उड़ीसा हाईकोर्ट ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के सफाई कर्मचारियों की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने बैंक प्रबंधन को निर्देश दिया है कि वह कर्मचारियों की सीमित शिक्षा, सामाजिक पृष्ठभूमि और 2016 से छिनी आजीविका को ध्यान में रखते हुए उनकी सजा पर दोबारा विचार करे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनर्विचार के दौरान सेवा से बर्खास्तगी, निष्कासन या अनिवार्य सेवानिवृत्ति जैसी कठोर सजा नहीं दी जा सकती।
जस्टिस बिराजा प्रसन्न शतपथी की एकल पीठ ने 8 सितंबर को यह फैसला सुनाया। पीठ ने बैंक के अपीलीय प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह कर्मचारियों की कमजोर सामाजिक स्थिति को देखते हुए कोई अपेक्षाकृत हल्की सजा तय करे।
दैनिक वेतनभोगी से नियमित नियुक्ति तक का सफर
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की विभिन्न शाखाओं में दैनिक वेतन पर सफाई कर्मचारी-सह-सब स्टाफ के पद पर कार्यरत थे। साल 2012 में बैंक ने एकमुश्त भर्ती प्रक्रिया शुरू की, जिसके तहत अस्थायी और दैनिक वेतनभोगी कर्मियों को नियमित पदों के लिए आवेदन करने का अवसर दिया गया।
याचिकाकर्ताओं ने इस चयन प्रक्रिया में भाग लिया और 2013 में उन्हें नियमित नियुक्तियां मिल गईं। कार्यभार ग्रहण करते समय उन्होंने अपनी आयु और शैक्षणिक योग्यता के प्रमाण के रूप में स्कूल प्रमाण पत्र जमा किए थे।
प्रमाण पत्रों की जांच और विभागीय कार्रवाई
नियमित नियुक्ति के बाद बैंक प्रबंधन ने संबंधित स्कूलों से इन दस्तावेजों का सत्यापन कराया। स्कूलों ने बैंक को सूचित किया कि ये प्रमाण पत्र उनके द्वारा जारी नहीं किए गए हैं। इसके आधार पर बैंक ने इसे फर्जी दस्तावेज मानकर कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी।
आंतरिक जांच में सफाई कर्मचारियों को दोषी ठहराया गया, जिसके बाद बैंक ने कारण बताओ नोटिस जारी कर 2016 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। कर्मचारियों ने इसके खिलाफ विभागीय अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष अपील की, लेकिन वहां से भी बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा गया। इसके बाद कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जे. के. रथ ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत में दलील दी कि कर्मचारियों ने कानूनी परिणामों की समझ न होने के कारण ये दस्तावेज जमा किए थे। उन्होंने कहा कि भले ही स्कूल के पत्रों के आधार पर दस्तावेजों को फर्जी माना गया हो, लेकिन इन कर्मचारियों की सामाजिक पृष्ठभूमि और मामूली शिक्षा को देखते हुए बर्खास्तगी जैसी अत्यधिक कठोर सजा अनुचित है। अधिवक्ता ने आग्रह किया कि मामले में सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाया जाना चाहिए था।
दूसरी तरफ, बैंक प्रबंधन ने बर्खास्तगी का बचाव किया। बैंक ने तर्क दिया कि फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर सार्वजनिक क्षेत्र में नियमित नौकरी हासिल करना गंभीर कदाचार है और अनुशासनात्मक जांच में आरोप साबित होने के बाद की गई कार्रवाई नियमों के अनुरूप है।
अनुपातिकता का सिद्धांत और अदालत का निर्देश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता लंबे समय से दैनिक वेतन पर काम कर रहे सफाई कर्मचारी थे, जिन्हें बाद में नियमित किया गया था। सजा तय करते समय अनुशासनात्मक अधिकारियों को इस संदर्भ पर विचार करना चाहिए था।
अदालत ने कहा कि हर कदाचार के लिए सेवा से बर्खास्तगी ही एकमात्र सजा नहीं हो सकती। ऐसे कड़े कदम उठाने से पहले अधिकारियों को अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों और मानवीय पहलुओं का भी आकलन करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के ‘रणजीत ठाकुर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सजा हमेशा आरोप के अनुपात में होनी चाहिए और उसमें प्रतिशोध या अत्यधिक कठोरता की भावना नहीं दिखनी चाहिए। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी के आदेशों को खारिज कर दिया और बैंक के अपीलीय प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह बर्खास्तगी, निष्कासन या अनिवार्य सेवानिवृत्ति को छोड़कर कोई अन्य आनुपातिक सजा निर्धारित करे।

