नोएडा में पिछले महीने औद्योगिक श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी छात्रा आकृति चौधरी को फिलहाल राहत देने से मना कर दिया है। शुक्रवार को हुई सुनवाई में शीर्ष अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए याचिकाकर्ता को इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटकाने का निर्देश दिया।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने सुनवाई के दौरान सीधे सुप्रीम कोर्ट आने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई। बेंच ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा, “आप हाईकोर्ट क्यों नहीं जाते? हर कोई अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर कर सीधे यहीं चला आता है।” कोर्ट ने न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ का जिक्र करते हुए बताया कि वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में 93,000 मामले लंबित हैं।
यह मामला 13 अप्रैल का है, जब नोएडा में वेतन वृद्धि की मांग को लेकर फैक्ट्री मजदूरों का प्रदर्शन हिंसक हो गया था। दिल्ली यूनिवर्सिटी के दौलत राम कॉलेज से इतिहास में एमए कर चुकी आकृति चौधरी पर इस हिंसा को भड़काने का आरोप है।
आकृति के वकील ने अदालत में दलील दी कि गिरफ्तारी के समय पुलिस ने उनकी मुवक्किल को गिरफ्तारी के ठोस आधार नहीं बताए थे। हालांकि, कोर्ट ने प्रक्रियात्मक पदानुक्रम (Procedural Hierarchy) को प्राथमिकता देते हुए उन्हें राहत के लिए पहले हाईकोर्ट जाने को कहा।
13 अप्रैल को नोएडा के विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के श्रमिक अपनी लंबित मांगों को लेकर जमा हुए थे। अधिकारियों के अनुसार, यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन तब हिंसक हो उठा जब कुछ प्रदर्शनकारियों ने संपत्ति में तोड़फोड़ की, पथराव किया और एक वाहन को आग के हवाले कर दिया।
नोएडा की एक स्थानीय अदालत ने पहले ही आकृति चौधरी सहित दो अन्य महिलाओं—सृष्टि गुप्ता (दिल्ली) और मनीषा चौहान (नोएडा)—को पुलिस रिमांड पर भेज दिया था। पुलिस का तर्क है कि आरोपियों के आवास से इस हिंसा से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य बरामद होने की पूरी संभावना है।
भले ही सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिका पर विचार नहीं किया, लेकिन अदालत ने इसी मामले से जुड़ी एक अन्य याचिका पर कड़ा रुख अपनाया है। केशव आनंद नामक व्यक्ति द्वारा उत्तर प्रदेश पुलिस पर लगाए गए प्रताड़ना के आरोपों पर शीर्ष अदालत ने संबंधित पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
अब आकृति चौधरी की कानूनी टीम को अपनी जमानत याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल करनी होगी। स्थानीय अदालत ने पहले ही जांच के दौरान आरोपियों के वकीलों की उपस्थिति की अनुमति दी है ताकि प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे।

