सैंपल भेजने में बिना किसी स्पष्टीकरण के पांच दिनों का अंतर आने और कानूनी सैंपलिंग प्रक्रिया का पूरी तरह पालन न होने को अभियोजन पक्ष के लिए घातक मानते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने एनडीपीएस कानून (नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1985) के तहत दो लोगों की दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जहां नमूनों की सुरक्षा और कस्टडी की कड़ी (चेन ऑफ कस्टडी) टूट जाती है, वहां फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) की रिपोर्ट को खारिज करना होगा। ऐसी स्थिति में यह साबित करने के लिए कोई कानूनी आधार नहीं बचता कि जब्त पदार्थ वाकई मादक पदार्थ था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 29 नवंबर 2004 का है। जबलपुर जिले के गोरखपुर थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी इंस्पेक्टर राजेश तिवारी (अभियोजन गवाह-7) ने रोजनामचे में सूचना दर्ज की कि दो व्यक्ति, जिनमें से एक दिव्यांग है, बंदरिया तिराहा के पास ऑटो-रिक्शा से उतरे हैं और उनके बैग में चरस है। पुलिस की टीम ने मौके पर पहुंचकर अब्दुल रजिक और गोविंद को पकड़ा। तलाशी के दौरान अब्दुल रजिक के बैग से 1 किलोग्राम और गोविंद के बैग से 800 ग्राम संदिग्ध चरस बरामद होने का दावा किया गया।
जब्ती अधिकारी ने मौके पर ही पदार्थ के एक छोटे टुकड़े को जलाकर प्राथमिक जांच की और उसके चरस होने का संदेह जताया। इसके बाद नमूने लिए गए, जब्ती मेमो तैयार किया गया और दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया। थाना गोरखपुर में एनडीपीएस कानून की धारा 8, 18, 20 और 21 के तहत एफआईआर दर्ज की गई। जांच पूरी होने के बाद विशेष अदालत (नारकोटिक्स), जबलपुर में चार्जशीट दाखिल की गई।
ट्रायल के दौरान जब्ती की कार्रवाई में शामिल दोनों स्वतंत्र पंच गवाह, मोहन (अभियोजन गवाह-3) और अमित सोनकर (अभियोजन गवाह-5), मुकर गए और उन्होंने अभियोजन का समर्थन नहीं किया। इसके बावजूद, पुलिसकर्मियों के बयानों और एफएसएल रिपोर्ट (प्रदर्श पी-46) पर भरोसा करते हुए स्पेशल जज (एनडीपीएस), जबलपुर ने 5 सितंबर 2006 को दोनों को दोषी ठहराया। अब्दुल रजिक को धारा 8 सहपठित धारा 20(बी)(ii)(सी) के तहत 10 साल के कठोर कारावास और 1,00,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई। वहीं, गोविंद को धारा 8 सहपठित धारा 20(बी)(ii)(बी) के तहत 8 साल के कठोर कारावास और 80,000 रुपये के जुर्माने की सजा मिली।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने 26 नवंबर 2010 को दोनों की अपीलें खारिज करते हुए सजा बरकरार रखी थी, जिसके खिलाफ आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकील ने जोरदार दलील दी कि अभियोजन पक्ष पुख्ता और विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए मादक पदार्थ की बरामदगी साबित करने में नाकाम रहा है। साथ ही एनडीपीएस कानून की धारा 42, 50 और 52-ए के अनिवार्य सुरक्षा उपायों का खुला उल्लंघन किया गया है। वैकल्पिक तौर पर यह भी तर्क दिया गया कि बरामद पदार्थ मध्यम मात्रा (इंटरमीडिएट क्वांटिटी) के दायरे में आता है, इसलिए 10 साल की अधिकतम सजा बेहद कठोर और असंगत है। अदालत से प्रार्थना की गई कि यदि दोषसिद्धि बरकरार रखी जाती है, तो सजा को उनके द्वारा पहले ही काटी जा चुकी अवधि तक सीमित कर दिया जाए।
दूसरी तरफ, मध्य प्रदेश राज्य की ओर से पेश वकील ने अपीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि जब्ती अधिकारी या पुलिस दल के पास आरोपियों को झूठा फंसाने की कोई वजह नहीं थी। दोनों से बरामद कुल मात्रा व्यावसायिक मात्रा (कमर्शियल क्वांटिटी) से कहीं अधिक है और कानून के सभी अनिवार्य प्रावधानों का विधिवत पालन किया गया था। राज्य ने यह भी दलील दी कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का गहराई से विश्लेषण करके ही फैसला दिया है, इसलिए इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
अदालत का विश्लेषण और मुख्य टिप्पणियां
कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन से जुड़ी आपत्तियों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहले यह स्पष्ट किया कि चूंकि आरोपियों को खुले सार्वजनिक स्थान पर सड़क से पकड़ा गया था और तलाशी उनके हाथों में मौजूद बैगों की ली गई थी, इसलिए इस मामले में एनडीपीएस कानून की धारा 42 या 50 लागू नहीं होती।
हालांकि, अदालत ने नमूनों की सुरक्षा और लिंक एविडेंस में गंभीर खामियां पाईं। जब्ती अधिकारी के बयान और जब्ती मेमो से यह स्पष्ट नहीं हो सका कि दर्ज किया गया वजन पैकिंग सहित ग्रॉस वजन था या केवल मादक पदार्थ का नेट वजन। सबसे अहम बात यह रही कि जब्ती अधिकारी ने अपने बयान में यह नहीं कहा कि सैंपल के पैकेट उनके द्वारा सील किए गए थे या उन पैकेटों पर आरोपियों, पंच गवाहों या जब्ती अधिकारी के हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान वाली कोई पर्ची चिपकाई गई थी। यही नहीं, जब मालखाने से मुकदमती माल अदालत में पेश किया गया, तब सैंपल के पैकेट अलग से अदालत के सामने प्रदर्शित ही नहीं किए गए।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि मालखाना रजिस्टर (प्रदर्श पी-2सी) में 29 नवंबर 2004 को सैंपल जमा करने का रिकॉर्ड तो दर्ज है, लेकिन वहां से सैंपल एफएसएल भेजने के लिए बाहर निकाले जाने का कोई इंद्राज (एंट्री) मौजूद नहीं है। अभियोजन पक्ष थाने का कोई फॉरवर्डिंग पत्र या रोड सर्टिफिकेट तक पेश नहीं कर सका।
नमूनों को प्रयोगशाला भेजने के समय में भी गंभीर विरोधाभास सामने आया। पुलिस अधीक्षक कार्यालय का फॉरवर्डिंग ड्राफ्ट (प्रदर्श पी-45) 1 दिसंबर 2004 का है, जिसमें कांस्टेबल रामकृष्ण को वाहक बताया गया था। इसके विपरीत, एफएसएल रिपोर्ट (प्रदर्श पी-46) और मालखाना प्रभारी (अभियोजन गवाह-2) के अनुसार सैंपल 6 दिसंबर 2004 को प्रयोगशाला पहुंचे। कांस्टेबल रामकृष्ण को अदालत में परीक्षित ही नहीं कराया गया और 1 से 6 दिसंबर के बीच के पांच दिनों तक सैंपल कहां और किसकी कस्टडी में रहे, इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
कस्टडी और सैंपलिंग के कानूनी सिद्धांतों पर जोर देते हुए पीठ ने कहा:
“यह स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि अभियोजन पक्ष को उचित लिंक एविडेंस के जरिए यह साबित करना होता है कि जब्ती अधिकारी द्वारा बरामद मादक पदार्थ से निकाले गए नमूने ठीक से सील किए गए थे और जब्ती के समय से लेकर एफएसएल में प्राप्ति तक सुरक्षित हालत में रहे। कहने की आवश्यकता नहीं है कि एफएसएल रिपोर्ट को साक्ष्य में स्वीकार किए जाने के लिए अभियोजन पक्ष को विश्वसनीय मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों द्वारा चेन ऑफ कस्टडी की पूरी कड़ी साबित करनी होगी, जो नमूनों की पवित्रता और सत्यता सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य है।”
पीठ ने नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो बनाम काशिफ और भरत आमबाले बनाम छत्तीसगढ़ राज्य के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 52-ए की प्रक्रिया का केवल पालन न होना या प्रक्रियागत देरी अपने आप में मुकदमे को दूषित नहीं करती। लेकिन इसका पूर्ण उल्लंघन यह तय करने के लिए एक बेहद प्रासंगिक कारक बन जाता है कि क्या नमूनों को सुरक्षित रखा गया था।
नदीम अहमद बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के फैसले का उल्लेख करते हुए पीठ ने माना कि मजिस्ट्रेट के सामने नमूने न निकालना और इन्वेंट्री प्रमाणित न कराना अभियोजन के केस की जड़ पर प्रहार करता है और सैंपलिंग प्रक्रिया को पूरी तरह संदिग्ध बना देता है। इसी तरह राजस्थान राज्य बनाम तारा सिंह मामले का संदर्भ देते हुए पीठ ने दोहराया कि एनडीपीएस कानून की कठोर सजाओं को देखते हुए नमूनों की आवाजाही में बिना स्पष्टीकरण का अंतर उनकी सत्यता को खत्म कर देता है।
इन सिद्धांतों को मौजूदा मामले पर लागू करते हुए पीठ ने कहा:
“इस अदालत द्वारा प्रतिपादित उपरोक्त सिद्धांतों को वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू करने से यह स्पष्ट है कि लिंक एविडेंस पूरी तरह टूट चुका है, जिससे नमूनों की सत्यता और प्रामाणिकता पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। नतीजतन, एफएसएल रिपोर्ट (प्रदर्श पी-46) अपना महत्व खो देती है और इसे विचार से बाहर किया जाना चाहिए। एक बार जब एफएसएल रिपोर्ट को विचार से बाहर कर दिया जाता है, तो यह स्थापित करने के लिए कोई अन्य कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं रह जाता कि आरोपियों से कथित तौर पर बरामद पदार्थ एनडीपीएस कानून की धारा 2(iii)(ए) के तहत चरस था, जिससे धारा 20 के दंडात्मक प्रावधान लागू हो सकें।”
अदालत ने मौके पर पदार्थ को जलाकर चरस पहचानने के जब्ती अधिकारी के दावे को भी खारिज कर दिया और टिप्पणी की:
“रिकॉर्ड पर ऐसा कोई वैज्ञानिक आधार मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि किसी पदार्थ के केवल एक हिस्से को जलाकर यह तय किया जा सकता है कि वह चरस ही थी। इसलिए, इस तरह की पहचान का समर्थन करने वाले किसी वैज्ञानिक या अन्य विश्वसनीय आधार के अभाव में, केवल गवाह (अभियोजन गवाह-7) की गवाही पर यह भरोसा नहीं किया जा सकता कि आरोपियों से बरामद कथित पदार्थ चरस था।”
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि आरोपियों से बरामद पदार्थ चरस था। ऐसी स्थिति में निचली अदालत द्वारा दी गई और हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखी गई दोषसिद्धि कानूनन टिकने योग्य नहीं है। अदालत ने दोनों अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्रिमिनल अपील संख्या 1561/2014 और 1562/2014 को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के 5 सितंबर 2006 के दोषसिद्धि आदेश और हाईकोर्ट के 26 नवंबर 2010 के फैसले को रद्द कर दिया। दोनों अपीलकर्ताओं, अब्दुल रजिक और गोविंद को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। दोनों आरोपी पहले से जमानत पर थे, इसलिए उन्हें सरेंडर करने की आवश्यकता नहीं है और उनके बेल बॉन्ड भी निरस्त कर दिए गए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अब्दुल रजिक बनाम मध्य प्रदेश राज्य (सहपठित गोविंद बनाम मध्य प्रदेश राज्य)
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1561/2014 सहपठित क्रिमिनल अपील संख्या 1562/2014
पीठ: जस्टिस संदीप मेहता, जस्टिस मनमोहन
निर्णय की तिथि: 16 सितंबर 2026

