एक ही मामले में दोबारा संज्ञान नहीं ले सकते मजिस्ट्रेट, न ही प्रोटेस्ट पिटीशन से बदली जा सकती हैं धाराएं: हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी आपराधिक मामले में एक बार संज्ञान ले लेता है, तो उसे उसी मामले में दोबारा संज्ञान लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने रेखांकित किया कि बाद में दाखिल किसी प्रोटेस्ट पिटीशन (विरोध याचिका) के माध्यम से मजिस्ट्रेट अपने पुराने संज्ञान आदेश को न तो दोबारा खोल सकता है और न ही उसमें कोई संशोधन कर सकता है।

इसके साथ ही अदालत ने यह सिद्धांत भी तय किया कि पुलिस चार्जशीट पर संज्ञान लेते समय मजिस्ट्रेट कानूनी धाराओं को घटा या बढ़ा नहीं सकते। अदालत के अनुसार, यदि मामले में अतिरिक्त अपराध जोड़ने की जरूरत महसूस होती है, तो इसके लिए तय कानूनी प्रक्रिया केवल आरोप तय (चार्ज फ्रेमिंग) करने के स्तर पर ही पूरी की जा सकती है।

हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह ने उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) द्वारा 22 मई को पारित एक आदेश को निरस्त करते हुए यह फैसला सुनाया।

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आरोप तय करने के चरण में ही जुड़ेंगी अतिरिक्त धाराएं

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब किसी अभियुक्त के खिलाफ अदालत एक बार विधिवत संज्ञान ले चुकी हो, तो उसी प्रक्रिया को दोहराना या संज्ञान लेने के चरण में ही नई धाराएं जोड़ना विधि विरुद्ध है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट किसी प्रोटेस्ट पिटीशन का सहारा लेकर पूर्व में दिए गए संज्ञान आदेश की समीक्षा या उसमें बदलाव नहीं कर सकते। यदि साक्ष्यों या परिस्थितियों के आधार पर अभियुक्त पर अतिरिक्त आरोप बनते भी हैं, तो उन्हें शामिल करने का सही समय चार्ज फ्रेमिंग की कार्यवाही है।

गोंडा के नवाबगंज थाने से जुड़ा है विवाद

यह पूरा मामला वर्ष 2025 में गोंडा जिले के नवाबगंज थाने में दर्ज एक आपराधिक मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें शुरुआत में अखिलेश सिंह, शेखर सिंह और अल्पना सिंह को आरोपी बनाया गया था।

जांच पूरी करने के बाद पुलिस ने अखिलेश सिंह और शेखर सिंह के खिलाफ आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया, जबकि अल्पना सिंह के पक्ष में क्लोजर या फाइनल रिपोर्ट अदालत में पेश कर दी।

गोंडा के मजिस्ट्रेट ने 17 नवंबर 2025 को पुलिस चार्जशीट पर संज्ञान लिया और दोनों आरोपियों को तलब किया। अदालत ने अखिलेश सिंह को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 351(2) (आपराधिक धमकी), 352 (शांति भंग के इरादे से जानबूझकर अपमान), 324(2) (शरारत या नुकसान पहुंचाना) और 109(1) (हत्या का प्रयास) के तहत समन भेजा। इसी आदेश में शेखर सिंह को धारा 115(2), 351(2) और 352 के तहत अदालत में पेश होने का निर्देश दिया गया।

प्रोटेस्ट पिटीशन पर मजिस्ट्रेट का अधिकार क्षेत्र

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विवाद उस समय उत्पन्न हुआ जब अल्पना सिंह के पक्ष में दाखिल पुलिस की फाइनल रिपोर्ट को चुनौती देते हुए अदालत में एक विरोध याचिका (प्रोटेस्ट पिटीशन) दायर की गई। इस याचिका का निपटारा करते हुए मजिस्ट्रेट ने 22 मई के आदेश के जरिए अल्पना सिंह को बतौर आरोपी तलब कर लिया और साथ ही पहले से संज्ञान झेल रहे शेखर सिंह के खिलाफ भी अतिरिक्त धाराएं जोड़ दीं।

अल्पना सिंह ने मजिस्ट्रेट के 22 मई के इस आदेश की वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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अदालत ने पत्रावली का परीक्षण करते हुए पाया कि शेखर सिंह के खिलाफ 17 नवंबर 2025 को ही विधिवत संज्ञान लिया जा चुका था। ऐसी स्थिति में प्रोटेस्ट पिटीशन के आधार पर उनके खिलाफ दोबारा संज्ञान लेना या धाराओं की संख्या बढ़ाना कानूनी रूप से उचित नहीं था।

अदालत ने कहा, “यदि किसी अतिरिक्त अपराध पर विचार करने की आवश्यकता है, तो इसके लिए उपयुक्त चरण आरोप तय करने का है।”

हाईकोर्ट ने सीजेएम गोंडा के 22 मई के आदेश को रद्द करते हुए मामले को निचली अदालत में वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि कानून के अनुसार आगे की कार्यवाही संचालित की जाए।

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