व्यभिचार के स्पष्ट सबूत पेश किए जाएं तो अंतरिम स्तर पर ही रोका जा सकता है भरण-पोषण: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 125(4) के तहत व्यभिचार (अडल्ट्री) का आरोप लगाने वाली याचिका के आधार पर पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण पाने से रोका जा सकता है, यदि पति प्रथम दृष्टया (ex-facie) आरोप साबित करने वाले स्पष्ट और ठोस सबूत पेश करता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसने व्यभिचार के आरोपों पर विचार करने के मामले को मुख्य मुकदमे के अंतिम चरण तक टालने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था।

मामले की पृष्ठभूमि

दोनों पक्षों का विवाह जुलाई 2014 में हुआ था। वैवाहिक मतभेदों के बाद, पत्नी मई 2020 में अपने नाबालिग बेटे के साथ ससुराल छोड़ कर चली गई। नवंबर 2020 में, उसने उदयपुर के विशेष अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (पीसीपीएनडीटी केस) के समक्ष सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण और अंतरिम भरण-पोषण की मांग करते हुए याचिका दाखिल की।

इसके जवाब में, पति ने सीआरपीसी की धारा 125(4) के तहत आवेदन दायर कर दावा किया कि पत्नी व्यभिचारपूर्ण जीवन जी रही है और इसलिए वह कानूनी रूप से भरण-पोषण पाने की हकदार नहीं है। अपने दावों के समर्थन में उसने तस्वीरें और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पेश किए।

27 जून 2024 को, ट्रायल कोर्ट ने पति के आवेदन को खारिज करते हुए टिप्पणी की कि इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों की प्रामाणिकता और सत्यता केवल मुख्य मुकदमे के दौरान साक्ष्य प्रदर्शित (exhibit) किए जाने के बाद ही तय की जा सकती है। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने पत्नी और नाबालिग बेटे को अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया।

पति ने इन आदेशों को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन हाईकोर्ट ने 4 फरवरी 2025 को उसकी याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने माना कि सीआरपीसी में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो अंतरिम भरण-पोषण तय करने से पहले बेवफाई के मुद्दे को प्रारंभिक बिंदु के रूप में तय करने के लिए बाध्य करता हो।

READ ALSO  राज्यसभा ने आधार और मतदाता पहचान पत्र को जोड़ने के लिए चुनाव कानून (संशोधन) विधेयक, 2021 पारित किया

पक्षों की दलीलें

पति ने अदालतों के समक्ष तर्क दिया कि व्यभिचार के उसके आरोपों पर प्रारंभिक मुद्दे के रूप में फैसला किया जाना चाहिए, क्योंकि धारा 125(4) के तहत व्यभिचार का निष्कर्ष सीधे तौर पर पत्नी को अंतरिम और अंतिम दोनों प्रकार के भरण-पोषण से वंचित करता है।

पत्नी ने तर्क दिया कि व्यभिचार के आरोप तथ्यों से जुड़े विवादित प्रश्न हैं, जिनके लिए मुख्य मुकदमे के दौरान औपचारिक रूप से साक्ष्य पेश करने और उनके मूल्यांकन की आवश्यकता है। इसलिए शुरुआती स्तर पर ही अंतरिम भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता।

अदालत का विश्लेषण

सीआरपीसी की धारा 125 की संरचना का विश्लेषण करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि इस धारा के तहत कार्यवाही संक्षिप्त (summary) प्रकृति की होती है, इसमें नागरिक मानक के अनुसार सबूतों की आवश्यकता होती है और इसका उद्देश्य बेसहारा स्थिति और आवारागर्दी को रोकना है। धारा 125(4) का परीक्षण करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी व्यभिचार में रह रही है तो यह प्रावधान उसे भरण-पोषण या अंतरिम भरण-पोषण प्राप्त करने से स्पष्ट रूप से रोकता है।

प्रक्रियात्मक ढांचे को समझाते हुए पीठ ने कहा:

“स्पष्ट रूप से कहें तो यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि भरण-पोषण की याचिका कार्यवाही का पहला चरण है, जिसमें दूसरे प्रावधान के तहत अदालत, परिस्थितियों को देखते हुए, अंतरिम भरण-पोषण की अनुमति दे सकती है। धारा 125(4) के तहत दिया गया आवेदन दूसरा चरण है, और दूसरे चरण का फैसला ही यह तय करेगा कि मामला अंतिम चरण यानी धारा 125(1) के तहत भरण-पोषण के आदेश तक पहुंचता है या नहीं।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि धारा 125(4) के तहत आवेदन लंबित रहने मात्र से अंतरिम भरण-पोषण अपने आप नहीं रुक जाता, लेकिन यदि प्रथम दृष्टया (ex-facie) सबूत पेश किए जाते हैं तो अदालत इस आवेदन को अंतिम फैसले तक के लिए नहीं टाल सकती। अंतरिम स्तर पर ही भरण-पोषण से इनकार करने के मानक को रेखांकित करते हुए अदालत ने कहा:

“दोहराते हुए, यदि भरण-पोषण की याचिका को अंतरिम स्तर पर ही खारिज किया जाना है, तो धारा 125(4) के तहत आवेदन दाखिल करने वाले पक्ष को ऐसे स्पष्ट और ठोस सबूत पेश करने होंगे जो प्रथम दृष्टया (ex-facie) भरण-पोषण का दावा करने वाले पक्ष का व्यभिचार (अडल्ट्री) साबित करते हों।”

अदालत ने पाया कि निचली अदालतों ने यह मानकर भूल की कि ऐसे सवाल का फैसला केवल अंतिम निर्णय के स्तर पर ही किया जा सकता है, क्योंकि ऐसा दृष्टिकोण धारा 125(4) की वैधानिक रोक को निष्प्रभावी बना देगा।

READ ALSO  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूँछा- माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के कार्यान्वयन के लिए क्या कदमों उठाए जा रहे है

अनियंत्रित निजी जासूसों पर टिप्पणी

यह देखते हुए कि पति ने निजी जासूसों के माध्यम से कथित रूप से प्राप्त 237 तस्वीरों और 92 वीडियो पर भरोसा किया, सुप्रीम कोर्ट ने भारत में निजी जांच एजेंसियों के संबंध में किसी नियामक ढांचे के न होने पर चिंता व्यक्त की। निजता के अधिकार, डेटा सुरक्षा और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों में हेरफेर या छेड़छाड़ की संभावना पर ध्यान दिलाते हुए अदालत ने जोर दिया कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को स्वीकार्यता के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65बी (या भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 के संबंधित प्रावधानों) की शर्तों को सख्ती से पूरा करना होगा।

नवीनचंद्र एन. मजीठिया बनाम मेघालय राज्य के फैसले को दोहराते हुए अदालत ने कहा कि यद्यपि वैधानिक जांच के लिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत निजी जांच को मान्यता नहीं दी गई है, फिर भी बचाव पक्ष अक्सर ऐसी सामग्री पेश करते हैं। आर.एम. मलकानी बनाम महाराष्ट्र राज्य, डॉ. नरेश कुमार गर्ग बनाम हरियाणा राज्य, और अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंट्याल के सिद्धांतों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सत्यापन और स्वीकार्यता जांच की आवश्यकता पर बल दिया।

READ ALSO  जजों को आपराधिक और दिवानी कार्यवाही से दी गई पूर्ण छूट को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती- जानिए विस्तार से

यह रेखांकित करते हुए कि निजी जासूसी एजेंसी (विनियमन) विधेयक, 2007 अभी भी लंबित है, सुप्रीम कोर्ट ने निजी जासूसों के संबंध में वैधानिक नियमों, जांच और शिकायत निवारण तंत्र की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया।

अदालत का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 4 फरवरी 2025 के हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। इस मामले को ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया गया (रिमांड किया गया) ताकि वह स्थापित सिद्धांतों के अनुसार पति के धारा 125(4) के आवेदन पर उसके गुणों-दोषों के आधार पर निर्णय करे।

इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि निर्णय की एक प्रति भारत सरकार के कानून एवं न्याय मंत्रालय के सचिव और भारत के विधि आयोग के अध्यक्ष को भेजी जाए, ताकि निजी जांच एजेंसियों को विनियमित करने के लिए उचित कार्रवाई पर विचार किया जा सके।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: हिमांशु चोरड़िया बनाम राजस्थान राज्य व अन्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या […] / 2026 (विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 3171 / 2025 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
निर्णय की तिथि: 31 जुलाई 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles