झारखंड हाई कोर्ट ने गुमला जिले की एक मासूम बच्ची के छह साल से लापता होने के मामले में पुलिस की कार्यशैली पर गहरा असंतोष जताया है। अदालत ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए गुमला के वर्तमान पुलिस अधीक्षक (SP) और साल 2018 से अब तक वहां तैनात रहे पांच अन्य पूर्व SP को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि इन अधिकारियों के साथ-साथ 2018 से अब तक इस केस से जुड़े रहे सभी जांच अधिकारियों (IOs) को भी 9 जून को अदालत के समक्ष उपस्थित होकर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
यह मामला गुमला जिले के खोरा गांव का है, जहां 2018 में छह साल की एक बच्ची संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गई थी। आधे दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पुलिस के हाथ अब तक खाली हैं। इस विफलता को अदालत ने जांच प्रक्रिया की बड़ी नाकामी करार दिया है।
हैरानी की बात यह है कि बच्ची 2018 में लापता हुई थी, लेकिन मामले में प्राथमिकी (FIR) उसकी मां द्वारा साल 2020 में दर्ज कराई गई। स्थानीय पुलिस की ओर से कोई ठोस नतीजा न निकलता देख, पीड़ित मां ने पिछले साल 19 सितंबर को हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और रिट याचिका दायर कर न्याय की गुहार लगाई।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने स्वीकार किया कि तमाम कोशिशों के बाद भी बच्ची का कोई सुराग नहीं मिल सका है। हालांकि, जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया था, जिसने मुंबई, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और जम्मू जैसे राज्यों में छापेमारी की, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी।
केस डायरी का बारीकी से अध्ययन करने के बाद, हाई कोर्ट की बेंच ने वर्तमान SP से तीखे सवाल पूछे। अदालत ने टिप्पणी की कि 2018 से अब तक की गई जांच “संतोषजनक नहीं” है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि आखिर इतने सालों में जांच को सही दिशा क्यों नहीं दी गई?
9 जून को होने वाली इस सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं, क्योंकि एक साथ छह वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की पेशी राज्य में लापता व्यक्तियों की तलाश के लिए बने प्रोटोकॉल और पुलिस की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े करती है।

