूप में जाना जाता था, के पारिस्थितिक संकट को उठाया गया था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि इचाक क्षेत्र और सिवानी नदी के आसपास स्थानीय भू-माफियाओं और प्रशासन की मिलीभगत से अवैध खनन जारी है। बिना निगरानी के चल रहे इन कार्यों से उड़ने वाली धूल ने लगभग 100 हेक्टेयर कृषि भूमि को नुकसान पहुँचाया है और पानी से भरे परित्यक्त गड्ढे निवासियों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता ने सूचना के अधिकार (RTI) से प्राप्त जानकारी के आधार पर दलील दी कि क्रशर इकाइयां बिना वैध विस्फोटक लाइसेंस, खनिज डीलर पंजीकरण या वैधानिक पर्यावरणीय मंजूरी के चल रही थीं। यह भी कहा गया कि बार-बार शिकायतों के बावजूद अधिकारियों ने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की।

दूसरी ओर, प्रतिवादी अधिकारियों ने पिछले एक दशक में कई हलफनामे दायर कर स्थिति को स्वीकार किया और बताया कि FIR दर्ज करने और कुछ मशीनों को ध्वस्त करने जैसे कदम उठाए गए हैं। जिला खनन अधिकारी ने यह भी तर्क दिया कि गांव टेप्सा ‘इको-सेंसिटिव ज़ोन’ के अंतर्गत नहीं आता है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि भले ही गांव टेप्सा आधिकारिक तौर पर ‘इको-सेंसिटिव ज़ोन’ के रूप में सूचीबद्ध न हो, लेकिन “संरक्षित लेबल” की अनुपस्थिति पारिस्थितिक विनाश की अनुमति नहीं देती है। बेंच ने जिला स्तरीय टास्क फोर्स (DLTF) की “प्रशासनिक निष्क्रियता” पर सवाल उठाते हुए कहा कि बैठकों का रिकॉर्ड केवल न्यायिक हस्तक्षेप के बाद ही सामने आया।

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हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“जहाँ तकनीक देखने के लिए डिजिटल ‘आंखें’ प्रदान करती है, वहां कार्रवाई करने में निरंतर विफलता को केवल जानबूझकर उन आंखों को बंद करने या जो दिखाई दे रहा है उसे अनदेखा करने के रूप में ही देखा जा सकता है।”

अदालत ने केवल FIR दर्ज करने और उन्हें अंजाम तक न पहुंचाने की प्रथा की भी आलोचना की। स्टेट ऑफ एन.सी.टी. दिल्ली बनाम संजय और जयंत बनाम मध्य प्रदेश राज्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि IPC और MMDR अधिनियम के तहत मुकदमे साथ-साथ चल सकते हैं। हाईकोर्ट ने आगे कहा कि छोड़ी गई खदानें “मौत के जाल” बन गई हैं, जो सुरक्षा प्रोटोकॉल का उल्लंघन है।

प्रमुख निर्देश

मामले का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. अनिवार्य बैठकें: हजारीबाग DLTF की महीने में कम से कम एक बार बैठक होगी और उसके सात दिनों के भीतर कार्यवाही का विवरण आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करना होगा।
  2. अनुमतियों का सत्यापन: इचाक क्षेत्र की सभी इकाइयों के CTE, CTO और विस्फोटक लाइसेंस की समीक्षा की जाएगी। सत्यापन पूरा होने तक कोई भी खनन या क्रशर गतिविधि नहीं होगी।
  3. बफर ज़ोन का पालन: हजारीबाग वन्यजीव अभयारण्य के चारों ओर 1 किमी का बफर ज़ोन और वन भूमि के लिए निर्धारित दूरी (खनन के लिए 500 मीटर, क्रशर के लिए 400 मीटर) का सख्ती से पालन किया जाएगा।
  4. तकनीकी निगरानी: 12 हफ्तों के भीतर संवेदनशील मार्गों पर हाई-रिज़ॉल्यूशन CCTV और सभी भारी मशीनों पर GPS ट्रैकिंग अनिवार्य रूप से लागू की जाएगी।
  5. कानूनी कार्रवाई: जिला खनन अधिकारी अवैध खनन में शामिल लोगों के खिलाफ MMDR अधिनियम की धारा 22 के तहत शिकायत दर्ज करेंगे और अवैध खनिजों के बाजार मूल्य की वसूली शुरू करेंगे।
  6. पर्यावरणीय मुआवजा: झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 12 हफ्तों के भीतर ‘पॉल्यूटर पेज़’ सिद्धांत के आधार पर मुआवजे का आकलन और आरोपण करेगा।
  7. खदानों का पुनरुद्धार: बंद या अवैध खदानों को खान बंद निधि (mine closure funds) का उपयोग करके आठ हफ्तों के भीतर सुरक्षित और पुनर्जीवित किया जाएगा।
  8. जवाबदेही: उपायुक्त (DC), SP, DMO और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को चार महीने के भीतर व्यक्तिगत रूप से अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
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हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये निर्देश अधिकारियों को कानून के अनुसार अवैध संचालकों और उनके मददगारों के खिलाफ अतिरिक्त दंडात्मक कार्रवाई करने से नहीं रोकते हैं।

केस टाइटल: हेमंत कुमार शिखरवार बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य
केस नंबर: W.P. (PIL) No. 290 of 2013
बेंच: चीफ जस्टिस एम. एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर
दिनांक: 07 मई, 2026

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