इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के लॉ रिमेम्बरेंसर (LR) के प्रति कड़ी नाराजगी जाहिर की है। मामला सरकारी वकीलों के लिए प्रस्तावित ग्रुप इंश्योरेंस स्कीम (समूह बीमा योजना) से जुड़ा है, जिस पर राज्य सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस जवाब दाखिल नहीं किया गया है। कोर्ट ने इसे ‘अंतिम अवसर’ बताते हुए अधिकारी को एक सप्ताह का समय दिया है।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मनजीवे शुक्ला की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि 25 मई को होने वाली अगली सुनवाई तक जवाब दाखिल नहीं होता है, तो इसे न्यायिक आदेशों की अवहेलना माना जाएगा।
यह पूरा मामला हाई कोर्ट द्वारा खुद संज्ञान में ली गई एक जनहित याचिका (PIL) पर आधारित है, जिसका उद्देश्य राज्य के अधिवक्ताओं को बेहतर बीमा कवरेज और वित्तीय सहायता दिलाना है। सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि लॉ रिमेम्बरेंसर को 30 मई 2024 के उस पुराने आदेश की जानकारी तक नहीं थी, जिसमें सरकार को बीमा योजना पर विचार करने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट ने पूर्व में 12 मई तक जवाब दाखिल करने का समय दिया था, लेकिन मंगलवार को सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष की ओर से कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया। बेंच ने इस पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि बार-बार दिए गए निर्देशों के बावजूद अनुपालन न करना चिंताजनक है।
एक ओर जहां सरकारी वकीलों की योजना फाइलों में अटकी है, वहीं निजी प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ताओं के लिए बीमा का मुद्दा ‘डेडलॉक’ (गतिरोध) की स्थिति में है। कोर्ट को बताया गया कि निजी वकीलों के लिए प्रीमियम की राशि बहुत अधिक होने के कारण बीमा कंपनियां और बार एसोसिएशन किसी सहमति पर नहीं पहुंच पा रहे हैं।
अवध बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एस. चंद्रा ने अदालत को जानकारी दी कि:
- एसोसिएशन के सदस्यों की संख्या लगभग 14,000 है।
- बीमा कंपनी ने प्रति वकील 4,999 रुपये सालाना प्रीमियम का प्रस्ताव दिया है।
- कुल प्रीमियम का बोझ करीब 7 करोड़ रुपये बैठता है, जिसे वहन करना एसोसिएशन के लिए फिलहाल संभव नहीं है।
बीमा के उच्च प्रीमियम को देखते हुए अवध बार एसोसिएशन अब अपने मौजूदा ‘क्राइसिस सपोर्ट स्कीम’ (संकट सहायता योजना) के दायरे को बढ़ाने पर विचार कर रही है। एस. चंद्रा ने बताया कि इस संबंध में वरिष्ठ अधिवक्ताओं के साथ विचार-विमर्श चल रहा है और जल्द ही वित्तीय सहायता बढ़ाने का नया प्रस्ताव अदालत के समक्ष रखा जाएगा।
अब सभी की नजरें 25 मई की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वह अपने कानूनी सलाहकारों को सुरक्षा कवच देने के लिए कितनी गंभीर है।

