प्राइवेट प्रैक्टिस में जुटे डॉक्टरों पर कड़ा रुख: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिए उच्च स्तरीय जांच के आदेश, ‘समानांतर मेडिकल इंडस्ट्री’ चलाने पर लगाई फटकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मोतीलाल नेहरू (MLN) मेडिकल कॉलेज के उन सभी डॉक्टरों के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच का निर्देश दिया है जो सरकारी सेवा में होने के बावजूद प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे हैं।

सोमवार को एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की पीठ ने टिप्पणी की कि स्वरूप रानी नेहरू (SRN) अस्पताल की बदहाली का कारण फंड या सुविधाओं की कमी नहीं, बल्कि डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने शहर में फल-फूल रही “समानांतर मेडिकल इंडस्ट्री” पर गहरी चिंता व्यक्त की। हाईकोर्ट ने पाया कि मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और लेक्चरर निजी नर्सिंग होम में सेवाएं दे रहे हैं। आरोप है कि ये सरकारी डॉक्टर न केवल निजी अस्पतालों में सर्जरी कर रहे हैं, बल्कि स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल में आने वाले मरीजों को भी अपने निजी फायदे के लिए प्राइवेट सेटअप में ट्रांसफर कर रहे हैं।

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कोर्ट ने कहा, “ऐसा प्रतीत होता है कि मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और इससे जुड़े अस्पताल की स्थिति इसलिए नहीं बिगड़ी कि सरकार की ओर से फंड या सुविधाओं की कमी है, बल्कि इसलिए क्योंकि चिकित्सा बिरादरी ही सरकार के उद्देश्यों को विफल कर रही है।”

अदालत के सामने 29 अप्रैल को दर्ज हुई एक FIR का मामला भी आया, जो सर्जरी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संतोष कुमार सिंह और उनकी पत्नी इलाक्षी शुक्ला के खिलाफ है। आरोप है कि डॉ. सिंह ‘एक्यूरा अस्पताल’ में सर्जरी करते हैं, जिसकी डायरेक्टर उनकी पत्नी हैं।

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कोर्ट ने याद दिलाया कि इस PIL की शुरुआत भी डॉ. अरविंद गुप्ता नामक प्रोफेसर पर लगे इन्हीं आरोपों के कारण हुई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी डॉक्टरों के लिए प्राइवेट प्रैक्टिस पूरी तरह प्रतिबंधित है और इसका उल्लंघन एक गंभीर विषय है।

अस्पताल के बुनियादी ढांचे पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने यूपी राजकीय निर्माण निगम को भी फटकार लगाई। स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल के कार्डियोलॉजी विभाग में दो मंजिलों का निर्माण कार्य 2006 से लटका हुआ है। कोर्ट ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे पिछले 20 वर्षों से चल रहे उन सभी निर्माण कार्यों की निगरानी करें जो फंड जारी होने के बावजूद अब तक अधूरे हैं।

मेडिकल कॉलेज के विस्तार के लिए 31,314 वर्ग मीटर जमीन के हस्तांतरण पर राज्य सरकार के वकील ने बताया कि सभी संबंधित विभागों से ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र’ मिल चुका है और जल्द ही इसे कैबिनेट की मंजूरी के लिए रखा जाएगा।

हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निम्नलिखित आदेश दिए हैं:

  1. दोषी डॉक्टरों के खिलाफ एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की जाए।
  2. प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों पर उचित कानूनी और अनुशासनात्मक कार्रवाई हो।
  3. अगली सुनवाई तक जांच की प्रगति और अधूरे निर्माण कार्यों पर की गई कार्रवाई की जानकारी कोर्ट को दी जाए।
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इस मामले की अगली सुनवाई अब 26 मई, 2024 को होगी।

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