चुनिंदा यूपीआई लेन-देन पर मर्चेंट शुल्क लगाने के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, 15 अक्टूबर से लागू होना है नया नियम

केंद्र सरकार द्वारा चुनिंदा यूपीआई (UPI) भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। वित्त मंत्रालय द्वारा नई शुल्क दरों की घोषणा किए जाने के ठीक एक दिन बाद बुधवार को यह याचिका दाखिल की गई, जिस पर शीर्ष अदालत ने फिलहाल सुनवाई शुरू नहीं की है।

अधिसूचना को कानूनी चुनौती

याचिका में केंद्र सरकार की ओर से 14 सितंबर को जारी उस अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसे भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10A के तहत लाया गया था। इस सरकारी आदेश के जरिए वैधानिक ‘शून्य-शुल्क सुरक्षा’ (बिना किसी अतिरिक्त चार्ज के भुगतान) के दायरे को सीमित कर दिया गया है। नई व्यवस्था में यह राहत केवल दो माध्यमों पर ही बरकरार रखी गई है—बिना किसी तय सीमा के रुपे डेबिट कार्ड और 2,000 रुपये तक के यूपीआई लेन-देन।

याचिकाकर्ता का कहना है कि सरकार के इस कदम से 2,000 रुपये से अधिक राशि वाले यूपीआई लेन-देन पर मिलने वाली शून्य-एमडीआर सुरक्षा छिन गई है, जो जनवरी 2020 से निर्बाध रूप से लागू थी।

नए शुल्क ढांचे का पूरा ब्योरा

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वित्त मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इस नई शुल्क संरचना की घोषणा की है, जो आगामी 15 अक्टूबर से प्रभावी होने जा रही है।

तय प्रारूप के मुताबिक, ग्राहकों द्वारा व्यापारियों को किए जाने वाले (पर्सन-टू-मर्चेंट) 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत की दर से एमडीआर लगाया जाएगा। हालांकि, व्यापारियों को राहत देते हुए 75,000 रुपये और उससे अधिक के बड़े भुगतानों पर इस शुल्क की अधिकतम सीमा (कैप) 300 रुपये तय की गई है।

मंत्रालय ने कुछ विशिष्ट क्षेत्रों के लिए अलग नियम भी निर्धारित किए हैं। इसके तहत आवश्यक और कम मुनाफे (थिन-मार्जिन) वाले श्रेणीबद्ध क्षेत्रों में प्रत्येक लेन-देन पर 5 रुपये का एकमुश्त शुल्क देय होगा, जबकि पूंजी बाजार से जुड़े सौदों पर 0.02 प्रतिशत की दर से एमडीआर वसूला जाएगा।

नियामक की भूमिका और केंद्रीय बैंक का रुख

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यह पूरा कानूनी विवाद भुगतान और निपटान प्रणाली कानून के तहत भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के नियामक अधिकारों के दायरे से जुड़ा है। कानूनन देश के भीतर भुगतान तंत्र की निगरानी और नियमन की जिम्मेदारी केंद्रीय बैंक के पास है, जबकि यूपीआई नेटवर्क का संचालन करने वाली संस्था एनपीसीआई भी आरबीआई के अनुमोदन और देखरेख में ही काम करती है।

शुल्क ढांचे के सार्वजनिक होने के अगले दिन आरबीआई ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक बयान जारी कर सरकार के इस कदम का खुला समर्थन किया था। केंद्रीय बैंक ने कहा कि 2,000 रुपये से अधिक के लेन-देन पर एमडीआर लागू करना भारत के डिजिटल भुगतान तंत्र को लंबी अवधि तक व्यावहारिक और टिकाऊ बनाए रखने की दिशा में एक जरूरी कदम है।

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नियामक ने यह भी कहा कि इस बदलाव से यूपीआई को अपना दायरा बढ़ाने, नवाचारों को गति देने और देश भर के उपभोक्ताओं व कारोबारियों को सेवाएं देते रहने में मदद मिलेगी। साथ ही, आरबीआई ने रेखांकित किया कि भुगतान तंत्र से जुड़े सभी पक्षों के बीच एमडीआर का न्यायसंगत वितरण डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर में नए निवेश को प्रोत्साहित करेगा।

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