‘मेरे सारे सपने टूट गए थे…’: जब एक जज की फटकार ने बदल दी CJI सूर्यकांत की किस्मत, सुप्रीम कोर्ट में सुनाया दिलचस्प किस्सा

देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में अक्सर कानूनी दलीलों और गंभीर बहस का माहौल रहता है। लेकिन हाल ही में यहाँ एक ऐसा वाक्या हुआ, जिसने न केवल कोर्ट में मौजूद लोगों का दिल जीत लिया, बल्कि एक हताश छात्रा को नई उम्मीद भी दी। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने अपने जीवन का एक ऐसा निजी किस्सा साझा किया, जब उन्हें एक सीनियर जज ने अपने चैंबर से बाहर निकाल दिया था।

यह वाकया तब हुआ जब CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ प्रेरणा गुप्ता नाम की एक छात्रा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। प्रेरणा ने न्यायिक सेवा परीक्षा के एक पेपर के पुनर्मूल्यांकन (revaluation) की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी, लेकिन प्रेरणा वहां से दुखी होने के बजाय मुस्कुराते हुए बाहर निकलीं।

जब प्रेरणा गुप्ता अपनी दलीलें दे रही थीं, तब CJI सूर्यकांत ने उन्हें बीच में टोकते हुए कहा, “मैं आपके साथ अपनी एक निजी कहानी साझा करना चाहता हूँ। मुझे उम्मीद है कि इसे सुनकर आप खुशी-खुशी यहाँ से जाएंगी, क्योंकि हम आपकी याचिका स्वीकार नहीं कर सकते।”

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CJI ने फ्लैशबैक में जाते हुए बताया कि जब वह पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में कानून के अंतिम वर्ष के छात्र थे, तब उन्होंने भी न्यायिक सेवा (Judicial Services) की लिखित परीक्षा पास की थी और इंटरव्यू का इंतजार कर रहे थे। उसी दौरान चयन प्रक्रिया में बदलाव हुआ और हाईकोर्ट के जजों को विषय विशेषज्ञ (Subject Expert) के रूप में पैनल में शामिल किया गया।

संयोग से, इंटरव्यू पैनल के सबसे वरिष्ठ जज वही थे जिनके सामने युवा सूर्यकांत ने हाल ही में दो बड़े मामलों में बहस की थी। इनमें से एक प्रसिद्ध मामला ‘सुनीता रानी बनाम बलदेव राज‘ का था, जिसमें जज ने सिजोफ्रेनिया (schizophrenia) के आधार पर दिए गए तलाक के आदेश को रद्द करते हुए सूर्यकांत की अपील स्वीकार की थी।

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CJI ने याद करते हुए बताया, “एक दिन उस वरिष्ठ जज ने मुझे अपने चैंबर में बुलाया और पूछा- ‘क्या तुम न्यायिक अधिकारी बनना चाहते हो?’ मैंने जैसे ही हाँ कहा, उन्होंने तुरंत चिल्लाकर कहा- ‘मेरे चैंबर से बाहर निकल जाओ (Get out from the chamber)।'”

चीफ जस्टिस ने बताया कि उस पल वह बुरी तरह कांपने लगे थे। उन्हें लगा कि उनका करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया है और उनके सारे सपने चकनाचूर हो गए हैं।

कहानी का सबसे अहम मोड़ अगले दिन आया, जब उसी जज ने उन्हें दोबारा बुलाया। इस बार वह गुस्से में नहीं थे, बल्कि उन्होंने एक दूरदर्शी सलाह दी।

जज ने कहा, “अगर तुम जज बनना चाहते हो, तो तुम्हारा स्वागत है। लेकिन मेरी सलाह यह है कि न्यायिक अधिकारी मत बनो। ‘बार’ (वकालत) तुम्हारा इंतजार कर रही है।”

इस सलाह को मानकर सूर्यकांत ने इंटरव्यू में न जाने का फैसला किया। उन्होंने शुरू में अपने माता-पिता को भी नहीं बताया ताकि वे निराश न हों और पूरी मेहनत से वकालत शुरू कर दी। आज उसी रास्ते पर चलते हुए वह देश के सर्वोच्च पद पर आसीन हैं।

CJI ने याचिकाकर्ता प्रेरणा से मुस्कुराते हुए पूछा, “अब आप ही बताइए, मेरा फैसला सही था या गलत?” उन्होंने प्रेरणा को सलाह दी कि एक पेपर के पीछे परेशान होने के बजाय भविष्य की ओर देखें। उन्होंने कहा, “अगली बार उच्च न्यायिक सेवाओं (Superior Judicial Services) के लिए प्रयास करें। वकालत के क्षेत्र में आपके लिए बहुत कुछ है।”

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अदालत से राहत न मिलने के बावजूद, चीफ जस्टिस की इन बातों ने प्रेरणा के मन में एक नई ऊर्जा भर दी। यह उन सभी युवाओं के लिए एक संदेश है जो असफलता से टूट जाते हैं।

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