एससी/एसटी वर्ग के व्यक्ति का हर अपमान या धमकी कानून के तहत अपराध नहीं; कृत्य जाति से प्रेरित होना आवश्यक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध के अभियोजन से जुड़े बुनियादी सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निर्णय दिया है कि केवल इस आधार पर एससी/एसटी एक्ट का अपराध नहीं बनता कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग से है। अदालत ने रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति का अपमान, धमकी या प्रताड़ना विशेष रूप से उसकी जातिगत पहचान के कारण ही की गई होनी चाहिए। जस्टिस संतोष राय की एकल पीठ ने थाने के भीतर हुए विवाद से जुड़े एक मामले में 13 पुलिसकर्मियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए उन्हें आरोपमुक्त कर दिया। हाईकोर्ट ने माना कि जातिगत दुर्भावना के विशिष्ट आरोपों के अभाव और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत सरकार से पूर्व अभियोजन स्वीकृति न होने के कारण यह कार्यवाही कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं थी और यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद 18 जून 2017 को मेरठ जिले के खरखौदा थाने के भीतर हुई एक घटना से जुड़ा है। शिकायतकर्ता महिला का आरोप था कि उसने एक स्थानीय व्यक्ति से अपने 20,000 रुपये के कर्ज की वापसी की मांग की थी, जिसके बाद उस व्यक्ति ने तत्कालीन थाना प्रभारी और अन्य पुलिसकर्मियों से मिलीभगत कर ली। महिला का आरोप था कि उसे थाने बुलाया गया, जहां उसके साथ जातिसूचक अपशब्द कहे गए, मारपीट की गई, हिरासत में प्रताड़ित किया गया और उसके पैसे व सामान गायब हो गए। इसके बाद उसने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत अदालत में अर्जी दाखिल की, जिसके निर्देश पर 13 पुलिसकर्मियों सहित 15 नामजद और एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) और एससी/एसटी एक्ट की विभिन्न धाराओं में केस क्राइम संख्या 530/2017 दर्ज किया गया।

मामले की जांच के बाद विवेचक ने अंतिम आख्या (फाइनल रिपोर्ट) दाखिल करते हुए जांच बंद करने की सिफारिश की। विवेचक ने पाया कि किसी भी चश्मदीद गवाह ने आरोपों की पुष्टि नहीं की और यह मामला वास्तव में 18 जून 2017 को ही दर्ज हुई केस क्राइम संख्या 299/2017 की जवाबी कार्रवाई (काउंटरब्लास्ट) था। वह एफआईआर एक महिला सिपाही की तहरीर पर दर्ज की गई थी, जिसमें शिकायतकर्ता महिला पर सरकारी काम में बाधा डालने और पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट करने का आरोप था, जिसके बाद उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था।

पुलिस की इस क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ शिकायतकर्ता महिला ने सात व्यक्तियों के हलफनामों, अखबार की कतरनों और तस्वीरों के साथ प्रोटेस्ट याचिका दाखिल की। 6 अक्टूबर 2018 को मेरठ की विशेष अदालत (एससी/एसटी एक्ट) ने पुलिस की फाइनल रिपोर्ट खारिज कर दी और प्रोटेस्ट याचिका को परिवाद (शिकायत) के रूप में दर्ज कर लिया। विशेष अदालत ने अभियुक्तों को तलब किया, धारा 244 CrPC के तहत साक्ष्य दर्ज किए और बाद में धारा 245 CrPC के तहत दाखिल उनकी उन्मोचन (डिस्चार्ज) अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद पुलिसकर्मियों ने 6 अक्टूबर 2018 के आदेश और उसके परिणामस्वरूप शुरू हुई पूरी कार्यवाही को एससी/एसटी एक्ट की धारा 14-ए(1) के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता पुलिसकर्मियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि विशेष अदालत ने केस डायरी या जांच के नतीजों का उचित परीक्षण किए बिना पूरी तरह से गैर-बोलता (non-speaking) आदेश पारित किया। उन्होंने तर्क दिया कि फाइनल रिपोर्ट को केवल बाहरी हलफनामों और अखबार की कतरनों के आधार पर खारिज कर दिया गया, जो धारा 172 CrPC के तहत पुलिस डायरी का हिस्सा नहीं होते। वरिष्ठ वकील ने जोर देकर कहा कि सभी 13 अपीलकर्ता थाने में तैनात पुलिसकर्मी थे और अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे थे, इसलिए धारा 197 CrPC के तहत पूर्व अभियोजन स्वीकृति लेना अनिवार्य था। इसके अलावा, आरोप पूरी तरह से सामान्य और अस्पष्ट थे और किसी भी अधिकारी पर कोई विशिष्ट जातिसूचक टिप्पणी करने का आरोप नहीं लगाया गया था। यह पूरा मुकदमा पहले से दर्ज एफआईआर और गिरफ्तारी के प्रतिशोध में दर्ज कराया गया था।

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दूसरी ओर, शिकायतकर्ता और राज्य सरकार के अधिवक्ता ने प्रारंभिक आपत्ति जताई कि फाइनल रिपोर्ट खारिज कर प्रोटेस्ट याचिका को परिवाद मानने का आदेश केवल एक अंतरिम (interlocutory) आदेश है, जिसके खिलाफ एससी/एसटी एक्ट की धारा 14-ए के तहत अपील विचारणीय नहीं है। मेरिट पर उन्होंने तर्क दिया कि धारा 190(1)(a) CrPC के तहत विशेष न्यायाधीश को पुलिस रिपोर्ट से असहमत होने और प्रोटेस्ट याचिका को परिवाद मानकर आगे बढ़ने का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा कि हलफनामों से प्रथम दृष्टया मामला बनता है, जबकि धारा 197 CrPC की स्वीकृति, गवाहों के बयानों में विरोधाभास और क्रॉस-एफआईआर का परीक्षण केवल मुकदमे (ट्रायल) के दौरान ही किया जा सकता है।

हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण

जस्टिस संतोष राय ने सभी कानूनी पहलुओं पर विस्तार से विचार करते हुए अपील की विचारणीयता पर उठाई गई प्रारंभिक आपत्ति को खारिज कर दिया और माना कि अभियोजन पक्ष के पास कानूनी बुनियाद का अभाव था।

1. अपील की विचारणीयता: आदेश केवल अंतरिम नहीं, बल्कि मध्यवर्ती (इंटरमीडिएट)

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एससी/एसटी एक्ट की धारा 14-ए(1) के तहत अपील पर रोक केवल विशुद्ध अंतरिम आदेशों पर लागू होती है, न कि मध्यवर्ती (इंटरमीडिएट) आदेशों पर। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—अमर नाथ बनाम हरियाणा राज्य, मधु लिमये बनाम महाराष्ट्र राज्य, के.के. पटेल बनाम गुजरात राज्य और गिरीश कुमार सुनेजा बनाम सीबीआई—के साथ-साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के निर्णयों (गुलाम रसूल खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्यइन री: प्रोविजन ऑफ सेक्शन 14-ए) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि प्रोटेस्ट याचिका को परिवाद में बदलने और संज्ञान लेने का आदेश एक मध्यवर्ती आदेश है, क्योंकि यदि इसे रद्द कर दिया जाए तो पूरी आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो जाती है। इसलिए यह अपील पूरी तरह से विचारणीय है।

2. जाति-आधारित अपराध के बुनियादी तत्व मौजूद नहीं

एससी/एसटी एक्ट के तहत लगाए गए आरोपों की समीक्षा करते हुए अदालत ने पाया कि आरोप सामान्य हैं और इनमें जातिगत दुर्भावना के आवश्यक तत्वों का अभाव है। सुप्रीम कोर्ट के हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य और शाजन स्कारिया बनाम केरल राज्य के फैसलों का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया:

“…एससी/एसटी वर्ग के किसी व्यक्ति का हर अपमान या धमकी एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता; अपमान या धमकी पीड़ित के उस जाति या जनजाति से संबंधित होने के कारण ही की गई होनी चाहिए।”

अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता ने यह कहीं नहीं बताया कि किस पुलिसकर्मी को उसकी जाति की जानकारी थी, उन्हें यह जानकारी कैसे मिली, या किस अधिकारी ने कौन सा जातिसूचक शब्द इस्तेमाल किया। अदालत ने टिप्पणी की:

“…आपराधिक कानून किसी स्थान पर केवल मौजूदगी के आधार पर लोगों के समूह के खिलाफ तब तक आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक कि अपराध के वैधानिक तत्वों को स्पष्ट रूप से किसी व्यक्ति विशेष से न जोड़ा जाए।”

अदालत ने आगे कहा कि उसी दिन पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट को लेकर दर्ज एफआईआर, पुलिसकर्मियों को आई चोटें, महिला की गिरफ्तारी और चार महीने की लंबी देरी के बाद दर्ज कराया गया केस यह साफ दर्शाता है कि यह मुकदमा जवाबी बदले की भावना से किया गया था। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल फैसले के सिद्धांतों के तहत कार्यवाही निरस्त करने के दायरे में आता है।

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3. हलफनामों और अखबार की कतरनों पर फाइनल रिपोर्ट खारिज करना गलत

हाईकोर्ट ने कहा कि विशेष अदालत ने असत्यापित हलफनामों, तस्वीरों और अखबार की कतरनों के आधार पर पुलिस की फाइनल रिपोर्ट को खारिज करके गंभीर गलती की। अदालत ने पूर्व फैसलों (रामा कांत, दिनेश कुमार सोनी, विमलेश और सुप्रीम कोर्ट के मुख्तार जैदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया:

“…समाचार पत्र की रिपोर्ट उसमें दर्ज तथ्यों का कोई मूल या ठोस साक्ष्य नहीं होती। इसलिए विशेष अदालत विवेचक के निष्कर्ष को खारिज करने के लिए बिना किसी अतिरिक्त आधार के ऐसी सामग्री पर भरोसा नहीं कर सकती थी।”

अदालत ने कहा:

“…प्रोटेस्ट याचिका के साथ संलग्न हलफनामे अपने आप में मूल साक्ष्य नहीं बन जाते; उनकी प्रकृति और प्रासंगिकता की जांच की जानी चाहिए, और यदि अदालत प्रोटेस्ट याचिका को परिवाद मानकर आगे बढ़ती है, तो यह भी सत्यापित करना आवश्यक है कि क्या परिवाद के तथ्य दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 190 के तहत अपराध बनाते हैं, और उसके बाद ही वैधानिक परिवाद प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।”

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि हलफनामों में घटना के समय (दोपहर 1:30 बजे से 2:30 बजे के बीच) और गवाहों की मौजूदगी को लेकर भारी विरोधाभास थे। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—क्रांति एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम मसूद अहमद खान और बिड़ला कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाम एडवेंट्ज़ इन्वेस्टमेंट्स—का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक आदेश कारणों पर आधारित होने चाहिए, और केवल यह लिख देना कि पत्रावली का परिशीलन किया गया, न्यायिक विवेक के इस्तेमाल का विकल्प नहीं हो सकता।

4. धारा 197 के तहत पूर्व अभियोजन स्वीकृति का पूर्ण संरक्षण

हाईकोर्ट ने पाया कि विशेष अदालत ने लोक सेवकों के लिए धारा 197 CrPC के तहत आवश्यक पूर्व अभियोजन स्वीकृति के प्रावधान की पूरी तरह अनदेखी की। संविधान पीठ के फैसले माताजोग डोबे बनाम एच.सी. भारी और अन्य फैसलों (अब्दुल वहाब अंसारी, ओडिशा राज्य बनाम गणेश चंद्र जेव, डी. देवराजा और आमोद कुमार कांत) का उल्लेख करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि यदि कृत्य का संबंध आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन से है, तो पूर्व स्वीकृति कानूनी अनिवार्यता है।

अदालत ने कहा:

“…जहां दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 लागू होती है, वहां अदालत द्वारा अपराध का संज्ञान लेने के लिए पूर्व अभियोजन स्वीकृति एक अनिवार्य पूर्व-शर्त है। इसलिए, प्रोटेस्ट याचिका को परिवाद में बदलने और अपीलकर्ताओं के खिलाफ कार्यवाही करने से पहले, विशेष अदालत को यह संतुष्ट होना आवश्यक था कि पूर्व अभियोजन स्वीकृति की वैधानिक शर्त पूरी की गई है या नहीं।”

सुप्रीम कोर्ट के प्रदीप एस. वोडेयार बनाम कर्नाटक राज्य फैसले को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि शुरुआत में ही लोक सेवकों को धारा 197 के संरक्षण से वंचित करना न्याय की विफलता है, जिसे धारा 465 CrPC के तहत सुधरने योग्य सामान्य प्रक्रियात्मक त्रुटि नहीं माना जा सकता।

5. सत्र अदालत द्वारा मजिस्ट्रेट प्रक्रिया अपनाना गंभीर त्रुटि

सुप्रीम कोर्ट के फैसले गंगुला अशोक बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के आधार पर हाईकोर्ट ने इंगित किया कि एससी/एसटी एक्ट के तहत विशेष अदालत वस्तुतः एक सत्र अदालत होती है, जिसे CrPC के अध्याय XVIII में दी गई सत्र परीक्षण प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। विशेष अदालत ने मजिस्ट्रेट की वारंट प्रक्रिया को अपनाकर—धारा 244 CrPC में साक्ष्य दर्ज करने और धारा 245 CrPC में उन्मोचन तय करने की प्रक्रिया अपनाकर—गंभीर कानूनी भूल की, जिससे अपीलकर्ताओं को धारा 227 CrPC के तहत अपने उन्मोचन के अधिकार से वंचित होना पड़ा।

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प्रदेश भर की अदालतों के लिए 13 सूत्री दिशा-निर्देश

उत्तर प्रदेश की सभी आपराधिक अदालतों में एकरूपता और प्रक्रियागत शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए हाईकोर्ट ने 13 अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए:

  1. पुलिस द्वारा फाइनल रिपोर्ट पेश किए जाने पर अदालत उसे स्वीकार या खारिज करने से पहले केस डायरी और जांच सामग्री का स्वतंत्र रूप से न्यायिक परीक्षण करेगी।
  2. हलफनामों के साथ प्रोटेस्ट याचिका दाखिल होने मात्र से उसे स्वतः परिवाद में नहीं बदला जाएगा; अदालत को यह तय करना होगा कि वह कौन सा कानूनी विकल्प अपना रही है।
  3. यदि अदालत फाइनल रिपोर्ट खारिज कर मामले को राज्य के मुकदमे के रूप में आगे बढ़ाती है, तो आदेश में विवेचक के निष्कर्ष से असहमति के संक्षिप्त और ठोस कारण दर्ज किए जाएंगे।
  4. यदि प्रोटेस्ट याचिका को परिवाद के रूप में दर्ज किया जाता है, तो इसके ठोस कारण दर्ज किए जाएंगे और यह जांचा जाएगा कि क्या आरोप प्रथम दृष्टया CrPC की धारा 190(1)(a) अथवा बीएनएसएस (BNSS) की धारा 210(1)(a) के तहत अपराध बनाते हैं।
  5. प्रोटेस्ट याचिका के साथ संलग्न हलफनामों, अखबार की कतरनों और तस्वीरों को फाइनल रिपोर्ट खारिज करने के लिए यांत्रिक रूप से मूल साक्ष्य नहीं माना जाएगा।
  6. सत्र अदालत या विशेष अदालत के समक्ष चलने वाले मामलों में CrPC या BNSS के तहत सत्र विचारण की प्रक्रिया का ही पालन किया जाएगा; इसमें मजिस्ट्रेट न्यायालय की प्रक्रिया लागू नहीं की जाएगी।
  7. जहां अभियुक्त लोक सेवक हों और आरोप आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन से जुड़े हों, वहां अदालत उचित स्तर पर धारा 197 CrPC अथवा धारा 218 BNSS की अनिवार्यता का परीक्षण करेगी।
  8. संज्ञान लेने या फाइनल रिपोर्ट खारिज करने का प्रत्येक आदेश एक बोलता और तर्कपूर्ण न्यायिक आदेश होना चाहिए।
  9. परिवाद मामलों में पीठासीन अधिकारी CrPC की धारा 200 और 202 अथवा BNSS की धारा 223 और 225 के तहत शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज करेंगे।
  10. जहां कई अभियुक्त बनाए गए हों, वहां सम्मन के स्तर पर अदालत प्रत्येक अभियुक्त की विशिष्ट भूमिका का मूल्यांकन करेगी और सामान्य आरोपों पर यांत्रिक रूप से कार्यवाही नहीं करेगी।
  11. यूपी पुलिस रेगुलेशन के नियम 122 के तहत फाइनल रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक अथवा पुलिस कमिश्नर के माध्यम से ही भेजी जाएगी और शिकायतकर्ता को इसकी सूचना दी जाएगी।
  12. उच्च न्यायालय के परिपत्रों के अनुसार, आपराधिक अदालतें फाइनल रिपोर्ट का निस्तारण सामान्यतः एक माह के भीतर सुनिश्चित करेंगी।
  13. राज्य के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीश अपनी मासिक बैठकों और प्रशासनिक निगरानी सेल की बैठकों में इन दिशा-निर्देशों के अनुपालन की नियमित समीक्षा करेंगे।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि अपीलकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट), मेरठ द्वारा 6 अक्टूबर 2018 को पारित आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही इस आदेश के आधार पर शुरू हुई पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करते हुए सभी 13 पुलिसकर्मियों को आरोपमुक्त कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने अपने महानिबंधक (रजिस्ट्रार जनरल) को निर्देश दिया कि इस निर्णय की प्रति 48 घंटे के भीतर मेरठ की संबंधित अदालत को भेजी जाए, राज्य के सभी न्यायिक अधिकारियों को मार्गदर्शन हेतु प्रसारित की जाए और लखनऊ स्थित न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (JTRI) के निदेशक को आवश्यक मार्गदर्शन के लिए भेजी जाए।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: भुवनेश कुमारी और 12 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 7399/2026
पीठ: जस्टिस संतोष राय
निर्णय की तिथि: 15 सितंबर 2026

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