मकान मालिक ही अपनी जरूरत का सबसे बेहतर जज, किरायेदार तय नहीं कर सकता संपत्ति का इस्तेमाल: दिल्ली हाईकोर्ट ने बेदखली आदेश रखा बरकरार

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किरायेदार यह तय या निर्देशित नहीं कर सकता कि मकान मालिक को अपनी संपत्ति का इस्तेमाल किस तरह करना चाहिए। कोर्ट ने माना कि मकान मालिक ही अपनी रिहायशी या व्यावसायिक जरूरतों का सबसे बेहतर जज (मूल्यांकनकर्ता) होता है। दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 (डीआरसी एक्ट) की धारा 14(1)(ई) के तहत दिए गए बेदखली आदेश को बरकरार रखते हुए, जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की एकल पीठ ने किरायेदार की पुनरीक्षण याचिका (रिवीजन पिटीशन) खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि धारा 25-बी(8) के तहत हाईकोर्ट का पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार केवल अधीक्षण (सुपरविजन) की प्रकृति का है, जिसमें साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन करने या निचली अदालत के निष्कर्षों की जगह अपनी राय थोपने की अनुमति नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कड़कड़डूमा कोर्ट, शाहदरा जिला के अतिरिक्त किराया नियंत्रक (एआरसी) द्वारा 7 अप्रैल 2026 को बेदखली याचिका (आरसी एआरसी संख्या 510/2017) में पारित आदेश से जुड़ा है। याचिकाकर्ता एवं किरायेदार नरेश कुमार ने इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

मकान मालिक सन्नी कश्यप और उनके भाई ने विवादित परिसर से किरायेदार को बेदखल करने की मांग की थी। उनका कहना था कि उन्हें वकालत का दफ्तर (लॉ ऑफिस) शुरू करने के लिए इस संपत्ति की वास्तविक और वैध (बोनाफाइड) जरूरत है। इसके जवाब में किरायेदार ने मुकदमे का बचाव करने की अनुमति (लीव टू डिफेंड) मांगते हुए अर्जी दाखिल की। हालांकि, एआरसी ने पाया कि किरायेदार कोई ऐसा ठोस मुद्दा (ट्राएबल इशू) उठाने में विफल रहा जिस पर सुनवाई की जरूरत हो, और लीव टू डिफेंड अर्जी खारिज करते हुए बेदखली का आदेश जारी कर दिया।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने एआरसी के आदेश को मुख्य रूप से तीन आधारों पर चुनौती दी:

  1. मकान मालिक और किरायेदार के संबंध का अभाव: किरायेदार का तर्क था कि वह मूल रूप से प्रतिवादियों के पूर्वजों का किरायेदार था और उसने कभी भी प्रतिवादियों को अपना मकान मालिक स्वीकार (अटॉर्न) नहीं किया। इसलिए दोनों पक्षों के बीच मकान मालिक-किरायेदार का कोई वैध संबंध नहीं है और एआरसी ने इसे मानने में गलती की है।
  2. जरूरत में बदलाव और नीयत पर सवाल: याचिकाकर्ता ने दलील दी कि मकान मालिकों ने शुरुआत में हलवाई की दुकान (कन्फेक्शनरी शॉप) खोलने के लिए परिसर खाली कराने की मांग की थी, जिसे बाद में संशोधित करके लॉ ऑफिस कर दिया गया। किरायेदार के अनुसार, उद्देश्य में यह बदलाव दिखाता है कि कथित जरूरत वास्तविक नहीं थी।
  3. वैकल्पिक जगहों की उपलब्धता: किरायेदार का कहना था कि मकान मालिकों के पास पहले से ही उपयुक्त वैकल्पिक संपत्तियां मौजूद हैं, जिनमें शामिल हैं:
    • तीस हजारी कोर्ट परिसर में स्थित वकीलों का चैंबर संख्या के-127;
    • हाउस नंबर 1ए, पंडित पार्क, कृष्णा नगर, दिल्ली के ग्राउंड फ्लोर पर करीब 100 वर्ग गज का रिहायशी-सह-दफ्तर परिसर; और
    • भीकम सिंह कॉलोनी, विश्वास नगर, शाहदरा में स्थित दो व्यावसायिक दुकानें (दुकान संख्या 1 और 4)।
READ ALSO  केरल की अदालत ने 4 साल की बच्ची के यौन उत्पीड़न के लिए 65-वर्षीय व्यक्ति को 7 साल की सज़ा सुनाई

सुनवाई के दौरान प्रतिवादी मकान मालिकों की ओर से कोई पेश नहीं हुआ, और याचिकाकर्ता की वकील ने अपनी बहस को इन्हीं तीन बिंदुओं तक सीमित रखा।

हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण

धारा 25-बी(8) के तहत पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार का दायरा

जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर ने डीआरसी एक्ट की धारा 25-बी(8) के परंतुक (प्रोविजो) के तहत हाईकोर्ट के अधिकारों के दायरे को रेखांकित किया। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों—सरला आहूजा बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम दिलबहार सिंह, और आबिद-उल-इस्लाम बनाम इंदर सैन दुआ—तथा दिल्ली हाईकोर्ट के पंकज पाहवा बनाम प्रेम वती एवं संजीव हीरानंदानी बनाम सन्नी ग्रोवर मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि विधायिका ने रेंट कंट्रोलर के आदेश के खिलाफ अपील का कोई प्रावधान जानबूझकर नहीं रखा है।

सुप्रीम कोर्ट के आबिद-उल-इस्लाम फैसले का उल्लेख करते हुए अदालत ने उद्धृत किया:

“धारा 25-बी(8) का परंतुक हाईकोर्ट को रेंट कंट्रोलर के आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण का विशेष अधिकार प्रदान करता है, जो प्रक्रियात्मक अनुपालन सहित निर्णय लेने की प्रक्रिया पर निचली अदालत के ऊपर अधीक्षण की प्रकृति का है। इसलिए, हाईकोर्ट से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह अपीलीय क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए अपने विचारों को निचली अदालत के विचारों के स्थान पर रखे। हाईकोर्ट की भूमिका केवल अपनाई गई प्रक्रिया की वैधता से संतुष्ट होने तक सीमित है। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप का दायरा बेहद संकीर्ण है और रिकॉर्ड पर प्रत्यक्ष कानूनी त्रुटि के मामलों को छोड़कर, हाईकोर्ट को ऐसे निर्णय में दखल नहीं देना चाहिए। ऐसे मामलों में व्यापक या खुली जांच करने की आवश्यकता नहीं है, जो अधीक्षण की शक्ति को नियमित पहली अपील में बदलने के समान होगी—एक ऐसा कृत्य जिसे विधायिका ने पूरी तरह से वर्जित किया है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिवीजन का दायरा केवल यह देखने तक सीमित है कि क्या आदेश अधिकार क्षेत्र की गलती (ज्यूरिसडिक्शनल एरर), प्रत्यक्ष अवैधता, गंभीर अनियमितता या विकृति से ग्रस्त है। इसमें तथ्यों और साक्ष्यों का नए सिरे से मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

READ ALSO  आयु विवाद के कारण 28 साल पहले बर्खास्त कांस्टेबल को राजस्थान हाई कोर्ट से राहत

मकान मालिक और किरायेदार का संबंध

हाईकोर्ट ने किरायेदार के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया कि उनके बीच मकान मालिक-किरायेदार का संबंध नहीं है। रिकॉर्ड से पता चला कि किरायेदार ने अपनी लीव टू डिफेंड अर्जी में खुद स्वीकार किया था कि संपत्ति मूल रूप से प्रतिवादियों के दादा की थी (जो मकान मालिक थे) और बाद में उनके पिता किराया लेते थे।

कोर्ट ने कहा कि धारा 14(1)(ई) के तहत मकान मालिक को किसी टाइटल सूट की तरह पूर्ण मालिकाना हक साबित करने की जरूरत नहीं होती, बल्कि उसे सिर्फ किरायेदार की तुलना में बेहतर हक (सुपीरियर टाइटल) साबित करना होता है। चूंकि किरायेदार ने संपत्ति पर न तो खुद का मालिकाना हक जताया और न ही परिवार से बाहर किसी तीसरे पक्ष का दावा किया, इसलिए चाचा को किराया देने या औपचारिक स्वीकृति न होने का तर्क मकान मालिक के बेहतर दावे को खत्म नहीं कर सकता।

जरूरत में बदलाव और उसकी प्रमाणिकता

हलवाई की दुकान के बदले वकालत का दफ्तर खोलने के लिए याचिका में संशोधन करने के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि केवल उद्देश्य में संशोधन या बदलाव करने भर से मकान मालिक की मांग दुर्भावनापूर्ण नहीं हो जाती।

कोर्ट ने रेखांकित किया कि किरायेदार ने खुद स्वीकार किया है कि दोनों भाई वास्तव में प्रैक्टिसिंग वकील हैं। ऐसे में एआरसी ने उनके पेशे के संदर्भ में उनकी जरूरत का सही आकलन किया था। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि लॉ ऑफिस की जरूरत काल्पनिक, मनमानी या केवल बेदखली का बहाना थी।

कथित वैकल्पिक जगहों की उपयुक्तता

हाईकोर्ट ने किरायेदार द्वारा बताए गए तीन वैकल्पिक परिसरों को लेकर एआरसी के निष्कर्षों को सही ठहराया:

  • तीस हजारी कोर्ट का चैंबर (के-127): मकान मालिकों ने माना कि यह चैंबर उनके दिवंगत पिता का था, लेकिन यह तीन वकीलों (दोनों भाइयों और एक की अधिवक्ता पत्नी) के काम के लिए बेहद छोटा है। कोर्ट ने एआरसी के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि जिला अदालतों में वकीलों का चैंबर केवल लाइसेंस के आधार पर मिलता है, वह वकील की निजी मालिकाना संपत्ति नहीं होती। साथ ही, किरायेदार यह साबित नहीं कर सका कि एक छोटा चैंबर तीन वकीलों के लिए पर्याप्त था।
  • पंडित पार्क की संपत्ति: यद्यपि यह संपत्ति मौजूद है, लेकिन मकान मालिकों ने स्पष्ट किया कि इसका इस्तेमाल सिर्फ रहने के लिए होता है, कभी दफ्तर के रूप में नहीं हुआ। किरायेदार इसके दफ्तर के रूप में इस्तेमाल होने का कोई साक्ष्य नहीं दे सका। इसके अलावा, यह मकान कड़कड़डूमा कोर्ट से काफी दूर है, जो मकान मालिकों की वकालत का मुख्य केंद्र है।
  • भीकम सिंह कॉलोनी की दुकानें (संख्या 1 और 4): 21 अक्टूबर 2016 के पंजीकृत पारिवारिक समझौते के अनुसार ये दुकानें उनके चाचाओं के हिस्से में आ चुकी हैं और इन पर प्रतिवादियों का कोई नियंत्रण नहीं है। किरायेदार ऐसा कोई दस्तावेज या फोटो पेश नहीं कर सका जिससे यह दिखे कि ये दुकानें मकान मालिकों के कब्जे में हैं।
READ ALSO  ‘समाज सेवा अनमोल है’: सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व CJI को ‘बचाने’ के लिए ₹1 करोड़ की फीस मांगने वाली वकील की याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट के राघवेन्द्र कुमार बनाम प्रेम मशीनरी एंड कंपनी और प्रतिभा देवी बनाम टी.वी. कृष्णन फैसलों का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह स्थापित सिद्धांत है कि मकान मालिक ही अपनी जरूरत का सबसे बेहतर जज होता है और किरायेदार यह निर्देश नहीं दे सकता कि मकान मालिक को उपलब्ध जगह का उपयोग किस तरह करना चाहिए।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतें मकान मालिक की जगह बैठकर उसकी प्राथमिकताओं का मूल्यांकन नहीं कर सकतीं।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने पाया कि अतिरिक्त किराया नियंत्रक के आदेश में अधिकार क्षेत्र से जुड़ा कोई दोष, मनमानापन या प्रक्रियात्मक अवैधता नहीं है। किरायेदार ऐसा कोई ठोस आधार पेश करने में विफल रहा जिससे उसे मुकदमे के बचाव की अनुमति दी जा सके।

इन निष्कर्षों के साथ दिल्ली हाईकोर्ट ने किरायेदार की रिवीजन याचिका और सभी अंतरिम अर्जियों को खारिज कर दिया तथा बेदखली के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: नरेश कुमार बनाम सन्नी कश्यप व अन्य
वाद संख्या: आरसी.रिव. 330/2026, सीएम एपीपीएल. 60550/2026 एवं सीएम एपीपीएल. 60551/2026
पीठ: जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर
निर्णय की तिथि: 8 सितंबर 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles