चार दशक पुराने शराब लाइसेंस विवाद में 91 वर्षीय बुजुर्ग को राहत, बॉम्बे हाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर लगाया 2.5 लाख रुपये का जुर्माना

बॉम्बे हाईकोर्ट ने शराब के खुदरा लाइसेंस से जुड़े करीब चालीस साल पुराने विवाद में 91 वर्षीय बुजुर्ग को राहत देते हुए महाराष्ट्र सरकार पर 2.5 लाख रुपये का जुर्माना (कॉस्ट) लगाया है। अदालत ने राज्य प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि बुजुर्ग याचिकाकर्ता को अपने स्पष्ट अधिकारों के लिए लगभग 25 वर्षों तक लगातार अदालतों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर किया गया।

जस्टिस सोमशेखर सुंदरेशन की एकल पीठ ने 10 सितंबर को यह फैसला सुनाया। पीठ ने स्पष्ट किया कि यह राशि कोई मुआवजा नहीं है, बल्कि सरकार के गैर-जिम्मेदाराना रवैये की न्यायिक स्वीकृति है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता सूर्यकांत खलदकर को अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए तीन बार हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। हर बार उन्हें कलेक्टर, आबकारी आयुक्त और आबकारी मंत्री के स्तर पर लंबी कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा। इसके बावजूद प्रशासन ने उन्हें नई लाइसेंस नीति की आड़ में उलझाए रखा।

अक्टूबर 2023 का मंत्रिस्तरीय आदेश रद्द

हाईकोर्ट ने राज्य के आबकारी मंत्री द्वारा 26 अक्टूबर 2023 को जारी उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की, जिसमें मूल लाइसेंसधारक के कानूनी वारिसों के पक्ष में कलेक्टर के पुराने आदेश को बहाल कर दिया गया था। इससे पहले वर्ष 2022 में राज्य आबकारी आयुक्त ने संतुलित फैसला लेते हुए जीवित साझेदार खलदकर को 90 फीसदी और मूल धारक के वारिसों को 10 फीसदी अधिकार देने का निर्देश दिया था। मंत्री ने आयुक्त के इसी आदेश को पलट दिया था, जिसे अब हाईकोर्ट ने पूरी तरह अनुचित माना है।

साझेदार की मौत के बाद 1985 से शुरू हुआ विवाद

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मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, वर्ष 1973 में राज्य आबकारी विभाग ने बालकृष्ण वाडकर को एफएल-II वेंडर लाइसेंस जारी किया था। वर्ष 1979 में वाडकर ने सूर्यकांत खलदकर और उनके पिता के साथ साझेदारी कर ली। इस साझेदारी में खलदकर परिवार की 90 फीसदी और वाडकर की 10 फीसदी हिस्सेदारी तय हुई।

वर्ष 1985 में बालकृष्ण वाडकर की मृत्यु हो गई। इसके बाद वाडकर की विधवा शोभा और खलदकर के बीच मालिकाना हक को लेकर कानूनी जंग छिड़ गई। वर्ष 2002 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वाडकर के निधन के साथ ही मूल साझेदारी और लाइसेंस दोनों कानूनी तौर पर समाप्त हो चुके हैं। अदालत ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया कि वे फॉरेन लिकर रूल्स के नियम 25 के तहत नए सिरे से अलग-अलग आवेदन दाखिल करें। राज्य सरकार समेत सभी पक्षों ने इस फैसले को बिना किसी चुनौती के स्वीकार कर लिया था।

प्रशासनिक स्तर पर फैसलों में उलटफेर

वर्ष 2002 के स्पष्ट न्यायिक निर्देशों के बावजूद अधिकारियों ने उसका पालन नहीं किया, जिस पर हाईकोर्ट ने 2016 में भी अप्रसन्नता जताई थी। बाद में दोनों पक्षों ने कलेक्टर के समक्ष नए आवेदन दिए। इसके बावजूद कलेक्टर ने वर्ष 2017 में पूरा लाइसेंस अकेले शोभा वाडकर के नाम स्थानांतरित कर दिया।

आबकारी आयुक्त ने वर्ष 2022 में कलेक्टर के इस फैसले को बदलते हुए साझेदारी के मूल अनुपात के आधार पर खलदकर को 90 फीसदी और वाडकर के वारिसों को 10 फीसदी अधिकार सौंपे। हालांकि, शोभा ने इस फैसले को आबकारी मंत्री के समक्ष चुनौती दी, जिन्होंने 26 अक्टूबर 2023 को आयुक्त का आदेश रद्द कर कलेक्टर के फैसले को फिर से बहाल कर दिया। इसके बाद खलदकर ने हाईकोर्ट की शरण ली।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

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याचिकाकर्ता खलदकर की ओर से पेश अधिवक्ता विनायक सालोखे और मेघा जानी ने दलील दी कि नियम 25 के तहत 1979 की साझेदारी वैध थी और मूल लाइसेंस फर्म के साथ ही समाप्त हो चुका था। इसलिए किसी एक पक्ष को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।

वहीं, शोभा के वारिसों की ओर से अधिवक्ता एस. पी. तेलगोटे ने तर्क दिया कि लाइसेंस का पुनः आवंटन कोई नया हस्तांतरण नहीं बल्कि उसका नवीनीकरण या पुनर्मंजूरी है। उन्होंने दावा किया कि नई सरकारी नीतियों और पूर्व के फैसलों के तहत मूल लाइसेंसधारक के कानूनी वारिसों का दावा किसी अन्य साझेदार की तुलना में ज्यादा मजबूत होता है।

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पुरानी शराब नई बोतल में पेश करने जैसा कदम: हाईकोर्ट

जस्टिस सुंदरेशन ने सरकार के रुख को खारिज करते हुए कहा कि प्रशासन के पास समाप्त हो चुके लाइसेंस को केवल शोभा को देने का कोई कानूनी आधार नहीं था। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार को केवल नियम 25 के तहत दोनों आवेदनों पर विचार करने का अधिकार था। अगर राज्य की नीति नए लाइसेंस जारी करने की अनुमति नहीं देती थी, तो प्रशासन दोनों आवेदनों को खारिज कर सकता था। लेकिन वाडकर के वारिसों के लिए विशेष अपवाद बनाना वर्ष 2002 और 2016 के अदालती आदेशों का सीधा उल्लंघन है।

पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि नियम 25 की अनदेखी कर इसे केवल ‘पुनर्मंजूरी’ या ‘पुनर्निर्गम’ का नाम देना पुरानी शराब को नई बोतल में पेश करने जैसा है और यह पूरी तरह अस्वीकार्य है। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार अपनी पिछली गलतियों को सुधार सकती है। इसके लिए नीतिगत पाबंदियों में लचीलापन लाते हुए दोनों पक्षों को मूल 90:10 के अनुपात में संयुक्त लाइसेंस जारी करने पर विचार किया जा सकता है।

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