सेटलमेंट कमीशन द्वारा तय असेसमेंट को धारा 148 के तहत दोबारा खोलने का अधिकार असेसिंग ऑफिसर के पास नहीं: सुप्रीम कोर्ट

आयकर अधिनियम, 1961 के अध्याय XIX-A के तहत कर समझौतों की कानूनी अंतिमता को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक बार आयकर समझौता आयोग द्वारा किसी मूल्यांकन वर्ष (असेसमेंट ईयर) का निपटारा कर दिए जाने के बाद, असेसिंग ऑफिसर के पास धारा 148 के तहत दोबारा जांच (रीअसेसमेंट) का नोटिस जारी करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं रह जाता। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने रियल एस्टेट कंपनी मैसर्स ओमैक्स लिमिटेड के खिलाफ राजस्व विभाग (इनकम टैक्स डिपार्टमेंट) की अपील खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने माना कि जब धारा 245D(4) के तहत अंतिम सेटलमेंट आदेश पारित हो जाता है, तो धारा 147 के तहत नियमित असेसमेंट और रीअसेसमेंट की सामान्य व्यवस्था पूरी तरह से हट जाती है। इसके बाद विभाग के पास धारा 245D(6) के तहत केवल धोखाधड़ी या गलत बयानी साबित करने के लिए खुद समझौता आयोग के समक्ष जाने का ही विकल्प बचता है, स्वतंत्र रूप से केस दोबारा खोलने का नहीं।

मामले की पृष्ठभूमि

प्रतिवादी कंपनी मैसर्स ओमैक्स लिमिटेड एक पब्लिक लिमिटेड रियल एस्टेट कंपनी है। 22 सितंबर 2005 को आयकर विभाग ने आयकर अधिनियम की धारा 132 के तहत कंपनी, उसके सहयोगी उपक्रमों और निदेशकों के आवासीय परिसरों पर तलाशी और जब्ती (सर्च एंड सीजर) की कार्रवाई की थी। इस कार्रवाई के बाद, कंपनी ने 30 नवंबर 2006 को असेसमेंट ईयर 2006-07 के लिए अपना इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल किया। इसमें हाउसिंग प्रोजेक्ट्स के संबंध में धारा 80IB(10) के तहत 78,99,00,509 रुपये की टैक्स डिडक्शन का दावा करते हुए कुल कर योग्य आय 89,20,76,630 रुपये घोषित की गई थी।

जब नियमित असेसमेंट की कार्यवाही लंबित थी, उसी दौरान कंपनी ने 31 मई 2007 को आयकर समझौता आयोग (ITSC) के समक्ष धारा 245C के तहत असेसमेंट ईयर 2000-01 से 2006-07 तक के मामलों के निपटारे के लिए आवेदन किया। आयोग ने 17 मार्च 2008 को धारा 245D(4) के तहत अंतिम सेटलमेंट ऑर्डर पारित कर दिया। असेसमेंट ईयर 2006-07 के लिए आयोग ने 18,00,000 रुपये की अतिरिक्त आय सरेंडर करने की पेशकश स्वीकार की और धारा 80IB(10) के तहत डिडक्शन को शामिल करते हुए शुद्ध कर योग्य आय 89,38,76,630 रुपये निर्धारित कर दी।

इसके बाद, 17 और 18 दिसंबर 2009 को राजस्व विभाग के अन्वेषण विंग ने कंपनी के परिसरों पर धारा 133A के तहत सर्वे किया। सर्वे के दौरान विभाग ने कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों और ऑडिटर्स की एक बैठक के मिनट्स जब्त किए। विभाग का आरोप था कि इन दस्तावेजों से पता चलता है कि धारा 80IB(10)(vi) के तहत व्यावसायिक निर्माण क्षेत्र की तय सीमा का पालन दिखाने के लिए ओमैक्स सिटी लखनऊ और ओमैक्स सिटी सोनीपत जैसी परियोजनाओं के व्यावसायिक हिस्सों को पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनियों को हस्तांतरित करने की योजना बनाई गई थी।

इस सर्वे सामग्री के आधार पर असेसिंग ऑफिसर ने 30 जून 2010 को धारा 148 के तहत नोटिस जारी किया। इसमें आरोप लगाया गया कि व्यावसायिक क्षेत्र तय सीमा से अधिक होने के कारण धारा 80IB(10) के तहत लिया गया 55,58,96,486 रुपये का डिडक्शन असेसमेंट से छूट गया था। कंपनी ने प्रारंभिक आपत्तियां दर्ज कराईं और तर्क दिया कि धारा 245-I के तहत 17 मार्च 2008 का सेटलमेंट आदेश अंतिम और बाध्यकारी है, इसलिए असेसिंग ऑफिसर के पास रीअसेसमेंट का कोई अधिकार नहीं है। असेसिंग ऑफिसर ने 3 अक्टूबर 2011 को इन आपत्तियों को खारिज कर दिया और 8 नवंबर 2011 को धारा 147 सपठित धारा 143(3) के तहत रीअसेसमेंट ऑर्डर जारी करते हुए कंपनी की कुल आय में 65,65,17,999 रुपये जोड़ दिए।

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समानांतर रूप से, विभाग ने धारा 245D(6) के तहत समझौता आयोग में भी अर्जी दी कि गलत तथ्य पेश किए जाने के आधार पर 17 मार्च 2008 के आदेश को शून्य घोषित किया जाए। हालांकि, 16 दिसंबर 2011 को समझौता आयोग ने विभाग की अर्जी खारिज कर दी। आयोग ने पाया कि कंपनी ने तथ्यों को नहीं छिपाया था और धारा 80IB(10) के तहत ‘प्रोजेक्ट’ की कानूनी व्याख्या को लेकर मतभेद एक कानूनी विवाद था, न कि गलत बयानी।

कंपनी ने धारा 148 के नोटिस और रीअसेसमेंट ऑर्डर को दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका के जरिए चुनौती दी। 13 जुलाई 2012 को हाईकोर्ट ने नोटिस और रीअसेसमेंट ऑर्डर दोनों को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि सेटलमेंट आदेश अंतिम हो चुका था और असेसिंग ऑफिसर के पास कोई अधिकार क्षेत्र शेष नहीं था। इसके बाद विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों के तर्क

राजस्व विभाग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरिजीत प्रसाद ने दलील दी कि धारा 245C सपठित धारा 245D के तहत सेटलमेंट की कार्यवाही केवल उसी अघोषित आय तक सीमित होती है जो पहले असेसिंग ऑफिसर के सामने उजागर नहीं की गई थी। विभाग का कहना था कि करदाता ने धारा 80IB(10) के तहत डिडक्शन के मुद्दे को तय करने के लिए विशेष रूप से आयोग का रुख नहीं किया था। इसलिए, धारा 148 का नोटिस आयोग द्वारा तय किसी मुद्दे को दोबारा नहीं खोलता, क्योंकि आय छूटने की बात दिसंबर 2009 के सर्वे के बाद ही सामने आई थी। विभाग ने सीआईटी बनाम दमानी ब्रदर्स (2003) के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जो मामले सेटलमेंट आवेदन में शामिल नहीं थे, उन पर आयोग का क्षेत्राधिकार नहीं होता।

इसके विपरीत, ओमैक्स लिमिटेड की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कविता झा ने तर्क दिया कि राजस्व विभाग अध्याय XIX-A की कानूनी योजना को गलत तरीके से समझ रहा है। उन्होंने बताया कि फॉर्म 34B में दिए गए सेटलमेंट आवेदन में धारा 80IB के डिडक्शन के बाद शुद्ध कर योग्य आय दर्शाई गई थी और अघोषित आय पर अतिरिक्त टैक्स की पेशकश की गई थी। आयोग ने आवेदन स्वीकार किया, कमिश्नर से रिपोर्ट मंगाई और दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद कुल आय तय की। उन्होंने जोर देकर कहा कि धारा 245-I के तहत धारा 245D(4) का आदेश अंतिम होता है और असेसिंग ऑफिसर के पास इसे दोबारा खोलने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि विभाग का एकमात्र कानूनी उपाय धारा 245D(6) का आवेदन था, जिसे आयोग पहले ही 16 दिसंबर 2011 को खारिज कर चुका था। प्रतिवादी ने ज्योतिइंद्रसिंहजी बनाम एस.आई. त्रिपाठी (1993), सीआईटी, मद्रास बनाम एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स लिमिटेड (1994), बृज लाल बनाम सीआईटी, जालंधर (2011) और कोटक महिंद्रा बैंक लिमिटेड बनाम सीआईटी (2023) के फैसलों पर भरोसा जताया।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी ढांचा

आयकर अधिनियम के अध्याय XIX-A के वैधानिक ढांचे का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेटलमेंट की प्रक्रिया एक विशेष वैकल्पिक विवाद समाधान व्यवस्था के रूप में काम करती है, जो धारा 142 से 156 तक की सामान्य असेसमेंट प्रक्रिया को अस्थायी रूप से रोक देती है।

पीठ ने पूर्व के फैसलों में स्थापित सिद्धांतों की समीक्षा की:

  • ज्योतिइंद्रसिंहजी मामले में यह तय हुआ था कि धारा 245-I के तहत आदेश की अंतिमता के बावजूद संविधान के अनुच्छेद 226, 32 और 136 के तहत न्यायिक समीक्षा का दायरा बेहद सीमित है, जो केवल निर्णय लेने की प्रक्रिया, पक्षपात, धोखाधड़ी या कानूनी प्रावधानों के स्पष्ट उल्लंघन तक सीमित रहता है।
  • एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स लिमिटेड मामले में अदालत ने माना था कि धारा 245C के तहत आवेदन स्वीकार होने के बाद आयोग संबंधित असेसमेंट वर्ष के पूरे मामले को अपने हाथ में ले लेता है और घोषित तथा अघोषित दोनों तरह की आय पर समग्र विचार करता है।
  • बृज लाल मामले में संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि अध्याय XIX-A एक स्व-निहित संहिता (सेल्फ-कंटेन्ड कोड) है, जिसका उद्देश्य देनदारी का नियमित निर्धारण नहीं बल्कि देनदारी का समझौता करना है। आवेदन स्वीकार होते ही धारा 245F(2) के तहत आयोग को अनन्य अधिकार क्षेत्र प्राप्त हो जाता है।
  • कोटक महिंद्रा बैंक लिमिटेड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया था कि आयोग के विवेकाधीन आदेशों में संवैधानिक अदालतों का दखल सीमित होना चाहिए और अदालतें अपीलीय संस्था की तरह तथ्यों के वजन की समीक्षा नहीं कर सकतीं।

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के मेजर मेटल्स लिमिटेड और इलाहाबाद हाईकोर्ट के सीआईटी बनाम श्रीमती दीक्षा सिंह के फैसलों से सहमति जताई, जिनमें कहा गया था कि एक ही असेसमेंट वर्ष के लिए अलग-अलग अधिकारियों द्वारा आंशिक या समानांतर असेसमेंट कानूनन संभव नहीं है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि विभाग द्वारा दमानी ब्रदर्स फैसले पर दिया गया हवाला अनुचित था, क्योंकि वह फैसला धारा 245D(1) के तहत केवल प्रारंभिक दाखिले के चरण तक सीमित था, जबकि आवेदन स्वीकार होने के बाद आयोग पूरे वर्ष के मामले पर पूर्ण अधिकार रखता है।

समझौता आयोग के मंच के विशिष्ट स्वरूप पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“अध्याय XIX-A के माध्यम से विवाद समाधान की सुविधा को एक करदाता द्वारा अपनी आय और व्यय की विकृत, छिपाई गई और गलत तरीके से प्रस्तुत की गई प्रविष्टियों से खातों के शुद्धिकरण के रूप में देखा जा सकता है। यह कोई साधारण पवित्र स्नान नहीं है, बल्कि आयकर समझौता आयोग द्वारा निर्धारित कर, जुर्माना और ब्याज चुकाकर खुद को दोषमुक्त करने का एक अवसर है।”

धारा 245C पर विभाग के तर्क को खारिज करते हुए पीठ ने माना कि विभाग ने इस वैधानिक शर्त को नजरअंदाज किया कि करदाता को यह भी बताना होता है कि ऐसी आय किस प्रकार अर्जित की गई थी। वर्तमान मामले में करदाता ने अपनी सकल कुल आय दर्शायी थी और वैधानिक डिडक्शन का दावा करने के बाद शुद्ध कर योग्य आय प्रस्तुत की थी, जिसे आयोग ने कमिश्नर की रिपोर्ट के बाद स्वीकार किया था।

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अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार धारा 245D(4) का आदेश अंतिम हो जाने के बाद असेसिंग ऑफिसर अपनी मर्जी से दोबारा जांच का रास्ता नहीं खोल सकता:

“यदि धारा 143(2), 148, 154 आदि के तहत असेसिंग ऑफिसर के अधिकार क्षेत्र को स्वतंत्र बनाकर पुनः प्रयोग के लिए उपलब्ध कराया जाए, तो समझौता आयोग के आदेश से जुड़ी अंतिमता ही निष्फल हो जाएगी। संसद ने इस तरह की व्यवस्था की परिकल्पना नहीं की थी।”

सेटलमेंट व्यवस्था के पारस्परिक समझौते के संतुलन को रेखांकित करते हुए अदालत ने टिप्पणी की:

“करदाता और राजस्व विभाग दोनों को ही लाभ और बंधन (क्रस्ट और क्रम्ब) को एक साथ स्वीकार करना होगा।”

पीठ ने समझाया कि जहां राजस्व विभाग को लंबी मुकदमेबाजी के बिना अघोषित आय पर तत्काल टैक्स की वसूली का लाभ मिलता है, वहीं करदाता को अंतिम राहत, जुर्माने और अभियोजन से छूट मिलती है। एक बार समझौता हो जाने के बाद कोई भी पक्ष बंद हो चुके मामलों को दोबारा नहीं उठा सकता:

“एक बार जब लाभ को स्वीकार कर लिया जाता है और कठोर कार्रवाई से बचा जाता है, तो उसके बाद फिर से नए लाभ और कठोरता की मांग करना 1961 के अधिनियम के अध्याय XIX-A का उद्देश्य नहीं है।”

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि तथ्यों को छिपाने या गलत जानकारी देने की स्थिति में राजस्व विभाग के पास धारा 245D(6) का वैधानिक विकल्प मौजूद था। विभाग ने इस प्रावधान का उपयोग किया था और 16 दिसंबर 2011 को आयोग ने विभाग की अर्जी खारिज कर दी थी, जो आदेश अंतिम हो चुका है। ऐसे में विभाग धारा 148 का सहारा नहीं ले सकता।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में किसी भी क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि को न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि असेसिंग ऑफिसर के पास धारा 148 का नोटिस जारी करने या 8 नवंबर 2011 का रीअसेसमेंट ऑर्डर पारित करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं था। इसके साथ ही राजस्व विभाग द्वारा दायर सिविल अपील खारिज कर दी गई और सभी लंबित अर्जियों का निस्तारण कर दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स और अन्य बनाम मैसर्स ओमैक्स लिमिटेड
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 9190/2013
पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
निर्णय की तिथि: 16 सितंबर, 2026

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