पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बहुत छोटे बच्चों के संरक्षण से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे का हित और कानून स्वाभाविक तौर पर मां के पक्ष में होता है। जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल की एकल पीठ ने एक कामकाजी मां की याचिका स्वीकार करते हुए पिता को निर्देश दिया कि वह ढाई साल की मासूम बच्ची को तुरंत मां के सुपुर्द करे। अदालत ने कहा कि जब बच्चे का सर्वोत्तम कल्याण दांव पर हो, तो अन्य कानूनी रास्ते उपलब्ध होने के आधार पर हाईकोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार से इनकार नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
दोनों पक्षों का विवाह जुलाई 2022 में सिख रीति-रिवाजों से संपन्न हुआ था। यह दोनों की दूसरी शादी थी। मां वर्ष 2013 से पंजाब यूनिवर्सिटी में सीनियर असिस्टेंट के पद पर कार्यरत हैं। मां का आरोप था कि शादी के कुछ ही समय बाद ससुराल पक्ष ने दहेज के लिए प्रताड़ित करना शुरू कर दिया और उनके मासिक वेतन को पति के खाते में भेजने का दबाव बनाया। इसके अलावा शारीरिक मारपीट, गर्भावस्था के दौरान अनदेखी और लगातार धमकियों के कारण वह सितंबर 2025 में अपनी बच्ची को लेकर मायके लौट आईं।
इसके बाद अप्रैल 2026 में पिता बच्ची को शाम तक वापस छोड़ने की बात कहकर मायके से ले गया, लेकिन उसने बच्ची को लौटाने से मना कर दिया और कथित तौर पर 15 से 20 लाख रुपये की मांग करने लगा। पुलिस में शिकायत के बावजूद कोई मदद न मिलने पर मां ने हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की।
पिता की दलील: ‘मैं जैविक पिता हूँ, कस्टडी अवैध नहीं’
पिता और उसके परिवार ने याचिका का विरोध करते हुए दलील दी कि एक जैविक पिता और प्राकृतिक अभिभावक होने के नाते उसके पास बच्ची का रहना किसी भी सूरत में अवैध नहीं माना जा सकता। उनका कहना था कि मां को इसके लिए गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट के तहत फैमिली कोर्ट जाना चाहिए था।
पिता ने मां पर बिना किसी ठोस वजह के घर छोड़ने और वैवाहिक जिम्मेदारियों से भागने का आरोप लगाया। साथ ही दावा किया कि मां शादी से पहले की मानसिक बीमारी से पीड़ित रही हैं और नौकरीपेशा होने के कारण बच्ची की परवरिश के लिए पर्याप्त समय नहीं दे पाएंगी, जबकि बच्ची संयुक्त परिवार में पूरी तरह सुरक्षित और खुशहाल माहौल में रह रही है।
क्या हेबियस कॉर्पस याचिका विचारणीय है?
हाईकोर्ट ने पिता के इस तकनीकी एतराज को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि हेबियस कॉर्पस का सामान्य आधार भले ही किसी को गैरकानूनी रूप से रोके रखना हो, लेकिन नाबालिग बच्चों के मामलों में अदालत का मुख्य ध्यान इस बात पर होता है कि बच्चे का सर्वांगीण कल्याण किसमें है।
सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले तेजस्विनी गौड़ बनाम शेखर जगदीश प्रसाद तिवारी का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:
“18. हेबियस कॉर्पस की कार्यवाही कस्टडी की वैधता को परखने या उसे सही ठहराने के लिए नहीं है। हेबियस कॉर्पस कार्यवाही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा बच्चे की कस्टडी अदालत के विवेकाधिकार पर निर्भर करती है। हेबियस कॉर्पस एक विशेषाधिकार रिट और असाधारण उपचार है, और यह रिट तब जारी की जाती है जब मामले की परिस्थितियों में कानून द्वारा प्रदत्त सामान्य उपाय या तो उपलब्ध न हों या निष्प्रभावी हों; अन्यथा रिट जारी नहीं की जाएगी। बच्चे की कस्टडी के मामलों में हाईकोर्ट की रिट जारी करने की शक्ति केवल उन्हीं मामलों में सीमित है जहां नाबालिग को ऐसे व्यक्ति द्वारा अपने संरक्षण में रखा गया हो जो उसकी कानूनी कस्टडी का हकदार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों के निर्णयों के आलोक में, हमारा मानना है कि बच्चे की कस्टडी के मामलों में हेबियस कॉर्पस की रिट तब विचारणीय है जब यह साबित हो जाए कि माता-पिता या अन्य किसी व्यक्ति द्वारा नाबालिग बच्चे को अपने पास रखना अवैध और बिना किसी कानूनी अधिकार के था।”
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—यशिता साहू बनाम राजस्थान राज्य और हालिया सूर्यकांत एम. रायकर बनाम कर्नाटक राज्य—का उल्लेख करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट या गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट के तहत वैकल्पिक उपाय मौजूद होने मात्र से हाईकोर्ट को अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करने से नहीं रोका जा सकता।
हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट की धारा 6(ए) का महत्व
मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए जस्टिस नागपाल ने कहा कि एक रिट कोर्ट को आपसी आरोपों-प्रत्यारोपों में उलझने के बजाय केवल इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि नन्हीं बच्ची की भलाई किसमें है।
हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट की धारा 6(ए) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि कानून में यह साफ तौर पर दर्ज है कि पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी सामान्यतः मां के पास ही रहनी चाहिए। इस बिंदु पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले मास्टर अथर्व (नाबालिग) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का जिक्र करते हुए अदालत ने दोहराया कि पांच साल तक के बच्चों को नियम के तौर पर मां के संरक्षण में ही रहना चाहिए, जब तक कि मां के खिलाफ गंभीर अनैतिक आचरण या किसी जघन्य अपराध में संलिप्तता जैसे असाधारण हालात साबित न हों।
‘मां के प्यार और ममता की जगह पिता भी नहीं ले सकता’
हाईकोर्ट ने पाया कि मां के खिलाफ ऐसा कोई असाधारण या अयोग्य ठहराने वाला आधार रिकॉर्ड पर नहीं है। मां पर लगाए गए मानसिक बीमारी के आरोपों को अदालत ने बिना किसी सबूत के खारिज कर दिया और कहा कि वह पिछले 13 वर्षों से पंजाब यूनिवर्सिटी में स्थायी पद पर सेवा दे रही हैं और आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं। इसके विपरीत, पिता अपनी शिक्षा, काम और आमदनी का कोई ठोस ब्योरा पेश नहीं कर सका।
अदालत ने मां और शिशु के प्राकृतिक रिश्ते पर भावुक टिप्पणी करते हुए कहा:
“ढाई साल की एक बच्ची की देखभाल उसकी मां द्वारा सबसे प्रभावी ढंग से की जा सकती है। इतनी छोटी बच्ची का अपनी मां के साथ एक विशेष रिश्ता होता है, जिसकी जगह कोई दूसरा—यहां तक कि पिता भी नहीं ले सकता। एक मासूम शिशु को उसकी मां की देखभाल, प्यार और दुलार से दूर करने से अधिक क्रूर कुछ नहीं हो सकता।”
हाईकोर्ट के मुख्य निर्देश
याचिका को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने निम्नलिखित अहम निर्देश जारी किए:
- पिता 22 सितंबर 2026 को सुबह 10:00 बजे से 11:00 बजे के बीच मां के मायके जाकर बच्ची की कस्टडी उसे सौंपेगा।
- यदि पिता ऐसा करने में विफल रहता है, तो संबंधित पुलिस अधिकारी तुरंत बच्ची को अपने संरक्षण में लेकर मां को सौंपेंगे।
- पिता कस्टडी के लिए फैमिली या गार्जियन कोर्ट में नियमित याचिका दायर करने के लिए स्वतंत्र होगा, और वह अदालत इस फैसले की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से निर्णय करेगी।
- नियमित याचिका पर फैसला होने तक पिता को प्रत्येक रविवार सुबह 10:00 बजे से शाम 5:00 बजे के बीच दो घंटे मिलने या शाम 5:00 बजे से 6:00 बजे के बीच 15 से 30 मिनट की वीडियो कॉल करने की अनुमति होगी।
- पुलिस अधिकारी मां और बच्ची को किसी भी संभावित खतरे के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराएंगे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: हरजीत कौर बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: सीआरडब्ल्यूपी संख्या 7195 / 2026 (ओएंडएम)
पीठ: जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल
निर्णय की तिथि: 10 सितंबर 2026

